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वो एक्टर जिसने कहा, 'जा सिमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी' और अमर हो गया

साल 2005 की सर्दियां चल रही थीं. मेरा स्कूल घर से 13 किलोमीटर दूर था. सुबह साइकिल से स्कूल जाते हुए रास्ते में एक चाय की दुकान पर ब्रेक लिया जाता था. वो 12 जनवरी की तारीख थी. पूरे शरीर में सिर्फ आंखें दिख रही थीं बाकी पूरा शरीर कपड़ों से ढका था. कोहरा बेदिल हो रहा था. वहां जिस भट्ठी पर चाय का भगोना चढ़ा था उसके कोने से आग लीक हो रही थी. दस्ताने निकालकर हथेलियां उस आग को दिखाईं तो उंगलियां कंट्रोल में आईं. फिर अखबार उठाया. फ्रंट पेज पर जो खबर दिखी कि एक बार को यकीन नहीं हुआ. बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था “मोगैंबो खामोश हुआ.”

मतलब अमरीश पुरी नहीं रहे. हम जिस उम्र में थे तब तक हिंदी फिल्म में विलेन का मतलब सिर्फ एक था- अमरीश पुरी. इतनी फिल्मों में उनको बिना बालों के देखा था कि ये पक्का हो गया था ये आदमी वाकई टकला है. विग लगाता है. गांव में हमारे घर जब से टीवी आया था और जब से डीडी वन पर शुक्रवार रात साढ़े नौ बजे फिल्म देखना शुरू किया था. हर तीसरी फिल्म में ‘गुंडा’ अमरीश पुरी होता था. बचपन ही था वो जब राम लखन फिल्म में भुजंग की आवाज ने डराया था. अब वो आवाज शांत हो गई थी, पूरी शांति से. बिना किसी गरज तड़प के. एक ब्रेन हैमरेज की वजह से. जिसे फिल्मों में हीरो के सौ छलछंदों के बाद मरते देखा था वो कितनी आसानी से मर गया था.

सोचा करता था कि इस आदमी ने कभी कोई नेक काम भी किया है. ‘सौदागर’ फिल्म के चुनिया मामा को देखा था तो लगा था ये अमरीश की पहली फिल्म है. इतना जवान दिख रहे थे न इसमें. खलनायक जिस फिल्म में अमरीश पुरी रहता था उस फिल्म में कितने भी हीरो हों, राज सिर्फ अमरीश का रहता था. ‘सौदागर’ में ही दिलीप कुमार, राजकुमार के भौकाल को खा गए थे.

मैंने पहली फिल्म पिच्चर हॉल में जो देखी उसका नाम था ‘दिलजले’. हीरो अजय देवगन था. जो तभी से मेरा फेवरेट हो गया. और सोनाली बेंद्रे के आगे फिर कोई जंचना बंद हो गया. लेकिन उस फिल्म से जो हमेशा के लिए दिलो दिमाग में घुस गया वो थे अमरीश पुरी. अजय देवगन तो ‘शिवाय’ तक आकर लिभड़ गए लेकिन अमरीश अब भी वहीं हैं. खास बात ये थी कि जैसे फिल्म के लास्ट में दारा का हृदय परिवर्तन हो जाता है और वो खूंखार आतंकी सरेंडर कर देता है. वैसे ही हमारे दिमाग ने सरेंडर कर दिया था. पता चल गया कि ये आदमी खलनायक नहीं है. आगे इनको तमाम करेक्टर रोल्स में देखकर ये पुख्ता हो गया कि ये आदमी इंडस्ट्री में तालियां खाने आया था, गालियां खाने लगा.

