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‘क़त्ल करने वाली भीड़ का हिस्सा बनने को हम तैयार नहीं हैं’

‘क़त्ल करने वाली भीड़ का हिस्सा बनने को हम तैयार नहीं हैं’.

28 जून 2017 की शाम दिल्ली के जंतर-मंतर पर जमा हुआ लोगों का हुजूम, यही बात पुरज़ोर लहज़े में कह रहा था. ये वो हुजूम था जो मॉब लिंचिंग की बढ़ती घटनाओं की मुखालफ़त करने पहुंचा था.

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ये लोग किसी पार्टी के पेड कार्यकर्ता नहीं थे. ना ही ये लोग किसी सरकार की मुखालफ़त करने की मंशा से इकट्ठे हुए थे. इन लोगों का सिर्फ एक ही आग्रह था. जो भीड़तंत्र विकसित होता दिखाई दे रहा है भारत में, ये लोग उसका हिस्सा बनने को राज़ी नहीं हैं. बल्कि उसकी मुखर मुखालफ़त को अपना फ़र्ज़ समझकर, ये सब एक वर्किंग डे की शाम को यहां जमा हुए थे.

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इस भीड़ में दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों से लेकर दिल्ली के बाहरी इलाकों में अपना खुद का काम करने वाले छोटे व्यवसायी तक हर तरह के लोग थे. पत्रकार भी थे, जो नौकरी बजाने नहीं बल्कि प्रोटेस्ट का हिस्सा बनने आए थे. कुछ लोगों से हमने बात की.

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गुडगांव के रहने वाले मुहम्मद आसिम के हाथ में एक तख्ती थी. उस पर लिखा हुआ था, ‘वतन सबका, इंसाफ सबको.’ आसिम इस बात से चिंतित हैं कि सालों से साथ रहने वाले लोग एक-दूसरे को शक़ की निगाह से देखने लगे हैं. हमने उनसे सीधा सवाल लिया कि क्या उनकों लगता है इस तरह की घटनाएं किसी ख़ास मज़हब को टार्गेट कर के की जा रही है? उनका जवाब था,

“जो कमज़ोर होता है, वही पिसता है. सब कुछ पॉलिटिक्स से प्रेरित है. जिससे राजनेताओं को फायदा मिलेगा, वो लोग वही करेंगे. चाहे धर्म के नाम पर हो या दलित विरोधी कारनामे करके. कुल मिला के ये मौके की बात है. लोग मौक़ापरस्त हैं. हां, मुझे ख़ुशी है कि इतने लोग यहां आ रहे हैं. मुझे लगा कि मेरा आना बहुत ज़रूरी है. लोगों को लगना चाहिए कि वो अकेले नहीं हैं. अभी भी बहुत से लोग हैं, जो कॉमन सेन्स लगा के सोचते हैं. कि ये मेरा मज़हब नहीं हो सकता. किसी को मारना राष्ट्रवाद नहीं हो सकता. हिंदुस्तान उतना ही मेरा है, जितना किसी और का.”

मुहम्मद आसिम.
मुहम्मद आसिम.

बाबरपुर के रहने वाले रियाज़ सैफी और उनके दोस्त समीर नकवी फेसबुक पर इस प्रोटेस्ट के बारे में पढ़ कर यहां पहुंचे थे. हमने उनसे पूछा कि क्या उनका वहां आना सिर्फ इसलिए है कि जुनैद मुसलमान था? इस बात को उन्होंने सिरे से नकार दिया. उनका कहना था कि जहां कही भी ऐसी घटनाएं हो रही है, हम उन सबके खिलाफ़ हैं. दलितों के साथ जो हो रहा है, हम उसका भी उतना ही विरोध करते हैं. उनकी कही एक लाइन तो मुझे याद रह गई.

“हिंदू-मुसलमान तो हम बाद में हैं, सबसे पहले तो इंसान हैं.”

रियाज़ सैफी और समीर नकवी.
रियाज़ सैफी और समीर नकवी.

दिल्ली के ही रहने वाले मुहम्मद नदीम ने जो कहा, उसने इस मिथ को कुछ हद तक तोड़ दिया कि हर मुसलमान आरएसएस को सिरे से दुश्मन मान के चलता है. हमने मुहम्मद नदीम से कट्टरता पर सवाल किया. उनसे पूछा कि इस तरह की घटनाओं को काउंटर करने के लिए लोग ये कह रहे हैं कि मुसलमान तो खुद ही कट्टर होता है. क्या ऐसा है? उनका जवाब था,

“कुछ लोगों ने कट्टरपंथ के नाम पर देश में भ्रम फैला रखा है. जैसे आरएसएस वाले कुछ लोगों की वजह से सारे हिंदुओं को कट्टर बताया जाता है. जबकि ऐसा नहीं है. कुछ लोग ऐसा कह के देश में नफरत फैला रहे हैं. हर कौम में अच्छे बुरे लोग होते ही हैं.”

