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100 लोगों की मौत याद करके हिंदी से पीछे हटी मोदी सरकार

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मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सुबह 10 बजकर 6 मिनट पर एक ट्वीट किया. सफाई के अंदाज में लिखे गए इस ट्वीट में कहा गया था कि नई शिक्षा पॉलिसी के तहत सरकार का 8वीं तक हिंदी को कंपलसरी करने कोई इरादा नहीं है. जावड़ेकर ने ट्वीट में लिखा कि उन्हें यह सफाई मीडिया में छपी ख़बरों की वजह से देनी पड़ रही है. 10 जनवरी को कुछ अखबारों में खबर छपी थी कि शिक्षा पर गठित कस्तूरीरंगन कमिटी ने 8वीं क्लास तक हिंदी को कंपलसरी बनाने की सिफारिश की है. जावड़ेकर की सफाई इसी खबर के सिलसिले में आई थी.

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क्या है कस्तूरीरंगन कमिटी?

2016 की जुलाई में प्रकाश जावड़ेकर को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की कमान सौंपी गई. जून 2017 में उन्होंने नई शिक्षा पॉलिसी के निर्धारण के लिए के. कस्तूरीरंगन के नेतृत्व में 9 सदस्यों वाली कमिटी गठित की थी. कस्तूरीरंगन कमिटी को दिसंबर 2017 में अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी. अब तक इस कमिटी का कार्यकाल तीन बार बढ़ाया जा चुका है. मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने प्रेस को दिए गए एक बयान में कहा था कि रिपोर्ट तैयार है और संसद के शीतकालीन सत्र के बाद इसे सार्वजानिक किया जाएगा.

कौन हैं के. कस्तूरीरंगन?

के. कस्तूरीरंगन या कृष्णस्वामी कस्तूरीरंगन की पहचान इसरो के सफल प्रमुख के तौर पर रही है. वो 1994 से 2003 के बीच इसरो के प्रमुख रहे. भारत के लिए गर्व की चीज बन चुके. इसके अलावा INSAT उपग्रह के तीसरी पीढ़ी के उपग्रह का सफल परिक्षण भी इनके कार्यकाल में हुआ. इसरो से निकलने के बाद वो शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ गए. कस्तूरीरंगन फिलहाल राजस्थान सेंट्रल यूनिवर्सिटी के चांसलर हैं. इससे पहले वो प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी के चांसलर रह चुके हैं. वो कर्नाटक नॉलेज कमीशन और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज के भी प्रमुख रहे हैं.

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कृष्णस्वामी कस्तूरीरंगन.

क्या है त्रिभाषा फॉर्मूला?

त्रिभाषा फॉर्मूला यानी सिलेबस में तीन भाषाओं को शामिल किया जाना. 1948 में भारत में भाषा के आधार पर राज्यों को बांटने के आन्दोलन हो रहे थे. ठीक इसी समय यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन ने पढ़ाई-लिखाई के लिए तीन भाषा का फॉर्मूला दिया था. इसके अनुसार अंग्रेजी, हिंदी के अलावा एक स्थानीय भाषा को पढ़ाई की व्यवस्था की जाए. यह व्यवस्था के स्विट्ज़रलैंड और नीदरलैंड को देखकर तैयार किया था. 1964 में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन के चैयरमेन दौलत सिंह कोठारी के नेतृत्व में त्रिभाषा फॉर्मूले के तौर पर कमीशन बनाया. इस कमीशन ने 1966 में अपनी रिपोर्ट सौंपी.1968 के साल में भारतीय संसद ने कोठारी कमिशन की सिफारिश के आधार पर त्रिभाषा फॉर्मूले को स्वीकार कर लिया. अन्नादुरई उस समय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. उन्होंने इसके खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया दी. तमिलनाडु की सरकारी स्कूलों में से हिंदी भाषा को हटा दिया गया.

अन्नादुरई और पेरियार.
अन्नादुरई और पेरियार.

दक्षिणी राज्यों के कड़े विरोध के चलते 1986 की एजुकेशन पॉलिसी में ‘त्रिभाषा फॉर्मूले’ को ख़ारिज कर दिया गया. 1990 में उर्दू के मशहूर लेखक अली सदर जाफरी के नेतृत्व में त्रिभाषा फॉर्मूले पर विशेषज्ञों की कमिटी बनाई गई. इस कमिटी ने अपनी सिफारिश में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लिए अलग-अलग त्रिभाषा फॉर्मूले की सिफारिश की. इसके अनुसार उत्तर भारत में हिंदी, अंग्रेजी के अलावा तीसरी भाषा के तौर पर उर्दू को शामिल किया जाना चाहिए. वहीं दक्षिण भारत में हिंदी और स्थानीय भाषा के अलावा अंग्रेजी को शामिल किए जाने की बात कही गई. 1992 में भारत की संसद ने इसको स्वीकार कर लिया. भरतीय संविधान के अनुसार के शिक्षा राज्यों का विषय है. ऐसे में कोई भी राज्य त्रिभाषा फॉर्मूले को लागू करने के लिए बाध्य नहीं है.

