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राही साहब ने खुद का शायर होना सीरियसली नहीं लिया!

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ये आर्टिकल हमारे लिए यूनुस खान ने लिखा है. बड़े भाई सा स्नेह करते हैं वो लल्लनटॉप टीम से. विविध भारती से जुड़े हैं. उस बेचैनी को भरपूर महसूस करते हैं. के ये जो हर पीढ़ी के साथ तमाम किस्से बिना हर्फ पाए दफन हो रहे हैं, उन्हें कैसे बचा लें. ताकि बाद के लोग बांच सकें.

और इसके लिए यूनुस भाई रेडियो वाणी ब्लॉग चलाते हैं. कई बूढ़े बरगदों से इसरार कर इस पर लिखवाते हैं. लगातार सोशल मीडिया पर सार्थक ढंग से एक्टिव रहते हैं. और जहां कभी भी गीत संगीत की बात होती है. अपनी सहयोगी आमद दर्ज कराते हैं.

आज राजी मासूम रजा का देहांत दिन है. हम सुबह से उन पर कुछ कुछ कर रहे हैं. किस्से, किताबों के हिस्से. नज्में. इन्हीं के दरमियान उन्होंने कुछ नई चीजों की तरफ हमारा ध्यान दिलाया. फेसबुक पर. हमने ढिठाई से उन्हें फोन दाग दिया. कौल ले लिया कि वे इसे लिखें. आज ही लिखें.

और देखिए. उनका लाड. कि अब ये आपके सामने है. और जब इसके बदले शुक्रिया कहा. तो बोले शुक्रिया न कहो भाई. राही जमाने से हमारे पसंदीदा हैं. बस एक सलाम भेजा है उन्हें.
आपको भी लल्लनटॉप सलाम यूनुस भाई-

ये बात इसी तरह के या इससे भी बाद के दिनों की है, लेकिन समय के स्केल पर बहुत पीछे. अस्सी का दशक थककर बैट नब्बे को सौंप रहा था. हम मध्य प्रदेश के छोटे-से शहर सागर के सरकारी स्कूल के पीछे बनी भूली-बिसरी जिला लाइब्रेरी में राही मासूम रज़ा को पढ़ रहे थे. तब इतना जानते थे कि वो फिल्में लिखते हैं और बड़े साहित्यकार हैं. बाद में एक-के-बाद एक जित्ते ‘राही’ वहां थे, सब पढ़े. ‘आधा गांव’, ‘टोपी शुक्ला’, ‘ओस की बूंद’ वग़ैरह.

जब अपने शहर को छोड़कर समंदर किनारे के इस शहर आए तो जगजीत की ये ग़ज़ल बहुत रोशनी देती थी ‘हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद’… तब भी हमको पता नहीं था कि ये हमारे राही साहब ने लिखी है. बहुत दिनों बाद नज़र पड़ी तो शायर की जगह लिखा मिला-डॉ. राही मासूम रज़ा.

हम तो हैं परदेस में, देस में निकला होगा चांद
अपनी रात की छत पर, कितना तनहा होगा चांद

जिन आंखों में काजल बनकर, तैरी काली रात
उन आंखों में आंसू का इक, कतरा होगा चांद

रात ने ऐसा पेंच लगाया, टूटी हाथ से डोर
आंगन वाले नीम में जाकर, अटका होगा चांद

चांद बिना हर दिन यूं बीता, जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा, कैसा होगा चांद

अब उसके बहुत दिन बाद की बात. बंबई अररररारारा….मुंबई आने के बाद भी खोजबीन की पुरानी आदत नहीं गयी. विविध भारती की लाइब्रेरी में धूल की परत हटाकर रिकॉर्ड निकालते. सुनते. ऐसे ही एक रिकॉर्ड बरामद हुआ. ‘मिसिंग यू’. राही मासूम रज़ा की बहू और जानी-मानी पॉप गायिका पार्वती ख़ान का गाया ये एलबम देखकर हैरत से हमारी आंखें जो चौड़ी हुईं- तो आज तक वैसी ही हैं. क्यों कि पार्वती को हम ‘जिमी जिमी आजा’ टाइप गानों से पहचानते थे. इस एलबम को खूब सुना. इत्ता सुना कि वो हमारी रगों में बस गया. इससे बहुत बाद के दिनों में राही साहब की इस गायिका बहू का इंटरव्यू लेने का मौक़ा मिला, तो अपन ने इस एलबम का जिक्र छेड़ दिया. तब उन्होंने बताया कि ये एलबम सन 1984 में बना था.

