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प्रेमचंद : हिंदी का वो लेखक जिसके नाम पर मंदिर बन गया

बनारस में एक जगह है. शहर से बाहर है. नाम लमही है. पांडेयपुर के निर्वासित बियाबान से होते हुए आप लमही पहुंचते हैं तो एक गेट और गेट पर मिट्टी के कुछ जानवर हैं. इस गेट के पीछे लमही गांव है और गांव में हिन्दी साहित्य के प्रगतिशील लेखक का घर है.

नाम? धनपत राय यानी प्रेमचंद. वही प्रेमचंद जो अब दरकी हुई प्रगतिशीलता के एक आधार हैं. वह प्रेमचंद जो अपनी आत्मा में लेखक थे और अपनी काया में वो आदमी, जिनकी फटे हुए जूते में तस्वीर देखकर हरिशंकर परसाई जैसे गद्यकार की कलम उलझ-सी जाती है.

अब है लमही. प्रदेश सरकार. प्रगतिशील लेखक संघ. और वही प्रेमचंद जो अब हल्ले के करीब आ चुके हैं. उनके घर के पास कुछ नहीं था. लेकिन एक साल 31 जुलाई के दिन हिंदी का एक लेखक लमही जाता है, और उनके घर के सामने बहुत छोटे-छोटे शिवलिंग मिलते हैं.

Lamahi
लमही

ऐसे शिवलिंग लेखक ने अघोरी किले के बाहर देखे थे. बहरहाल, प्रेमचंद जयन्ती के दिन का हाल लेकर हिंदी का लेखक लौटता है.

अगले साल हिंदी के लेखक को फिर से जाना होता है. इस बार सभी छोटे शिवलिंगों के बीच एक बड़ा शिवलिंग रखा मिलता है और मिलती है टीन की एक छत. टीन की छत के नीचे एक शिवलिंग काबिज़ है, जो प्रेमचंद के दरकते और घास से भरे घर को देख रहा है.

और फिर आता है अगला साल. एक मंदिर है. मंदिर पर लगा है एक बोर्ड. जिस पर लिखा है “श्री श्री प्रेमचंदेश्वर महादेव”. और उसके नीचे लिखा है “150 साल पुराना मंदिर”.

1936 में एक जापानी कलाकार द्वारा बनाया गया प्रेमचंद का चित्र.
1936 में एक जापानी कलाकार द्वारा बनाया गया प्रेमचंद का चित्र.

इसकी तस्दीक होते-होते जुलाई की दोपहरी में शराब पिए एक आदमी से मुलाक़ात होती है. उमस से लिपटे आदमी से पूछा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण किसने किया? उसने बताया कि प्रेमचंद ने. फिर उस आदमी से उसका नाम पूछा गया. उसने अपना नाम बताया “प्रेमचंद”.

अब मंदिर तो है, लेकिन मंदिर के बोर्ड पर प्रेमचंद का नाम नहीं है.

इस 150 साल पुराने मंदिर और प्रेमचंद में यही फासला है. इसको प्रेमचंद ने बनाया या नहीं, इसका जवाब हिंदी का कोई लेखक नहीं देगा. प्रेमचंद भी जयंती में वाबस्ता हैं, और प्रगतिशीलता को एक धक्का दरकार है. कि उसे सम्हलना है या चुकना है, किसी राह तो जाए.

हिंदी में वही कुछ है, जो प्रेमचंद है. वही देशजता जो हम पर स्खलित होती है. हमसे रिसती है. गाहे-बगाहे अपने शहर की याद दिलाती है. वही हमारे और आपके बीच से निकले हुए लोग. जो खुद को प्रेमचंद मानते हैं, ये जानते हुए कि लोकसभा चुनाव में प्रगतिशीलता का पैमाना कितना चुक जाता है.

प्रेमचंद इतने सुलभ कि रेलवे स्टेशन पर काबिज़ हैं. किताब दुकानों पर मौजूद हैं. और कुछ ऐसे भी कि बनारस जैसे शहर में मौजूद हैं, जहां जयशंकर प्रसाद के वंशज “कामायनी” की पांडुलिपि लेकर थाने पहुंच जाया करते हैं.


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