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क्या है सासाराम रेप केस, जिसे लोग कठुआ रेप केस के जवाब में पेश कर रहे हैं?

इस मुल्क को न जाने क्या हो गया है. पहले सिर्फ औरतें सेफ नहीं थी. अब बच्चियों तक को नहीं बख्शा जा रहा. इधर कुछ दिनों से लगातार ऐसी ख़बरें आ रही हैं जिनमें किसी दरिंदे की हवस का निशाना कोई बच्ची रही. कठुआ की मासूम बच्ची का ज़ख्म अभी ताज़ा ही था कि बिहार के सासाराम में भी ऐसा कुछ हो गया. रोहतास जिले के करगहर में एक छह साल की बच्ची के साथ रेप हुआ. ये घटना जितना व्यथित करती है, उतना ही गुस्सा भी दिलाती है.

बच्चियां अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं

छह साल की इस अबोध बालिका को नोचने वाला और कोई नहीं, उसका पड़ोसी ही था. मेराज आलम नाम के इस आरोपी की उम्र 27 साल है. वो टेलर का काम करता था. ये बच्ची अपने घर से बाहर खेल रही थी. इसी दौरान मेराज आलम ने उसे चॉकलेट का लालच दिया और घर के ही करीब मौजूद एक झोपड़ी में ले गया. बच्ची के घर से कुछ ही दूरी पर थी ये झोपड़ी.

करगहर पुलिस स्टेशन के एसएचओ देवानंद शर्मा ने बताया कि ज़बरदस्ती का शिकार बच्ची ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी थी. आवाज़ सुनकर बच्ची का चाचा बबन सिंह घर से निकल आया और झोपड़ी की तरफ गया. उसने देखा कि आरोपी मेराज आलम झोपड़ी से निकल रहा था. अंदर बच्ची ख़ून के तालाब में पड़ी हुई थी.

सासाराम केस में लोगों ने जमकर प्रोटेस्ट किया.
सासाराम केस में लोगों ने जमकर प्रोटेस्ट किया.

तुरंत पुलिस को सूचना दे दी गई. पुलिस ने आननफानन आरोपी को गिरफ्तार भी कर लिया. बच्ची की गंभीर हालत देखते हुए उसे इलाज के लिए सासाराम भेज दिया गया. जहां तबियत में उचित सुधार न होने पर उसे वाराणसी शिफ्ट कर दिया गया.

लोगों का आक्रोश

उधर लोगों में इस घटना को लेकर बहुत ज़्यादा रोष है. पहले लोगों ने थाने का घेराव किया. वो चाहते थे कि आरोपी को उनके हवाले किया जाए. जैसे-तैसे पुलिस ने लोगों को समझाकर घर भेजा. इसके बाद दूसरे दिन लोग फिर से सड़कों पर उतर आए. जगह-जगह जाम लगा दिया. टायर जलाए. करगहर में एक दुकान में भी आग लगा दी गई. कहते हैं कि मामले का साम्प्रदायीकरण करने की भी कोशिशें हुई. मेराज आलम के मुस्लिम होने की वजह से मुसलमानों के खिलाफ नारे भी लगे. बहरहाल, आरोपी को जेल भेज दिया गया है.

प्रोटेस्ट करते लोग.
प्रोटेस्ट करते लोग.

रेप अपने आप में एक घृणित क्राइम है. उसपर किसी बच्ची के साथ रेप तो घिनौनेपन की इंतेहा है. हर संवेदनशील शख्स इस करतूत के विरोध में खड़ा मिलेगा. ऐसे गुनाहों की सज़ा जल्द मिलना सुनिश्चित होना चाहिए. ऐसे तमाम क्राइम एक सभ्य समाज के माथे पर बदनुमा दाग है. इनकी जितनी मजम्मत की जाए कम है.

मामला सासाराम बनाम कठुआ कैसे हो गया?

इन वारदातों के साथ-साथ उस मानसिकता की भी आलोचना होनी चाहिए, जो ऐसी किसी भी घटना को मुल्क का महाल ख़राब करने के लिए इस्तेमाल करते हैं. सोशल मीडिया पटा पड़ा है ऐसी पोस्ट्स से, जिनमें ये चीख-चीख कर कहा जा रहा है कि मीडिया में कठुआ की बच्ची को लेकर तो बात हो रही है लेकिन सासाराम केस इग्नोर किया जा रहा है. बिना तथ्यों को जाने लोग इसे बच्चियों के मज़हब से जोड़ रहे हैं. साफ़ कह रहे हैं कि मुस्लिम बच्ची का मामला चर्चा में है और हिंदू बच्ची का दबा दिया गया है.

