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PM मोदी ने 'जनता कर्फ्यू' की अपील की है, इसी बहाने जान लीजिए कि असली कर्फ्यू में क्या होता है

19 मार्च, 2020 को रात आठ बजे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया. उनका संबोधन कोरोना वायरस को लेकर था. उन्होंने देशवासियों से 22 मार्च के दिन ‘जनता कर्फ़्यू’ लगाने की अपील की. उन्होंने कहा कि इस महामारी से लड़ने के लिए जनता का सहयोग बेहद जरूरी है. जनता कर्फ्यू रविवार को सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक रहेगा.

पीएम मोदी ने कहा कि इससे पता चलेगा कि हम कोरोना महामारी के संकट से निपटने के लिए कितने तैयार हैं. लेकिन जनता कर्फ्यू आमतौर पर लगने वाले कर्फ्यू से अलग होगा. पीएम मोदी के अनुसार, जनता कर्फ्यू यानी जनता के लिए, जनता द्वारा खुद पर लगाया गया कर्फ्यू होगा. यानी इसमें लोगों को खुद से ही अपने ऊपर बाहर जाने की पाबंदी लगानी होगी. ऐसे में जानते हैं कि असली कर्फ्यू कैसा होता है? नियम क्या होते हैं? किन हालातों में लगता है?

आया कहां से है ये कर्फ्यू 

कर्फ्यू का मतलब है एक ऐसा आदेश जिसमें घरों से निकलने पर पाबंदी होती है. लोगों के लिए इसका पालन करना अनिवार्य होता है. ऐसे आदेश कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए प्रशासन जारी करता है. जैसे दंगों, हिंसक प्रदर्शनों या हिंसा की आशंका को देखते हुए. कर्फ्यू शब्द फ्रेंच भाषा के couvre-feu से निकला है. couvre-feu का मतलब होता है आग को बुझाना या छुपाना. यह शब्द 14वीं शताब्दी के आसपास चलन में आया. उस समय रात के समय घंटी बजाई जाती थी. ताकि लोग सोने से पहले खाना बनाने या किसी दूसरे काम के लिए जलाई गई आग को बुझा दें. ऐसा इसलिए किया जाता था क्योंकि आग जली रहने पर उसके फैलने का खतरा होता था.

couvre-feu का मतलब होता है आग को बुझाना या छुपाना. यह शब्द 14वीं शताब्दी के आसपास चलन में आया.
couvre-feu का मतलब होता है आग को बुझाना या छुपाना. यह शब्द 14वीं शताब्दी के आसपास चलन में आया.

घंटी बजाए जाने के बाद सुबह उठने तक के समय को couvre-feu कहा जाता था. यानी इस दौरान आग का काम नहीं होता था. 18वीं सदी के करीब कर्फ्यू शब्द का इस्तेमाल लोगों की आवाजाही को रोकने के लिए होने लगा था. आसान भाषा में कहें तो कर्फ्यू मतलब पाबंदी.

कैसे लागू होता है कर्फ्यू

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील कृष्ण उपाध्याय ने बताया कि कर्फ्यू सीधे नहीं लगाया जाता है. प्रशासन को जब लगता है कि हालात बेकाबू हो सकते हैं तब वह कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसीजर-1973 यानी CRPC की धारा 144 लगाती है. इसके आदेश डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट की तरफ से जारी किए जाते हैं. इस धारा के लागू होने के बाद 4 या इससे ज्यादा लोग एक साथ इकट्ठे नहीं हो सकते हैं. किसी तरह का धरना प्रदर्शन नहीं किया जा सकता है. न ही नारेबाजी की जा सकती है. अगर प्रशासन को लगे कि धारा 144 से बात नहीं बन रही है तो इसे कर्फ्यू में तब्दील कर दिया जाता है. कर्फ्यू के दौरान पुलिस किसी भी व्यक्ति को शक के आधार पर गिरफ्तार कर सकती है.

