Submit your post

Follow Us

मैंने मां से कहा था, 'अरे श्रीदेवी ऐसी नहीं है'

मैंने सवेरे आंख खुलते ही मां को फोन किया. ये बताने के लिए कि एक उम्र तक जो एक्ट्रेस उन्हें खूब पसंद रही और बहुत वक्त तक जिससे वो चिढ़ती रहीं, वो श्रीदेवी नहीं रहीं. मां को पहले ही खबर थी, उन्होंने कहा कि मुझे पता है आज इतनी सुबह क्यों मेरी याद आ गई. मैंने भी टीवी पर देखा, वो नहीं रही.

आज की सुबह रोज की तरह नॉर्मल नहीं है. कि इसे व्हाट्सऐप पर गुडमॉर्निंग के संदेश पढ़ते हुए भुला दिया जाए. मोबाइल स्क्रोल करने पर सिर्फ एक नाम दिख रहा था. एक खूबसूरत सी शक्ल नाच रही थी. श्रीदेवी श्रीदेवी श्रीदेवी. लेकिन इस नाम के साथ लिखा कैप्शन बिल्कुल अच्छा नहीं था. श्रीदेवी नहीं रहीं, इस खबर ने हर हिंदुस्तानी को सन्नाटे में ला पटका होगा. ऐसा कौन होगा जो हवा हवाई के साथ न नाचा हो. श्रीदेवी को दीवानों की तरह चाहने वाले, बोनी कपूर से जलने वाले एक शख्स का इस खबर से क्या हाल हुआ, खुद पढ़ लो.

कहां तो मैं अपनी मां की चिढ़ का किस्सा बता रहा था, कहां रामू का रोग ले बैठा. श्रीदेवी 80s-90s के तमाम जवानों की तरह मेरी मां को भी बहुत अच्छी लगती थी. फेवरेट थीं. ढेर सारी मेहनत और तमाम सारी फिल्में करके श्रीदेवी ने ये मुकाम हासिल किया था. उसी दौर में साउथ की फिल्में करके एक बच्ची बॉलीवुड में घुसी और छा गई. दिव्या भारती नाम था उसका. उस दौर में ट्विटर और फेसबुक जैसे माध्यम नहीं थे. जिनसे स्टार्स सीधे अपने फैन्स से जुड़ सकते. अब अमिताभ के हर फैन की उनकी जिंदगी में घुसपैठ है. ट्विटर के जरिए.

मॉम में आखिरी बार दिखी थीं श्रीदेवी
मॉम में आखिरी बार दिखी थीं श्रीदेवी

तब फिल्म मैगजीन्स और अखबारों का रविवासरीय रंगीन पन्ना बिचौलिये का काम करते थे. इन्हीं बिचौलियों ने खबर फैलाई कि दिव्या ने इंडस्ट्री में श्रीदेवी की जगह ले ली है. उस दौर में हर इंसान सिने प्रेमी होता था. उसे फिल्म देखकर उसका रिव्यू लिखना आना जरूरी नहीं था. स्टार देने का चलन नहीं था. जो भी दूरदर्शन पर शुक्रवार रात साढ़े नौ बजे और इतवार शाम चार बजे फिल्म देखता था, फिल्मों पर अपनी राय रखने का अधिकारी था.

बिचौलियों की कही बात हर किसी की जबान पर थी. हालांकि दिव्या भारती इससे इंकार करती रही. वो अपने हर इंटरव्यू में बताती थीं कि अपना कोई कम्पटीशन नहीं है. श्रीदेवी से तुलना होना उनके लिए बहुत बड़ा कॉम्प्लिमेंट है. इस इंटरव्यू का शुरुआती हिस्सा देखकर ये बात समझ में आ जाती है.

1992 में दीवाना फिल्म आई. जिसने दिव्या भारती को ग्रीटिंग कार्ड्स में जगह दे दी. पोस्टकार्ड साइज के ग्रीटिंग कार्ड की कीमत बहुत ज्यादा नहीं होती थी. लड़के एक ही बार में सारी खरीद लेते थे. इस फिल्म ने भारत को शाहरुख खान दिया. हमारी मम्मी को 100 रुपए का महंगा टिकट खरीदने की जुगत दी, हिम्मत दी, बहाना दिया. 92 में सौ रुपए लोवर मिडिल क्लास फैमिली के लिए बहुत थे. फिल्म पर खर्च करना आसान नहीं था. लेकिन फिल्म देखकर आई मम्मी को लगा था कि पैसा वसूल हो गया. उनको अंदाजा लग गया कि दिव्या भारती और श्रीदेवी में टक्कर तो है गुरू.

