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तो इसलिए मोदी सरकार की फसल बीमा योजना से हाथ खींच रहे हैं राज्य!

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY). नरेंद्र मोदी सरकार की एक फ़्लैगशिप स्कीम. खबर है कि देश के कम से कम 7 राज्य इस स्कीम से हाथ खींच रहे हैं. इनमें बीजेपी शासित राज्य भी शामिल हैं. इस मसले को लेकर एक संसदीय समिति ने मंगलवार 10 अगस्त को केंद्र सरकार से चिंता ज़ाहिर करते हुए सवाल भी पूछा. समिति ने PMFBY की विफलता और अलोकप्रियता पर ज़ोर देते हुए कहा कि अगर आगे भी ऐसा ही चलता रहा तो ये स्कीम अपना उद्देश्य पूरा करने में नाकाम साबित होगी.

कृषि पर स्थायी संसदीय समिति ने लोकसभा में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा कि भले ही 7 राज्य इस स्कीम से बाहर हो चुके हों, लेकिन फिर भी सरकार को उन कारणों को ठीक से समझना चाहिए जिनके चलते राज्यों ने ये कदम उठाया. उदाहरण के लिए पंजाब कभी भी इस केंद्रीय योजना में शामिल नहीं हुआ. साल 2016 में शुरू हुई स्कीम को बिहार और पश्चिम बंगाल ने क्रमशः 2018 और 2019 में वापस ले लिया था. वहीं, आंध्र प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना और झारखंड ने पिछले साल से इस योजना को लागू नहीं किया.

जहां तक राज्यों का सवाल है, तो उन्होंने भारी खर्च और सामान्य मौसम के दौरान किसानों द्वारा बहुत कम मुआवज़ा मिलने के दावों को योजना के लागू न होने का प्रमुख कारण बताया है. कारणों पर अपनी बात रखते हुए बीजेपी के लोकसभा सदस्य की अध्यक्षता वाले पैनल ने इस स्थिति के समाधान के लिए उपयुक्त कदम उठाने को कहा है. ताकि राज्य इस योजना को लागू करते रहें और किसानों को इसका लाभ मिलता रहे.

PMFBY का मूल्यांकन करने वाली अपनी रिपोर्ट में पैनल ने ये माना है कि किसानों द्वारा क्लेम किए मुआवज़े के मिलने में देरी, राज्यों के योजना से पीछे हटने के ख़ास कारणों में से एक है. रिपोर्ट में कृषि मंत्रालय से इस मुद्दे से निपटने के लिए एक प्रभावी समाधान निकालने को कहा गया है ताकि किसानों को नुकसान न हो. अगर काग़ज़ी बातों को देखें तो मंत्रालय ने क्लेम सेटलमेंट के लिए बीमा कंपनियों को 10 दिन का समय दिया है. इसके बाद बीमा कंपनियों को किसानों को (साल के 12 प्रतिशत ब्याज दर) पर भुगतान करना होगा. हालांकि, इसका कोई भी असर नहीं हुआ है.

दावे और सरकारी आंकड़ों में बड़ा अंतर

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की वेबसाइट पर 2019 तक के सारे आंकड़े मौजूद हैं. और ये राज्यों के आधार पर बंटे हुए हैं. 2016-17 के आंकड़ों के मुताबिक़, योजना के तहत 5.83 करोड़ किसानों ने बीमा कराया और 5.67 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन का बीमा हुआ. अगले साल यानी 2017-18 में बीमा कराने वाले किसानों की तादाद में बढ़ोतरी हुई, लेकिन सिर्फ़ 5.08 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन का ही बीमा हुआ. साल 2018-19 में इसमें थोड़ी बढ़ोतरी हुई, मगर 5.22 करोड़ पर रुक गई और 2019-20 में अब तक सिर्फ़ ख़रीफ़ के आंकड़े जारी किए हैं सरकार ने. इसमें सिर्फ़ 3.35 करोड़ हेक्टेयर ज़मीन का बीमा हुआ है. फ़िलहाल आंकड़े बहुत साफ़ नहीं नज़र आ रहे हैं, क्योंकि सरकार ने ख़रीफ़ के अलावा 2019 के और आंकड़े जारी ही नहीं किए हैं.

एक तरफ आंकड़े जारी होते रहे, दूसरी तरफ राज्य योजना से हाथ खींचते रहे. बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, पंजाब और सिक्किम के अलावा 2 केंद्रशासित प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी ने भी योजना को लेकर उदासीनता दिखाई है.

बिहार ऐसा पहला राज्य था जिसने साल 2018 में इस योजना को छोड़ा था. तब बिहार में एनडीए की ही सरकार थी. उस वक़्त बिहार सरकार ने दो कारण बताए थे. राज्य के कोऑपरेटिव विभाग के प्रमुख सचिव ने कहा था,

‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बिहार के किसानों को कोई ख़ास मदद नहीं पहुंचा रही है. अगर 2016 के ख़रीफ़ के आंकड़े देखें तो बिहार और केंद्र सरकार ने कुल मिलाकर 495 करोड़ रुपए का प्रीमियम दिया था. लेकिन बिहार के किसानों को सिर्फ़ 221 करोड़ का लाभ मिला.’

बिहार सरकार के मुताबिक, एक और बड़ा कारण राजकोष पर इस स्कीम का भार था. ऐसे में बिहार सरकार ने अपनी खुद की योजना जारी की थी.