23 से 25 फरवरी तक दिल्ली के कुछ इलाकों में काफी हिंसा हुई थी, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. फिर कर्फ्यू लगाना पड़ा था. (फोटो- India Today)
23 से 25 फरवरी तक दिल्ली के कुछ इलाकों में काफी हिंसा हुई थी, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी. फिर कर्फ्यू लगाना पड़ा था. (फोटो- India Today)

कर्फ्यू वाले हालात तब बनते हैं जब कानून व्यवस्था पर गंभीर संकट हो. ऐसे हालात दंगों के वक्त, शहर या कस्बे के हालात काफी ज्यादा बिगड़ जाने पर या फिर इमरजेंसी के वक्त होते हैं. इस दौरान किसी भी व्यक्ति के घर से बाहर निकलने पर प्रतिबंध होता है. बाजार, दफ्तर और पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया जाता है. जैसे संशोधित नागरिकता कानून लागू होने के बाद उत्तर-पूर्व में कई जगहों पर हिंसा हुई थी. इस पर काबू पाने के लिए प्रशासन को कर्फ्यू लगाना पड़ा था. इसी तरह दिल्ली में फरवरी में हुई हिंसा के बाद कर्फ्यू लगाया गया था.

लॉ एंड ऑर्डर पर खतरा यानी कर्फ्यू को बुलावा

पूर्व आईएएस और जयपुर के कलेक्टर रहे जगरूप सिंह यादव ने बताया कि लॉ एंड ऑर्डर यानी कानून व्यवस्था राज्य सरकार की जिम्मेदारी है. लोग कानून का पालन करें और शांति व्यवस्था बनाए रखें इसके लिए प्रशासन जिम्मेदार होता है. जब लगे कि व्यवस्था बिगड़ सकती है तो धारा 144 लागू की जाती है. अगर पूरे राज्य में माहौल खराब होने की आशंका हो तो फैसला राज्य का गृह मंत्रालय लेता है.

जिले में इस तरह की फैसला लेने का अधिकार डीएम के पास होता है. एक बार धारा 144 लगाने के बाद यह दो महीने तक जारी रहती है. इसे अधिकतम छह महीने तक जारी रखा जा सकता है. इससे ज्यादा समय तक जारी रखने के लिए दोबारा से आदेश जारी करना होता है.

जुलाई 2016. कश्मीर. कर्फ्यू के दौरान एक आदमी सड़क पर पुलिस वाले को बाहर निकलने की वजह के तौर पर दवाई की शीशी दिखाते हुए. दवाई खरीदने निकलना उस आदमी की मजबूरी है. उसकी तलाशी लेना पुलिस वाले की. (फोटोःरॉयटर्स)
जुलाई 2016. कश्मीर. कर्फ्यू के दौरान एक आदमी सड़क पर सुरक्षाकर्मी को बाहर निकलने की वजह के तौर पर दवाई की शीशी दिखाते हुए. दवाई खरीदने निकलना उस आदमी की मजबूरी है. उसकी तलाशी लेना सुरक्षाकर्मी वाले की. (फोटोः रॉयटर्स)

उन्होंने बताया कि जब प्रशासन को लगता है कि अवैध रूप से लोग जमा हो रहे हैं तो धारा 144 लगाई जा सकती है. अवैध से मतलब है कि बिना प्रशासन की इज़ाजत के. धारा 144 तोड़ने पर पुलिस पकड़ सकती है. लेकिन अक्सर ऐसे मामलों में कुछ घंटे हिरासत में रखने के बाद लोगों को छोड़ दिया जाता है. अगर हालात ज्यादा खराब होने की आशंका हो तो कर्फ्यू लगा दिया जाता है.

कर्फ्यू तोड़ने पर पुलिस सख्त कदम उठा सकती है. हालात के हिसाब से वह व्यवस्था तोड़ने वालों को गोली भी मार सकती है. लेकिन कर्फ्यू जैसे हालात में भी छात्रों की परीक्षा, शवयात्रा, शादी जैसी जरूरी चीजों पर ढील दी जाती है. लेकिन इसके लिए प्रशासन से मंजूरी ली जाती है. इस दौरान प्रशासन की मर्जी से मेडिकल स्टोर, अस्पताल खुले रहते हैं.

लेकिन जनता कर्फ्यू में ऐसी कोई भी पाबंदी नहीं होती है. इसमें सिर्फ जनता की ये जिम्मेदारी है कि वो खुद को और अपने पूरे परिवार को घर से बाहर जाने से रोकें.


Video: कोरोना वायरस: पीएम नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में क्या कहा?

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