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आज की सबसे बड़ी ख़बर, देश में ख़ुशी की लहर

आपने कभी गौर किया है, दुख बिन बुलाए आते हैं और सुख शेड्यूल्ड होते हैं. वैल, ज़्यादातर केसेज़ में. इसलिए ही तो सुख और ख़ुशियां कैलेंडर पर मार्क की जा सकती हैं. कि अमुक तारीख़ को सैलरी आएगी, फ़लानी तारीख़ को बड्डे है, ढिमका तारीख़ को फ़ेस्टिवल है.

यानी दुख ऑर्गेनिक होते हैं. जबकि सुख और ख़ुशियां या तो शेड्यूल्ड होती हैं और शेड्यूल्ड न हों तो हम उन्हें क्रिएट करते हैं. जैसे: चलो कहीं घूमने जाते हैं, चलो पार्टी करते हैं, चलो त्योहार मनाते हैं. लेकिन हम कभी नहीं कहते, चलो बीमार पड़ते हैं (जब तक कि बीमार पड़ने के दुख से कोई बड़ा सुख नहीं साधा जा रहा हो, जैसे ऑफ़िस या स्कूल बंक करने का सुख). हम कभी नहीं कहते कि चलो बेरोज़गार हो जाते हैं… (डार्क ह्यूमर)

इसी क्रम में हम कई बार कोई एक्सपेक्टेड दुख न आए तो भी उसे सुख की तरह ही कंसिडर करते हैं. जैसे पिछली रात शराब पीकर भंड होने के बाद भी आज सुबह हैंग ओवर ‘न’ होने का सुख. एग्जाम में ख़ाली कॉपी छोड़ देने के बावज़ूद फेल ‘न’ होने का सुख. कोविड-19 ‘न’ होने का सुख, या हो गया तो मरे ‘नहीं’ इसका सुख. (डार्क ह्यूमर अगेन) हाउसफ़ुल मूवी का सीक्वल ‘न’ आने का सुख.

ये सारे डबल नेगेशन सुख हैं. जिसमें कुछ ‘न’ होने की प्रधानता है. लेकिन दुखों का न होना भी ख़ुशी इसलिए है, क्यूंकि ख़ुशियां बहुत महंगी जो हो रखी हैं. महंगी ख़ुशियों से याद आया, ऐसा ही एक सुख है कई दिनों तक पेट्रोल-डीज़ल के महंगे ‘न’ होने का सुख. और इस सुख की पुष्टि करते हैं, इन खबरों से भरे अख़बार और न्यूज़ पोर्टल.

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राहतों की बात करते इस स्टोरी के साथ नत्थी किए नौ स्क्रीन शॉट्स देखिए. आई मीन सौ दर्द हैं, नौ राहतें. पर ये ‘नौ’ राहतें कम से कम ‘नो’ राहतों से तो बेहतर हैं. डबल नेगेशन, यू सी.

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इन राहतों को पढ़कर राहत इंदौरी याद आ रहे-

ये ज़रूरी है कि आँखों का भरम क़ायम रहे
नींद रखो या न रखो ख़्वाब मेयारी रखो

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जब राहतें नौ हैं तो राहत इंदौरी भी एक क्यूं हों? लीजिए एक और शेर आपकी नज़र-

गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना
जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा

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गुज़िश्ता बोले तो, बीते. और ज़ख़्म बोले तो… एक हो तो बताएं…

वैसे एंड में मुझे दिल्ली पुलिस का एक विज्ञापन याद आता है. काफ़ी पुराना था. पर अभी भी थोड़ा बहुत याद है. क्यूंकि वो क्रिएटिव बहुत था. तो उस प्रिंटेड विज्ञापन में ऊपर फ़िगर्स दिए थे कि दिल्ली पुलिस ने कितने बम डिफ़्यूज़ किए, कितनी वारदातों को होने से रोका. और नीचे बड़े अक्षरों में जो वन लाइनर लिखा था उसका सार कुछ यूं था-

जो ख़बरें न बनीं उनके पीछे दिल्ली पुलिस थी.

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लेकिन आज के दौर में जो ख़बरें न बनीं वो भी ख़बरें हैं. ब्रेकिंग न्यूज़. दिन की सबसे बड़ी ख़बर. किसी ख़बर का न होना. शेयर किए बिना न रह पाएंगे वो जानकारी, जिसमें कोई नई जानकारी नहीं है. और हार्ट अटैक्स देने वाली खबरों के बीच, हार्ट अटैक से बच जाना भी एक ख़बर है…

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वेलकम टू नियो-जर्नलिज़्म. जिसका सबसे ज़्यादा फ़ोकस SEO और कीवर्ड्स पर है. क्यूंकि ‘पेट्रोल-डीज़ल’ हॉट टॉपिक जो है. दुनिया भर में पेट्रोल-डीज़ल ऑल टाइम हाई पर हैं. ब्रिटेन में लोग ‘नोटबंदी’ सरीखी लाइन लगा के खड़े हैं. (नोटबंदी वाला मेटाफ़र ‘इनको’ बुरा लगा तो ‘उनको’ भी बुरा लगवा देते हैं: ‘लाइसेंस राज के वक्त टेलिफ़ोन और LPG’ सरीखी लाइंस).

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…और भला SEO और कीवर्ड्स वाला मौक़ा हम भी क्यूं चूकते. हमने भी कर डाली पेट्रोल डीज़ल जैसे कीवर्ड्स को कवर करती ये स्टोरी. (सेल्फ़ डेप्रिशिएटिंग ह्यूमर). क्यूंकि स्टोरीज़ पर नम्बर्स लाना बड़ा महंगा जो हो रखा है. (कॉल बैक ह्यूमर)

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अंततः – आप पूछेंगे नौवाँ स्क्रीन शॉट कहां है. तो 8 से पर्याप्त समझ में आ ही गया होगा आपको. नौवाँ वाला फ़ीचर इमेज में लगा है.


वीडियो देखें: इस कारखाने में भैंस की सींग से ऐसे सामान बनते हैं, जिनकी बिक्री विदेशों तक में होती है-

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