क्लेम में लगता है काफ़ी वक्त

दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में पढ़ाने वाले डॉ. मनीष कुमार बताते हैं कि फसल बीमा योजना की बहुत बड़ी दिक्कत है क्लेम सिस्टम. उनके मुताबिक़,

“अक्सर पैसा मिलने में 2-3 साल का वक्त लग जाता है. ये बात कृषि मंत्रालय द्वारा जारी किए गए 2019 ख़रीफ़ के आंकड़ों से भी साफ़ होता है. 20805 करोड़ रुपए का क्लेम किसानों ने किया. इसके एवज में सरकार ने नवंबर 2020 तक 17197 करोड़ रुपए का ही भुगतान किया है. मतलब क़रीब 2 साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी किसानों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है.”

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के किसान नेता मंगेज़ चौधरी बताते हैं कि पिछले 3 सालों में वो क़रीब 20-25 बार डीएम कार्यालय पर प्रदर्शन कर चुके हैं. लल्लनटॉप से बातचीत में मंगेज कहते हैं,

“हमारे ज़िले में कुल 5000 से भी ज़्यादा ऐसे किसान हैं, जिन्होंने फसल बीमा के क्लेम के लिए अप्लाई किया था, लेकिन महज़ 200-300 लोगों को अब तक फ़ायदा मिला है. जिनको मिला भी है वो 2 साल के बाद मिला है.”

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प्रतीकात्मक तस्वीर- हल चलाता किसान

घटती ज़मीन, बढ़ता प्रीमियम

योजना के पहले साल में 567 लाख हेक्टेयर ज़मीन का बीमा हुआ था. किसानों ने 4046 करोड़ और सरकार ने 21769 करोड़ रुपए बीमा कंपनियों को दिए थे. 2017 में 508 हेक्टेयर जमीन के लिए किसानों ने 4204 करोड़ रुपये और सरकार ने 24651 करोड़ रुपए बीमा कंपनियों को दिए थे. 2019 तक आएं तो उस साल महज़ 337 लाख हेक्टेयर ज़मीन के लिए किसानों ने 3010 करोड़ रुपये और सरकार ने 24057 करोड़ रुपए कंपनियों को दिए. इस तरह पूरे पांच सालों में सरकार और किसानों ने कुल मिलाकर 99284 करोड़ रुपए बीमा कंपनियों को दिए हैं. इसके बदले अब तक कुल 68278 करोड़ रुपए का लाभ किसानों को मिला है. ये आंकड़े चौंकाने वाले तो हैं ही, साथ ही साथ ये भी बताते हैं कि पिछले पांच सालों में 31546 करोड़ रुपए का फ़ायदा बीमा कंपनियों को पहुंचा है.

फायदे में प्राइवेट कंपनियां

कृषि मंत्रालय की वेबसाइट में दी गई जानकारी के मुताबिक़ कुल 18 बीमा कंपनियां हैं. इनमें सिर्फ़ 5 ऐसी कंपनियां हैं जिनमें सरकार की कुछ हिस्सेदारी है. बाक़ी सारी कंपनियां निजी हैं. जेएनयू में अर्थशास्त्र पढ़ाने और कृषि क्षेत्र में पिछले 20 सालों से काम करने वाले प्रोफ़ेसर विकास रावल बताते हैं कि इस योजना के लागू होने से पहले एग्रीकल्चर कोर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया किसान बीमा स्कीम चलाती थी. इस स्कीम के तहत किसी भी किसान को लोन लेने पर फसल बीमा करना अनिवार्य था. विकास ने बताया कि इससे एक चीज़ सुनिश्चित होती थी, फसल बीमा कराने वाला किसान ही होता था और बीमा की राशि 10-20 रुपए से ज़्यादा नहीं होती थी.

विकास आगे कहते हैं,

“लेकिन प्रधानमंत्री फसल बीमा के आने से बड़ी तादाद में लोगों ने बीमा कराया और ऐसे किसान भी इसमें हैं जिन्होंने लोन नहीं लिया है. ये वैसे सुनने में तो बहुत अच्छा लग सकता है, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू है. वो ये कि जो लोग बीमा करवा रहे हैं, वे किसान हैं भी या नहीं, हमें नही पता.”

निजी कंपनियां जांच के दायरे के बाहर

प्रोफ़ेसर विकास का आरोप है कि इसमें बहुत बड़ा घोटाला है. वो कहते हैं,

“एक उदाहरण से आपको बताता हूं. एक प्राइवेट बीमा कंपनी अपने एजेंट को 1000 पॉलिसी का टारगेट देती है और कहती है कि एक पॉलिसी पर एजेंट को 600 रुपए दिए जाएंगे. अब एजेंट अपनी जेब से 500 रुपये देता है और कंपनी को एक पॉलिसी रिपोर्ट करता है. कंपनी इसके बदले उसे 600 रुपए देती है और एक पॉलिसी के लिए सरकार कंपनी को 1000 रुपए देती है. फ़िलहाल ऐसे ही चल रही है ये योजना. आप किसी का भी आधार लिंक करवा सकते हो. इससे ये प्रमाणित नहीं होता है कि वो किसान है या नहीं. और ये जांच के दायरे से भी बाहर है, क्योंकि ये निजी बीमा कंपनियां हैं.”

प्रोफेसर विकास ने कहा कि पहले इस सबकी भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक यानी CAG द्वारा जांच की जाती थी, क्योंकि तब एग्रीकल्चर कोर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया इस स्कीम को चलाती थी.


वीडियो-पीएम मोदी की फसल बीमा योजना को गुजरात सरकार ने सस्पेंड क्यों कर दिया?

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