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रोहिंग्या को अवैध तरीके से भारत में लाने का नेटवर्क कैसे काम करता है?

भारत के अलग-अलग शहरों में पिछले छह महीनों में कई बार म्यांमार के रोहिंग्या (Rohingya) की गिरफ़्तारी हुई है.  300 से भी ज़्यादा लोग हिरासत में लिए गए हैं. आरोप है कि इन लोगों ने अवैध तरीक़े से भारत में प्रवेश किया. मार्च, 2021 में सबसे ज़्यादा 160 लोग जम्मू में हिरासत में लिए गए थे. लेकिन गिरफ़्तारियों की बात करें तो सबसे ज़्यादा गिरफ़्तारियां उत्तर प्रदेश पुलिस के एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड (UP ATS) ने की है. इसके अलावा कुछ गिरफ़्तारियां, हरियाणा, राजस्थान और तेलंगाना में भी हुई हैं.

6 जून को यूपी के ग़ाज़ियाबाद इलाक़े से नूर आलम की गिरफ़्तारी के बाद UP ATS ने दावा किया था कि नूर रोहिंग्या लोगों को अवैध तरीक़े से भारत लाने में उनकी मदद करता था और फ़र्ज़ी दस्तावेज भी बनवाता था. UP ATS के मुताबिक़ नूर फ़र्ज़ी दस्तावेज बनाने और भारत लाने वाले एक गिरोह का सरगना था जिसकी तलाश पुलिस को क़रीब 6 महीने से थी.

रोहिंग्या कौन हैं, अवैध तरीक़े से भारत में आने का इनका गिरोह कैसे काम करता है. समझने की कोशिश करते हैं.

रोहिंग्या कौन हैं?

रोहिंग्या इंडो-आर्यन नस्ल के लोग हैं. सदियों से ये लोग म्यांमार में रहते आए हैं. वहां रखाइन नाम का प्रांत है. वहां इनकी बहुमत आबादी है. इसमें ज़्यादातर लोग इस्लाम को मानने वाले हैं. लेकिन रोहिंग्या लोगों में हिंदू धर्म को मानने वाले भी हैं. 1948 में म्यांमार को आजादी मिली. तब रोहिंग्या लोगों ने पहचान पत्र के लिए अप्लाई किया. नए आजाद हुए देश में उन्हें नागरिकों के कुछ अधिकार भी मिले. लेकिन कुछ ही सालों में वहां की सरकार के साथ उनका तक़रार होना शुरू हो गया. एक बड़ा कारण धर्म था. म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी है बौद्ध. उनकी रोहिंग्या मुसलमानों से नहीं पटती. सरकार और सेना भी बहुसंख्यकों के साथ है. रोहिंग्या लोगों को बौद्ध धर्म अपनाने के लिए उनपर सरकार ज़बरदस्ती करने लगी. तब हिंदू रोहिंग्या का एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश के रास्ते भारत आ गया. लेकिन मुसलमान रोहिंग्या लोगों की दिक्कत तो तब भी बनी रही, क्योंकि बांग्लादेश कहता है कि रोहिंग्या उसके नहीं, म्यांमार के हैं.

म्यांमार कहता है कि रोहिंग्या उसके लोग नहीं हैं. बांग्लादेशी हैं. बांग्लादेश कहता है कि रोहिंग्या उसके नहीं. इस चक्कर में रोहिंग्या ऐसा समुदाय बन गया, जिसका अपना कोई देश नहीं. ये बांग्लादेश के एक रोहिंग्या रिफ्यूजी कैंप की तस्वीर है (फोटो: रॉयटर्स)
म्यांमार कहता है कि रोहिंग्या उसके लोग नहीं हैं. बांग्लादेशी हैं. बांग्लादेश कहता है कि रोहिंग्या उसके नहीं. इस चक्कर में रोहिंग्या ऐसा समुदाय बन गया, जिसका अपना कोई देश नहीं. ये बांग्लादेश के एक रोहिंग्या रिफ्यूजी कैंप की तस्वीर है (फोटो: रॉयटर्स)

लेकिन म्यांमार ज्यादातर रोहिंग्या को बांग्लादेशी घुसपैठिया कहता है. उसका कहना है कि रोहिंग्या असल में बांग्लादेशी किसानों की एक कौम है. अंग्रेजों के राज में ये लोग म्यांमार (तब का बर्मा) में आ बसे थे. उस समय म्यांमार पर भी अंग्रेजों का ही राज था. उन्होंने बड़ी तादाद में रोहिंग्या मुसलमानों को मजदूरी वगैरह के लिए म्यांमार भेजा.

अगस्त 2017 में म्यांमार की सेना ने इनपर क्रैक्डाउन किया था जिसके बाद बड़ी तादाद में इन्होंने पलायन किया. यूनाइटेड नेशन हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजी (UNHCR) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2017 में क़रीब 7,40,000 रोहिंग्या मुसलमानों में म्यांमार से पलायन किया था.