क्यों विवादित रहा है त्रिभाषा फॉर्मूला?

1935 के इंडिया एक्ट के बाद पूरे देश में प्रोवेंसिअल असेंबली के चुनाव हुए. दक्षिण की मद्रास प्रेसीडेंसी में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला. 14 जुलाई 1937 को सीवी राजगोपालाचारी ने मद्रास प्रेसीडेंसी के प्राइम मिनिस्टर के तौर पर शपथ ली. उस समय सूबे के सदर के लिए यही शब्द बरता जाता था. सत्ता संभालने के महज एक महीने बाद ही राजगोपालाचारी ने हिंदी को सैकेंडरी तक की पढ़ाई में हिंदी को कंपलसरी लैंग्वेज के तौर पर लागू करने की मंशा जाहिर की. यह कांग्रेस का महात्मा गांधी काल था. गांधी जी की भाषा को लेकर समझ साफ़ थी. अंग्रेजों की मानसिक गुलामी को तोड़ने के लिए भारतीय को अपनी भाषा बरतनी चाहिए. हिंदी में वो ताकत है कि वो पूरे देश को एक सूत्र में बांध सकती है. राजगोपालाचारी के एजेंडे में हिंदी वर्धा के आश्रम से आई थी. अप्रैल 1938 में मद्रास प्रेसिडेंसी की 125 सैकेंडरी स्कूलों में हिंदी को कंपलसरी लैंग्वेज के तौर पर लागू कर दिया गया.

सी. राजगोपालाचारी.
सी. राजगोपालाचारी.

तमिल समाज में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई. राजगोपालाचारी के इस फैसले के खिलाफ सबसे पहले मोर्चा लिया तमिल शिक्षाविदो ने. उनका आरोप था कि सूबे की कांग्रेस सरकार हिंदी के जरिए तमिल का गला घोंट रही है. देखते ही देखते इस आंदोलन ने राजनीतिक मोड़ ले लिया. जो दो नेता इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे उन्हें आने वाले समय में तमिल अस्मिता आंदोलन का चेहरा बनना था. पहले थे ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’ और दूसरे थे सीएन अन्नादुरई.

इस आंदोलन के दौरान तमिल समर्थक उन स्कूलों के दरवाजे घेर कर बैठ गए जहां हिंदी पढाए जाने का प्रस्ताव था. दरअसल प्रदर्शनकारियों का कहना था कि दिल्ली की सरकार उनपर हिंदी थोपना चाहती है. यह उनकी तमिल संस्कृति पर सीधा हमला है. 1 जून 1938 को सीवी राजगोपालाचारी के घर के सामने बड़ा प्रदर्शन हुआ.अन्नादुरई और पेरियार दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. दो साल चले आंदोलन के बाद सरकार को अपने पैर पीछे खींचने पड़े और हिंदी को कंपलसरी भाषा के तौर पर लागू करने का फैसला वापिस लेना पड़ा.

गोली का शिकार पहला छात्र

आजादी के बाद आया 1959 में भारत के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने एक नोटिस जारी किया. इस नोटिस के मुताबिक हिंदी को 26 जनवरी 1965 की अधिकारिक भाषा बनाया जाना था. राष्ट्रपति के इस नोटिस के साथ ही तमिलनाडु में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. पेरियार को त्रिची में हिंदी साइनबोर्ड पर कालिख पोतते हुए दिखाई दिए. उस समय तक तमिल अस्मिता आंदोलन के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के तौर पर द्रविड़ मुनेन्द्र कषगम या डीएमके मैदान में आ चुकी थी. 26 जनवरी 1965 को हिंदी को भारत की एकमात्र आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया गया. इसके खिलाफ तमिलनाडु में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए.

डीएमके ने एलान किया कि वो 26 जनवरी के रोज काले झंडे लहराकर विरोध प्रदर्शन करेगी. 25 जनवरी को अन्नामलाई विश्वविद्यालय के छात्र प्रदर्शन के लिए जुटे हुए थे. देखते ही देखते प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़प शुरू हो गई. पुलिस की गोलोबारी में राजेंद्रन नाम एक छात्र मारा गया. इसके बाद पूरे तमिलनाडु में प्रदर्शनों ने हिंसक मोड़ ले लिया. 27 जनवरी से 13 फरवरी के बीच तमिलनाडु में 100 से ज्यादा लोग इस प्रदर्शन में मारे गए. तमिल अस्मिता के इसी उभार ने डीएमके के लिए सत्ता के दरवाजे खोल दिए. 1967 के विधानसभा चुनाव में डीएमके को तमिलनाडु में बहुमत हासिल हुआ और सीवी अन्नादुरई सूबे के मुख्यमंत्री बने.

दक्षिण के राज्यों और खास करके तमिलनाडु में हिंदी के खिलाफ की मानसिकता लंबे समय से रही है. इसी वजह से त्रिभाषा फॉर्मूला को लागू करने में हमेशा से एक सियासी रिस्क रहा है. लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी वो रिस्क लेती दिखाई नहीं दे रही है.


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