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देश की एक बड़ी ख़ूनी लड़ाई केरल में चल रही है, जिसपर हम ध्यान नहीं देते

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एक मशहूर कहावत है, ‘आंख के बदले आंख का कानून पूरी दुनिया को अंधा कर देगा’. अफ़सोस कि केरल के ख़ूनी संघर्ष में कोई इस कहावत पर ध्यान नहीं दे रहा है. कन्नूर में आरएसएस और सीपीआई (एम) के बीच दशकों से जारी ख़ूनी यज्ञ में दोनों तरफ से कई लाशों की आहुतियां दी जा चुकी हैं. स्कोर सेटल होता रहता है. कभी इधर का तो कभी उधर का कोई न कोई मौत की राह पर धकेल ही दिया जाता है.

इस महिला पर ये संघर्ष दो बार भारी गुज़रा

60 साल की नारायणी पिनाराई कस्बे में रहती है. इस लड़ाई में अपना पति और बेटा दोनों खो चुकी है. 2002 की बात है. नारायणी के पति उथमान को मार दिया गया. वजह थी पॉलिटिकल राइवलरी. नारायणी ने नसीब का लिखा समझ कर इसे मान लिया. अब 14 साल बाद उसके बेटे को भी इसी अंजाम तक पहुंचाया गया. नारायणी की दुनिया बिखर कर रह गई है. वो कहती हैं,

“मेरा बेटा तो वोट तक नहीं करता था. राजनीति से पूरी तरह दूर था. उसे सिर्फ इसलिए मारा गया कि उसका पिता कभी बीजेपी में था. उसे हमारे घर की दहलीज पर मार डाला गया. हमारी आंखों के सामने.”

रेमिथ की उम्र महज़ 12 साल थी, जब उनके पिता की हत्या हुई थी. अपने पति की हत्या के बाद सिलाई का काम कर के बच्चों को पाला नारायणी ने. इसी उम्मीद में कि एक दिन बेटा सहारा बनेगा, तो कम से कम बुढापा तो चैन से कटेगा. अब उस सहारे को भी छीन लिया गया है.

नारायणी कहती है,

“जब तक पिनाराई विजयन सीएम रहेंगे, मेरे बेटे को इंसाफ नहीं मिलेगा. अगर मैं कभी उनसे मिली तो पूछना चाहूंगी कि मेरे बेटे को क्यों मार डाला गया?”

नारायणी के घर से मुश्किल से एक किलोमीटर दूर एक बंगला है. यहां पिनाराई विजयन रहते हैं. नारायणी की शिकायत है कि उन्होंने एक बार भी उनके घर रुकना मुनासिब नहीं समझा.

ऐसी ही एक मां दूसरे खेमे में भी है

कन्नूर जिले में ही एक गांव है पय्यनूर. यहां एक ऐसी ही अभागी मां माधवी रहती है. उनके बेटे सीवी धनराज को भी पिछले साल घेर कर मारा गया. वो सीपीआई (एम) का कार्यकर्ता था. माधवी ने आख़िरी सांस तक उसे बचाने की कोशिश की. वो बताती है,

“नकाबपोश लोग तीन गाड़ियों में आए. सबसे पहले उन्होंने उसकी टांगों पर प्रहार किए, ताकि वो भाग न सके. इसके बावजूद वो पिछवाड़े में भागने में कामयाब हुआ. फिर उन्होंने भाग कर उसे पकड़ा और तब तक चाकू से मारते रहे, जब तक उन्हें यकीन नहीं हो गया कि वो मर गया है.”

धनराज के मरने के कुछ ही घंटे के अंदर उसका ‘बदला’ ले लिया गया.

बदले की आग में तत्काल एक आहुति दे दी गई

इस बार मरने वाला भारतीय मज़दूर संघ का सदस्य था. सी के रामचंद्रन को भी उसके परिवार के आगे मार डाला गया. उनकी पत्नी उस हादसे को बताते हुए भी कांपती है. रंजिनी ने बताया,

“करीब 10 लोग रात के 12.30 बजे हमारे घर आए. दरवाज़ा तोड़ कर अंदर दाखिल हुए. लिविंग रूम में मेरे पति को पकड़ कर चाक़ू से वार करते रहे. ये सब मेरे 13 साल के बेटे की आंखों के सामने हुआ. कोई हमारी मदद करने नहीं आया. मैं ज़्यादातर लोगों को पहचानती हूं. सारे सीपीआई के कार्यकर्ता हैं.”

रामचंद्रन एक ऑटो-ड्राईवर था. वो BMS का एक्टिव कार्यकर्ता था, जो भाजपा का ही संगठन है. उसने नगर निगम के चुनावों में हिस्सा लिया था. दो साल पहले उसे धमकी भी मिली थी. रंजिनी बताती है कि तब उनका ऑटो जला दिया गया था. और दरवाज़े पर एक हार पड़ा मिला था. जिसके साथ एक चिट्ठी थी. उसमें लिखा था,

“अगली बार हम तुम्हारा सर काट देंगे.”

रंजिनी कहती है कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था वो सच में इसे कर दिखाएंगे.

कन्नूर में क़ानून से कोई नहीं डरता

कन्नूर का इतिहास ख़ून से तरबतर है. 1969 से यहां जानें लेने का सिलसिला जारी है. किसी भयावह गैंगवॉर की तरह. संघी और वामपंथी, दोनों ही विचारधाराएं नफरत के चरम पर हैं यहां. हालांकि राज्य में सीपीआई की सरकार होने से वो अपना अपर हैण्ड समझते हैं. केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद से हाल-फिलहाल ये संग्राम और भी घातक हो गया है.

अरुण जेटली तक केरल जाकर सीपीआई की आलोचना कर आए हैं. इस ब्लड बाथ में और न जाने कितनी जानें जाएंगी. न जाने कितनी मांओं को अपनी औलाद की लाश देखना बर्दाश्त करना होगा. यहां विचारधाराएं लहू में लिथड़ी हुई हैं.


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