इस फिल्म के आने और जबरदस्त हिट होने के बाद एक हादसा हुआ. 5 अप्रैल 1993 को दिव्या प्रसिद्धि के आसमान से तारों की दुनिया में चली गईं. महज 19 साल की उम्र में. कॉन्सपिरेसी थ्योरीज चलीं. वहीं किसी अखबार में मां ने पढ़ा होगा या मां ने कहीं किसी उचक्के के मुंह से सुना होगा कि दिव्या को श्रीदेवी ने मरवा दिया है. उससे जलन की वजह से. अताउल्ला खान की फांसी की तरह ये थ्योरी भी मां ने खुद से चिपटा रखी थी. यार सीधे सादे लोग थे. जैसे अब व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स होते हैं. सुनी सुनाई या फॉरवर्ड होकर आई बात को बिना जांचे आगे बढ़ाते हैं.वैसे ही एक फैक्ट उन्हें मिला और उनसे चिपक गया.

(लाडला फिल्म में अनिल कपूर के साथ दिव्या भारती को कास्ट किया गया था. फिल्म का काफी हिस्सा शूट हो चुका था लेकिन दिव्या की बीच में मौत हो गई. लोग कहते थे कि दिव्या ने श्रीदेवी से अच्छा काम किया था. अच्छा बुरा क्या है, लेकिन पब्लिक की भावनाएं दिव्या के साथ थीं. लाडला फिल्म के कुछ हिस्से इस लिंक में हैं.)

हमारी उम्र उस समय कंचे खेलने की होती थी. शरीर का साइज इतना बड़ा था कि बाल्टी में गिरकर मौत हो सकती थी. उस समय अगर मम्मी को समझाता कि मम्मी ऐसी बात नहीं है. जलन वलन तो ठीक है लेकिन श्रीदेवी किसी को मरवा नहीं सकती. तो मम्मी कान उखाड़कर हाथ पर रख देतीं. ढेर सारे साल बीतने के बाद, अपनी अक्ल पर अपना कमांड होने के बाद हिम्मत करके मम्मी से कहा था. “श्रीदेवी ऐसी नहीं है. वहां कोई ऐसा नहीं है जो किसी से जलकर उसका मर्डर करा दे. सुनी सुनाई पर भरोसा मत करो. अखबार में लिखा भी सब सच नहीं होता. अपनी अक्ल का इस्तेमाल करो.” रोज नियम से पिलाई घुट्टी की वजह से मम्मी के दिमाग में श्रीदेवी के लिए चिढ़ निकाली थी. इसीलिए वो आज फोन पर बात करते वक्त ऐसे बता रही थीं जैसे हमारा कोई सगा चला गया हो. सगी ही थी श्रीदेवी, जितना वक्त हम उनकी फिल्मों के साथ बिता चुके हैं उतना अपने रिश्तेदारों के साथ नहीं बिताते. इतनी जल्दी जाकर उन्होंने अच्छा नहीं किया. मैं इस फिलासफी के लिए तुमको हमेशा याद रखूंगा.

श्रीदेवी के किस्से: वो हिरोइन जिसके पांव खुद रजनीकांत छूते थे

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

संविधान के कितने बड़े जानकार हैं आप?

ये क्विज़ जीत लिया तो आप जीनियस हुए.

क्रिकेट के पक्के वाले फैन हो तो इस क्विज़ को जीतकर बताओ

कित्ता नंबर मिला, सच-सच बताना.

सलमान खान के फैन, इधर आओ क्विज खेल के बताओ

क्विज में सही जवाब देने वाले के लिए एक खास इनाम है.

QUIZ: देश के सबसे महान स्पोर्टसमैन को कितना जानते हैं आप?

आज इस जादूगर की बरसी है.

चाचा शरद पवार ने ये बातें समझी होती तो शायद भतीजे अजित पवार धोखा नहीं देते

शुरुआत 2004 से हुई थी, 2019 आते-आते बात यहां तक पहुंच गई.

रिव्यू पिटीशन क्या होता है? कौन, क्यों, कब दाखिल कर सकता है?

अयोध्या पर फैसले के खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड रिव्यू पिटीशन दायर करने जा रहा है.

इन नौ सवालों का जवाब दे दिया, तब मानेंगे आप ऐश्वर्या के सच्चे फैन हैं

कुछ ऐसी बातें, जो शायद आप नहीं जानते होंगे.

अमिताभ बच्चन तो ठीक हैं, दादा साहेब फाल्के के बारे में कितना जानते हो?

खुद पर है विश्वास तो आ जाओ मैदान में.

‘ताई तो कहती है, ऐसी लंबी-लंबी अंगुलियां चुडै़ल की होती हैं’

एक कहानी रोज़ में आज पढ़िए शिवानी की चन्नी.

मोदी जी का बड्डे मना लिया? अब क्विज़ खेलकर देखो कितना जानते हो उनको

मितरों! अच्छे नंबर चइये कि नइ चइये?