बहुत बाद में जब इंटरनेट का साथ मिला तो हमको दो आंखें मिलीं. फिर इनके बारे में पढ़ते हुए पता चला कि वाकई. अपने बड़े भाई मदन पुरी की तरह ये फिल्मों में आए जरूर थे, लेकिन हीरो बनने. मगर पहले ही स्क्रीन टेस्ट में फेल हो गए. थिएटर करते रहे. 1971 में ‘रेशमा और शेरा’ फिल्म से पहली कायदे की शुरुआत हुई. 40 साल की उम्र थी उस वक्त. फिर खलनायक बनने का सिलसिला शुरू हो गया. ‘विधाता’, ‘अंधा कानून’, ‘हीरो’, ‘निशांत’, ‘दामिनी’, ‘घायल’, ‘रामलखन’, ‘नगीना’ जैसी तमाम फिल्मों में खलनायक बनकर डराया. गालियां झेलीं. 1984 में देश के बाहर इनके मुरीद हुए हॉलीवुड के टॉप डायरेक्टर. स्टीवन स्पीलबर्ग. वो ‘इंडियाना जोन्स एंड टेम्पल ऑफ डूम’ बनाने वाले थे. पुरी को लिख भेजा कि आ जाओ. स्क्रीन टेस्ट ले लें. पुरी ने मना कर दिया. कहा कि अगर टेस्ट भी लेना है तो यहां आओ. वो आए और इनको कास्ट करके ले गए. मोलाराम ‘इंडियाना जोन्स’ का सबसे खतरनाक विलेन था.

खलनायक के तौर पर कोई उनकी कितनी भी तारीफ करे. हमको वो जमे पाजिटिव रोल में ही. उनमें हम हीरो ही देखते रहे. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे में जब कहते हैं “जा सिमरन जा…जी ले अपनी जिंदगी.” तो कितने ही दिलवालों का कलेजा मुंह को आ गया था. विरासत के प्रगतिशील जमींदार जो अपने बेटे तक की शिक्षा का सही इस्तेमाल करना चाहता है. पता नहीं कितने बापों ने उससे सीख ली होगी.

सबसे अजीब था अमरीश को ‘घातक’ के मजबूर बाप के रूप में देखना. हाथ में ताम्रपत्र लिए अपनी खांसी का इलाज कराने बनारस से बंबई और वहां से ढेर सारी बेइज्जती का बोझ लेकर दुनिया से रुख्सत होते हुए देखकर लगा कि किसी और फिल्म में होता तो क्या होता. हीरो की नाक में दम करने वाला आदमी गले में कुत्ते का पट्टा डालकर भौंकने को मजबूर है. वो सनी देओल से पहले खुद उठकर डैनी का सिर उतार लेता.

‘हलचल’ फिल्म के औरत जात से खार खाने वाले बुढ़ऊ. शरारत फिल्म के साथियों से झूठ बोलते वृद्धाश्रम में जीवन बिताते गरीब बुजुर्ग. या ऐतराज फिल्म के अमीर इंडस्ट्रियलिस्ट और कम उम्र बीवी के हसबैंड, सारे रोल्स में उनको देखा. मन ही मन ये पक्का होता गया कि इंडस्ट्री ने उनके साथ अन्याय सा किया है. सिर्फ खलनायक नहीं बनाना चाहिए था.

‘गर्दिश’ के हवलदार पुरुषोत्तम साठे. बेहद ईमानदार पुलिस वाला. आंखों में सपना संजोए बैठा था कि बेटा शिवा पुलिस अफसर बनेगा. लेकिन हो गया उल्टा. पुलिस के घर में चोर. लड़का अंडरवर्ल्ड एजेंट बन गया और बाप का सपना टूट गया. लाचार बेबस बाप को देखोगे तो लगेगा नहीं कि ये अमरीश पुरी हैं.

‘चाची 420’ याद है? कमल हासन सिंगल में डबल रोल किए थे. अमरीश पुरी चाची के पीछे बौराए घूमते रहते हैं. उनमें अपने गांव के तमाम ‘प्रेम पिपासु’ बुजुर्गों का चेहरा दिखता था जो किसी की उंगलियों पर नाचने के लिए तैयार रहते हैं. बस सरपंच की दुलहिन एक बार हंस के बोल दें.

थिएटर की दुनिया से आए और सिल्वर स्क्रीन पर छाए अमरीश पुरी तो उस रोज चले गए. लेकिन एक्टर्स के साथ अच्छी बात ये होती है कि इनको बर्थ या डेथ एनिवर्सरी पर ही नहीं याद किया जाता. हाथ में रिमोट हो और सामने टीवी चल रही हो. टीवी में इनकी कोई फिल्म आ रही हो तो बात और याद एक साथ चल पड़ती है. ये कहीं नहीं जाते. पहले रीलों में कैद हो जाते थे. अब हार्डडिस्क और मेमोरी कार्ड में भर जाते हैं.

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