अव्वल तो ऐसा है नहीं. सासाराम रेप केस पर तमाम मीडिया हाउसेस ने ख़बरें की हैं. आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी से लेकर बाद में हुए बवाल तक सब कुछ, सब जगह छपा है. दूसरा ये कि कठुआ वाले केस को लेकर जो देश की जनता एक बड़ा हिस्सा आक्रोश में है, वो बेवजह नहीं है. कठुआ केस कई मामलों में सासाराम से अलग है.

# कठुआ केस में बच्ची के साथ बदकारी किसी ख़ास समुदाय को सबक सिखाने के उद्देश्य से की गई. ये एक सोचा समझा घृणित क्राइम था. जिसका मकसद ही भयानक था.
# कठुआ केस में आरोपियों को बचाने के लिए लोग सड़कों पर उतर आए थे. तिरंगा तक फहराया गया उन हैवानों के समर्थन में. ऐसा सासाराम के केस में नहीं हुआ है.
# सोशल मीडिया पर भी लोग दबी ज़ुबान में इस केस को साम्प्रदायिक रंग देने की फ़िराक में हैं.

इन सब वजहों से कठुआ वाला मामला बेहद बड़ा हो जाता है. वो एक बच्ची के साथ हुई हौलनाक हरकत के अलावा इस देश के बदलते चरित्र की बदनुमा तस्वीर भी है. ज़ाहिर है तमाम संवेदनशील लोग इस मानसिकता के विरोध में खड़े हो रहे हैं. 2012 याद ही होगा सबको. उस वक़्त भी जनता सड़कों पर आई थी. बिना किसी के कहे. वो प्रतिरोध की आवाज़ थी. इस बार सड़कों पर आई जनता का मकसद अलग था. यहां धर्म के नाम पर दरिंदों को बचाने का मकसद था.

8 साल की बच्ची की हत्या के बाद रसाना गांव में दहशत का माहौल है. (फोटो : पत्रकार तारिक अनवर की फेसबुक वॉल से)
8 साल की बच्ची की हत्या के बाद रसाना गांव में दहशत का माहौल है.

हम ये नहीं कह रहे कि इस देश की बहुसंख्य जनता ऐसे वहशियों के समर्थन में है. या हो सकती है. माना कि थोड़े से ही लोग थे, लेकिन उनका होना ही चिंताजनक है. ये अगर चलन में आ गया तो अनर्थ हो जाएगा. इससे पहले शम्भूलाल रैगर के समर्थन में भी ऐसे ही कुछ लोग खड़े हुए थे. इस मानसिकता का विरोध करना ही होगा. इसे अगर नज़रअंदाज़ कर दिया तो इस प्यारे मुल्क की जड़ों पर ही वार हो जाएगा.

फेक इमेज तक इस्तेमाल हो रही है

लोग सासाराम की घटना को कठुआ वाली घटना के बरक्स खड़ा करके न जाने क्या साबित करना चाहते हैं. यहां तक कि भड़काऊ बातों को बल देने के लिए फेक इमेज तक इस्तेमाल हो रही है. जिस एक बच्ची की फोटो सोशल मीडिया पर सासाराम केस की विक्टिम बच्ची के तौर पर घूम रही है, वो फेक है.

फेक तस्वीर.
फेक तस्वीर.

रोहतास के एसपी मानवजीत सिंह ने खुद एक वेबसाइट को बताया कि सोशल मीडिया पर सर्क्युलेट हो रही ये तस्वीर फेक है. ये ख़तरनाक है. कितने वाहियात होंगे वो लोग, जो किसी घिनौने मकसद के तहत ऐसा झूठा प्रोपगेंडा चलाते हैं. कैसे एक क्राइम को दूसरे के सामने खड़ा कर तमाम नैरेटिव को ही चेंज कर देते हैं. ऐसे तमाम लोगों का पुरज़ोर विरोध होना चाहिए. होते रहना चाहिए.

चाहे सासाराम की बच्ची हो या कठुआ की. ये तमाम घटनाएं हमारे मुल्क के दामन पर कलंक हैं. हम इनसे आहत भी हैं और शर्मिंदा भी. अपनी बच्चियों तक की हिफाज़त करने में अक्षम ये मुल्क किस मुंह से खुद को विश्वगुरु कहेगा!


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