गिरोह के काम करने का तरीक़ा

अब आप जान गए कि रोहिंग्या भारत आकर बसना क्यों चाहते हैं. इनके भारत पहुंचने का तरीक़ा आसान बिल्कुल भी नहीं है. बल्कि काफ़ी लम्बा है. इसे बारीकी से समझने के लिए द लल्लनटॉप ने UP ATS के IG डॉ जीके गोस्वामी से बात की. उनके मुताबिक़ इनके गिरोह का एक नेटवर्क है जो तीन देश, म्यांमार, बांग्लादेश और भारत में फैला हुआ है. वो कहते हैं,

“म्यांमार से इनका एक मिडल मैन इन्हें बांग्लादेश पहुंचता है. बांग्लादेश में ये लोग बच बचा के कुछ समय बिताते हैं. फिर बांग्लादेश का एक मिडल मैन इन्हें भारत का बॉर्डर क्रॉस कराता है. ये पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से यानी की कूचबिहार ज़िले और मालदा, मुर्शिदाबाद ज़िले से ज़्यादातर भारत में प्रवेश करते हैं. ये मिडल मैन आम तौर पर रोहिंग्या ही होता है, लेकिन ये बॉर्डर पार नहीं करते. और इन सारे मिडल मैन ये सब कुछ पैसों के लिए करते हैं.”

Rohingya
UP ATS द्वारा गिरफ्तार नूर आलम और आमिर हुसैन. (फोटो- तनसीम हैदर)

IG गोस्वामी के मुताबिक़ भारत में जो इनका मिडल मैन होता है वो फ़र्ज़ी दस्तावेज और इनके नौकरी चाकरी का इंतजाम करता है. वो आगे बताते हैं,

“ये जो नूर आलम को हमने गिरफ़्तार किया वो एक मिडल मैन था, जो किसी समय भारत आया था. जो लोग बांग्लादेश से बॉर्डर पार करके यहां आते हैं, उन्हें ये नौकरी, पहचान पत्र का इंतजाम करवाता है.”

दस्तावेज कैसे बनते हैं?

गोस्वामी दावा करते हैं कि (UNHCR) की मदद से ये लोग पहचान पत्र बनाते हैं, जिसमें अपना नाम बदल देते हैं. फिर 1-2 साल काम करने के बाद नाम बदल कर आधार कार्ड और बाक़ी दस्तावेज भी तैयार कर लेते हैं.

दरअसल UNHCR ने बड़े पैमाने पर भारत के रोहिंग्या रेफ़्यूजी के लिए 2017 में लगभग 16,500 रोहिंग्याओं को “उत्पीड़न, मनमानी गिरफ्तारी, हिरासत और निर्वासन को रोकने” में मदद करने के लिए पहचान पत्र जारी किए थे. यह दस्तावेज बनाने का काम अब भी जारी है.

रोहिंग्या मुस्लिमों को म्यांमार के रिखाइन प्रांत से भागना पड़ा था. उन्हें बौद्ध धर्म को तरजीह देने वाली सरकार और आर्मी द्वारा की प्रताड़ना की वजह से म्यांमार छोड़ना पड़ा है.
रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थी एक कैंप में खाने के पैकेट लेने का इंतज़ार करते हुए. (फ़ाइल फ़ोटो)

अब सवाल ये है की क्या ये लोग इस पहचान पत्र के बदौलत भारत में रह सकते हैं? अगर क़ानूनी तौर पर कहें तो नहीं. क्योंकि भारत संयुक्त राज्य के 1951 के रिफ्यूजी कन्वेंशन का हिस्सा नहीं है और इसके साथ-साथ संयुक्त राज्य के 1967 के प्रोटोकॉल का भी पक्षधर नहीं है. संयुक्त राज्य के इन दोनों कन्वेंशन के तहत पीड़ित रिफ्यूजियों को अपने देश में शरण देने की बात कही गई है.

भारत सरकार की सुरक्षा एजेंसियां जिसे पकड़ने में कामयाब होती हैं उनपर फॉरेन एक्ट, 1946 और पासपोर्ट ऐक्ट, 1920 के तहत कार्रवाई करती हैं. मामले में चार्जशीट फ़ाइल होती है और फिर मामला फॉरन ट्रिब्यूनल में जाता है.  वहां सजा तय होती है. भारत सरकार किसी भी रिफ़्यूजी को उसके देश वापस भेज सकती है इसका प्रावधान इस ऐक्ट में है.

लेकिन इसके बावजूद भी भारत में अलग-अलग समुदायों की कई रिफ्यूजी कॉलोनी है. और लाखों रिफ्यूजी इन कॉलोनियों में रहते भी हैं.

भारत में रोज़गार का ज़रिया

पुलिस दावा करती है कि रोहिंग्या लोग ख़ास तरीक़े का काम करते हैं. भारत में आम तौर पर रोहिंग्या मुसलमान कसाईखाने में काम करते हैं. इसके अलावा कई लोग कूड़ा बिनने का भी काम करते हैं. लोग इनको नौकरियां इस वज़ह से देते हैं क्योंकि ये कम पैसों में काम करते हैं.

UP ATS के IG गोस्वामी कहते हैं,

“मार्च महीने में UP ATS ने उन्नाव से जितने भी रोहिंग्या मुसलमानों को गिरफ़्तार किया, ज़्यादातर लोग कसाईखाने में काम करते थे. ये लोग पूरे भारत में फैले हैं. लेकिन ज़्यादा तादाद में दिल्ली/NCR, नूह, हरियाणा, हैदराबाद, अलीगढ़, जम्मू में रहते हैं.”

भारत सरकार की योजना

गृह मंत्रालय ने संसद के शीतकालीन सत्र में कहा था कि केंद्र सरकार को देश में अवैध रूप से रहने वाले विदेशी नागरिकों को हिरासत में लेने और निर्वासित करने के लिए फॉरेन एक्ट, 1946  के तहत प्रावधान मौजूद है. भारत सरकार लगभग 40,000 रोहिंग्या प्रवासियों को निर्वासित करने की योजना बना रही है.


वीडियो- म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों के नरसंहार के पीछे गाय की कुर्बानी है

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