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हिंदू और मुसलमान खुद को एक-दूसरे से अलग मानते हैं, क्या Pew Research इतना ही बताता है?

“भारत के औपनिवेशिक शासन से मुक्त होने के 70 से ज़्यादा सालों के बाद ज्यादातर भारतीयों को ऐसा लगता है कि उनका देश स्वतंत्रता के बाद के अपने आदर्शों पर खरा उतरा है. एक ऐसा समाज जहां कई धर्मों के अनुयायी स्वतंत्र रूप से रह सकते हैं और अपने-अपने धर्म का पालन कर सकते हैं.”

खुद को न्यूट्रल फैक्ट टैंक बताने वाले अमेरिकी थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर (Pew Research Center या PRC) ने भारत को लेकर अपने एक शोध में ये बात कही है. दुनियाभर में अलग-अलग मुद्दों पर रिसर्च करने वाली इस संस्था ने भारत में धार्मिक सहिष्णुता और अलगाव पर अपनी रिसर्च रिपोर्ट जारी की है. 4 महीने से ज़्यादा लंबे चले इस शोध में लगभग 30 हजार भारतीयों ने हिस्सा लिया. शोध के कई चर्चा में बने हुए हैं. इसके कुछ ख़ास पहलुओं पर नज़र डालते हैं.

कितना बड़ा है अध्ययन?

प्यू रिसर्च की 16 पन्नों की ये रिसर्च रिपोर्ट भारत में इस शोध संस्थान द्वारा किए गए अब तक के सबसे बड़े सर्वेक्षण का परिणाम है. इस रिपोर्ट के लिए PRC ने 29 हजार 999 भारतीयों से बात की. इनमें से 22 हजार 975 लोगों ने अपनी पहचान हिंदू धर्म को मानने वालों के रूप में की. 3336 लोगों ने खुद को मुस्लिम बताया. सिख धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या 1782 थी. इसके अलावा ईसाइयों की संख्या 1011, बौद्धों की 719 और जैन धर्म के लोगों की संख्या 109 थी. वहीं, 67 ऐसे लोग भी थे जो किसी भी धर्म को नहीं मानते थे. आरटीआई इंटरनेशनल नाम की एक संस्था के निर्देशन में इन लोगों के इंटर्व्यू लिए गए.

क्या कहता है रिसर्च?

ये रिसर्च दावा करता है कि एक ही देश में, एक ही संविधान के तहत रहने के बावजूद भारत के प्रमुख धार्मिक समुदायों के लोग एक-दूसरे को अलग मानते हैं. शोध के मुताबिक, 66 प्रतिशत बहुसंख्यक हिंदू खुद को मुसलमानों से बहुत अलग मानते हैं. वहीं, 64 प्रतिशत मुसलमान भी ये मानते हैं कि वे हिंदुओं से बहुत अलग हैं. लेकिन दो-तिहाई जैन और लगभग आधे सिख कहते हैं कि हिंदुओं के साथ उनका बहुत कुछ मिलता जुलता है.

Hindu Dharma
तस्वीर- पीटीआई

इस रिसर्च के मुताबिक़, अलग-अलग धर्मों के लोगों में ये अंतर उनकी परंपराओं और आदतों में भी साफ़ देखने को मिलता है. उदाहरण के लिए, धार्मिक आधार पर विवाह. स्टडी में शामिल ज्यादातर लोगों ने कहा कि अपने समुदाय के लोगों को किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति के साथ शादी करने से रोकना बहुत ज़रूरी है. अध्ययन के मुताबिक, भारत के दो-तिहाई हिंदू अंतर्धार्मिक विवाह को रोकना चाहते हैं.

मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा भी  ऐसा ही महसूस करता है. रिसर्च के मुताबिक, 80 प्रतिशत मुसलमानों का कहना है कि मुस्लिम महिलाओं को उनके धर्म से बाहर शादी करने से रोकना बहुत ज़रूरी है. वहीं, 76 प्रतिशत मुसलमान मानते हैं कि मुस्लिम पुरुषों को ऐसा करने से रोका जाना चाहिए.

मित्रता में भी ये बात साफ़ झलकती है. रिसर्च कहता है कि भारत में लोग आमतौर पर अपने ही धर्म के व्यक्ति से चिपके रहना पसंद करते हैं. अधिकतर हिंदू बताते हैं कि उनके अधिकांश या सभी करीबी दोस्त भी हिंदू हैं. हिंदू आबादी का बहुसंख्यक होना इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है. लेकिन यही बात सिख और जैन धर्म को मानने वालों में दिखती है. इन समुदायों में भी मित्रता अमूमन अपने ही धर्म के व्यक्ति से की जाती है.

राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और बीजेपी

शोध से जुड़े सर्वेक्षण में ये पाया गया है कि हिंदू अपनी धार्मिक और राष्ट्रीय पहचान को जोड़कर देखते हैं. लगभग दो-तिहाई हिंदुओं (64%) का कहना है कि “सच्चा भारतीय” होने के लिए हिंदू होना बहुत ज़रूरी है.

रिसर्च के मुताबिक, 59 प्रतिशत हिंदू ये भी कहते हैं कि वे इसलिए भारतीय हैं, क्योंकि वे हिंदी बोलते हैं. भारत में कई भाषाएं और बोलियां हैं. हिंदी उनमें से सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली भाषाओं में से एक है. फिर भी ज्यादातर हिंदू केवल इसी भाषा को बोलने की योग्यता को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ कर देखते हैं.

रिसर्च कहता है कि ये एक बड़ा कारण है कि हिंदुओं की एक बड़ी आबादी भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा से प्रभावित है. 2019 के लोकसभा चुनावों में 60% हिंदू मतदाताओं ने बीजेपी को वोट दिया. उनके लिए हिंदू होना और हिंदी बोलना सच्चा भारतीय होने के लिए ज़रूरी है.

प्रतीकात्मक इमेज.
प्रतीकात्मक इमेज.

मुसलमानों को भारतीय होने पर गर्व

रिसर्च से जुड़ी रिपोर्ट में भारतीय समाज के दूसरे पहलुओं का भी जिक्र है. इनके मुताबिक, भारत के 95 प्रतिशत मुसलमान कहते हैं कि उन्हें भारतीय होने पर बहुत गर्व है. वे भारतीय संस्कृति के प्रति भी बहुत उत्साह दिखाते हैं. करीब 85 मुसलमान इस बात से सहमति जताते हैं कि “भारत के लोग पर्फ़ेक्ट नहीं हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति दूसरों के मुक़ाबले श्रेष्ठ है.”

रिसर्च में ऐसे मुसलमानों की संख्या काफी कम निकलकर आई है, जो भारत में काफी भेदभाव का सामना करने का दावा करते हैं. शोध में शामिल हुए मुसलमानों में से केवल 24 प्रतिशत ही ऐसा मानते हैं. यही दावा करने वाले हिंदुओं की संख्या 21 प्रतिशत पाई गई है. इन लोगों को भी ऐसा लगता है की उन्हें बहुत ज़्यादा धार्मिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

सांप्रदायिक हिंसा को लेकर ज्यादातर हिंदू और मुसलमान एक समान सोच रखते हैं. प्यू रिसर्च के मुताबिक, 65 प्रतिशत हिंदू और इतने ही मुसलमान मानते हैं कि सांप्रदायिक हिंसा देश की एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या है.


वीडियो- मोहन भागवत ने हिन्दू-मुस्लिम की बात की, क्या बजरंग दल और BJP ने सुना? 

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