मुहम्मद नदीम.
मुहम्मद नदीम.

इस प्रोटेस्ट की मुखालफत में कई सारे तर्क सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिल रहे हैं. सबसे बड़ा और बेतुका तर्क यही है कि ‘अभी क्यों’? अरे भई, हर चीज़ की कभी न कभी पहल तो होनी ही होती है. मुल्क की सरकार आपके पसंद की ना हो ये चल जाता है, लेकिन मुल्क की जनता हिंसक भीड़ में तब्दील होने के मुहाने पर हो ये ख़तरनाक है. अगर ये घृणा सार्वत्रिक हो गई और इस घृणा से ट्रिगर हुई हत्याएं रोज़मर्रा की घटनाएं बनने लगी तो, ये देश बरबाद हो के रह जाएगा.

इस तरह की घटनाओं को महज़ इस्लाम विरोधी मान लेना भी ठीक नहीं ही है. ऐसी बर्बरता किसी भी तरह की माइनॉरिटी के साथ हो सकती है. महिलाओं के खिलाफ़, दलितों के खिलाफ़, मज़दूर वर्ग के खिलाफ़, किसी के के भी खिलाफ़. हर वो पक्ष जो कमज़ोर है, वो ऐसी अंधी भीड़ का निशाना बन सकता है. इसीलिए ज़रूरी है कि वक़्त रहते लोग बताते रहें कि वो इस बर्बरता का हिस्सा नहीं हैं. ताकि ख़ूनी ताकतें निरंकुश न बन सकें.

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मॉब लिंचिंग क्या है? भीड़ किसी को घेर कर मार देती है. महज़ इतने तक सीमित नहीं है लिंचिंग. किसी लड़की को अकेली सड़क पर देख कर घेर लेना भी लिंचिंग ही है. उसे भीड़ बना कर तंग करना भी लिंचिंग ही है. फर्क सिर्फ इतना ही है कि यहां जान नहीं जा रही. लेकिन इसी तरह भीड़ में खोकर गुनाह से बरी हो जाने का शॉर्टकट लोगों को मिलता रहा, तो यही मॉब कल रेप भी करेगा. और उस रेप के बाद क़त्ल भी. ऑनलाइन ट्रोलिंग भी लिंचिंग का ही एक रूप है. दरअसल भीड़ में मौजूद शख्स को ये गारंटी होती है कि गुनाह की ज़िम्मेदारी उस अकेले पर नहीं आएगी. पूरे समूह की भागीदारी है इसमें. और समूह की शक्ल नहीं हुआ करती. यही इम्युनिटी उसे ज़्यादा बर्बर बनने पर उकसाती है. वो मानवीयता की हद को पार करने में ज़रा नहीं हिचकता. यहीं आकर हुक्मरानों का रोल अहम हो जाता है.

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सरकार को चाहिए कि वो इस भीड़तंत्र को काबू में करने के उपाय सोचे. उन्हें अमल में लाए. ऐसी घटनाओं पर सख्त रुख अपनाए. कोई कड़ा कदम उठा कर उदाहरण पेश करे. सत्तापक्ष अगर इन घटनाओं के खिलाफ़ नहीं बोलता, तो उस भीड़ में सीधे यही संदेश जाएगा कि उनके लिए खुला मैदान है. ये नहीं होने देने की ज़िम्मेदारी सरकार की है.

और सरकार से ज़्यादा उस जनता की जिसे इंसानी ज़िंदगी की कद्र करना सीखना ही होगा. क़त्ल किसी भी दलील से जस्टिफाई नहीं हो सकता. हम सबको इस ख़ूनी खेल की मुखालफत करनी होगी. खुद से अहद करना होगा कि नफरतों में इजाफ़ा करती किसी भी गतिविधि का हिस्सा नहीं बनेंगे. ना मॉब लिंचिंग में शिरकत करके और ना ही सोशल मीडिया पर भड़काऊ बातें लिख के. थोड़ी सी समझदारी हम सबकी ज़िम्मेदारी है. हम सबको ही कहना होगा कि नहीं, मेरे नाम पर कोई क़त्ल नहीं हो सकता. नॉट इन माई नेम.

जंतर-मंतर पर जमा वो भीड़ यही बात कह रही थी.

गौमाता कह पाती तो यही कहती.

भारत माता भी.

हम भी यही बात कह रहे हैं.

आप?


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