राही के बेटे जाने माने सिनेमेटोग्राफर नदीम खान से ब्याह रचाने के बाद जब पार्वती राही साहब के घर आईं तो अकसर उनसे उन्हीं के अशआर सुना करती थीं. ससुर-बहू के इस प्यारे रिश्ते ने इस एलबम को जन्म दिया. असल में राही साहब ने शायर के अपने पहलू को कभी सीरियसली लिया ही नहीं. शायद इसलिए बहुत लोग उनकी ग़ज़लों से वाकिफ़ नहीं हो पाए. शुक्र है कि पार्वती ने अब वो एलबम ‘यू-ट्यूब’ की खिड़की पर सजा रखा है. चलिए पहले इन ग़ज़लों की राहों से होकर गुज़रें. पहली ग़ज़ल जो मुझे बेहद पसंद है, वो है—’क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए/ क्या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए’. इस ग़ज़ल का ये शेर तो आज के माहौल पर कितना फिट है—’हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में रहते हैं/ जान पे खेल के जब सच बोलें तब झूठे कहलाए’.

क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए
क्या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए.

हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं
जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए.

इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन
जाने क्या बातें करते हैं आपस में हमसाए.

हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही
आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए.

क्या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ..

इसी एलबम में हमारी एक और पसंदीदा ग़ज़ल है. भगवान क़सम. इसे सुनते हैं तो अपने पुराने शहर भोपाल, सागर, जबलपुर बहुत बहुत याद आते हैं. अपने शहरों को लांघ कर बाहर आए हम सब लोगों के लिए ये बहुत ही उम्दा ग़ज़ल है. इसके साथ राही का एक शेर भी आपकी नज़र कर दें—’सोचता था कैसे कटेंगी रातें परदेस की/ ये सितारे वो वही है अपने आंगन वाले’.

जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं
शाखे गुल कैसे हैं खुश्बू के मकां कैसे हैं.

ऐ सबा तू तो उधर से ही गुज़रती होगी
उस गली में मेरे पैरों के निशां कैसे हैं.

कहीं शबनम के शगूफ़े कहीं अंगारों के फूल
आके देखो मेरी यादों के जहां कैसे हैं.

मैं तो पत्थर था मुझे फेंक दिया ठीक किया
आज उस शहर में शीशे के मकां कैसे हैं.

जिनसे हम छूट गये अब वो जहां कैसे हैं..

लेकिन राही की एक ग़ज़ल जिसे आप सब बहुत जानते-पहचानते हैं उसे अहमद हुसैन-मोहम्मैद हुसैन ने बहुत मन से गाया है. मिले तो ज़रूर सुनें, और हमें भी सुनाएं. कमेंट बॉक्स में साझा कर के.

अजनबी शहर के अजनबी रास्ते, मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे
मैं बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे.

ज़हर मिलता रहा ज़हर पीते रहे, रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे,
ज़िंदगी भी हमें आजमाती रही, और हम भी उसे आजमाते रहे.

ज़ख्म जब भी कोई जहन-ओ-दिल पे लगा, ज़िंदगी की तरफ एक दरीचाखुला,
हम भी गोया किसी साज़ के तार हैं, चोट खाते रहे गुन-गुनाते रहे.

कल कुछ ऐसा हुआ मैं बहोत थक गया, इसलिए सुन के भी अनसुनी कर गया,
कितनी यादों के भटके हुआ कारवां, दिल के ज़ख्मों के दर खट-खटाते रहे.

बस एक बात और बता दें. फिर टाटा-बाय-बाय. राही मासूम रज़ा और पंडित नरेंद्र शर्मा बी.आर.चोपड़ा के धारावाहिक ‘महाभारत’ से जुड़े थे. एक ही कमरे में बैठते. चिंतन-मनन-बहस-मुबाहिसे सब होते. एक दिन पंडित जी ने दुनिया को अलविदा कह दिया. राही ने अपने इस साथी पर एक मार्मिक कविता रची. जो पंडित नरेंद्र शर्मा की सुपुत्री लावण्या शाह के सौजन्ये से हमें प्राप्त हुई है- पढिए.

“वह पान भरी मुस्कान”

वह पान भरी मुस्कान न जाने कहां गई?
जो दफ्तर में, इक लाल गदेली कुर्सी पर,
धोती बांधे, इक सभ्य सिल्क के कुर्ते पर,
मर्यादा की बंडी पहने, आराम से बैठा करती थी,
वह पान भरी मुस्कान तो उठकर चली गई!
पर दफ्तर में, वो लाल गदेली कुर्सी अब तक रक्खी है,
जिस पर हर दिन,अब कोई न कोई, आकर बैठ जाता है
खुद मैं भी अक्सर बैठा हूं
कुछ मुझ से बडे भी बैठे हैं,
मुझसे छोटे भी बैठे हैं,
पर मुझको ऐसा लगता है
वह कुरसी लगभग एक बरस से खाली है !


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