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EVM में धांधली बताने वालों को ये सच भी जानना चाहिए

उत्तर प्रदेश में भाजपा को 312 सीटें मिलीं. बसपा को 19 और सपा को 47 सीटें. मायावती ने तुरंत ईवीएम में छेड़छाड़ का आरोप लगा दिया. अखिलेश यादव ने भी कह दिया कि अगर ईवीएम में गड़बड़ी की बात उठी है, तो इसकी जांच होनी चाहिए. इसके बाद फेसबुक पर बाढ़ आ गई कि ईवीएम में गड़बड़ी है और बैलेट पेपर पर लौटा जाए.

बैलेट पेपर पर लौटने की बात करने वालों ने बैलेट पेपर की काउंटिंग नहीं देखी होगी, खासकर उत्तर प्रदेश में.

जिन लोगों को बैलेट पेपर के जरिए वोटिंग और काउंटिंग के बारे में जानकारी नहीं, उनके लिए आधे मिनट का क्रैश कोर्स. बैलेट पेपर एक पेपर होता है, जिसमें लाइन से चुनाव चिह्न छपे होते हैं. अलग-अलग वक्त और अलग-अलग चुनाव के हिसाब से इसमें कैंडीडेट के नाम और उनके फोटो भी आए.

कुछ ऐसा दिखता है बैलेट पेपर
कुछ ऐसा दिखता है बैलेट पेपर

वोट देने गए लोगों को इंकपैड पर रगड़ने के बाद एक मुहर दी जाती है. वो एक आड़ में बैलेट पेपर पर कैंडीडेट के चुनाव चिह्न या उसके सामने बने बॉक्स में मुहर लगाते हैं. बैलेट पेपर मोड़कर तिजोरीनुमा बक्से में डाल दिया जाता है.

लेकिन ये इतना आसान नहीं होता है. इंक गीली होती है, इस वजह से बैलेट पेपर खड़ा-खड़ा ऐसे तह करना होता है कि मोड़ने के बाद अगर इंक दूसरी तरफ लगे, तो वो भी चुनाव चिह्न, खाली बॉक्स या कैंडीडेट के नाम पर ही रह जाए. लाख समझाने के बाद भी तमाम वोट इसी वजह से इनवैलिड हो जाते हैं, क्योंकि इंक दूसरी तरफ लग जाती है. दिक्कतें और भी होती हैं. कोई चुल्लू भर पानी भी बक्से में डाल दे, तो चुनाव रद्द. खैर…

बात धांधली की हो रही थी. ईवीएम से धांधली हुई या नहीं, ये तो नहीं पता. लेकिन ये पता है कि बैलेट पेपर से कैसे धांधली होती है और खूब होती है और सबकी आंखों के सामने होती है. मैं उस धांधली की बात नहीं कर रहा, जिसमें किसी के नाम पर कोई और वोट डाल देता है. मैं केवल काउंटिंग के वक्त हुई धांधली की बात कर रहा हूं.

पंजाब के एक चुनाव के बाद बैलेट पेपर की काउंटिंग
पंजाब के एक चुनाव के बाद बैलेट पेपर की काउंटिंग

बैलेट पेपर की काउंटिंग लंबी और समय-खाऊ प्रक्रिया है, तो जब तक काउंटिंग पूरी नहीं हो जाती, काउंटिंग चलती रहती है. दिन-रात. 3-4 दिन तक काउंटिंग का चलना आम बात होती है.

काउंटिंग के वक्त बांस का बाड़ा सा होता है. बाड़े में वोट गिनने वाले सरकारी कर्मचारी और बाड़े से बाहर खड़े ताकते हुए प्रत्याशी और उनके एजेंट. बक्सा लाया जाता है. सील चेक कराई जाती है. सील तोड़कर बक्सा खोला जाता है. एक-एक बैलेट पेपर खोलकर चिह्न देखा जाता है और हर प्रत्याशी के वोट वाले बैलेट अलग-अलग किए जाते हैं. कई बार इस पर भी बवाल होता है कि वोट गिनने वाले किसी बैलेट पेपर को इंक लगने के आधार पर इनवैलिड मानकर किनारे कर देते हैं और कोई प्रत्याशी झगड़ता रहता है कि ये वोट उसका है. बैलेट पेपर अलग-अलग करने के बाद हर प्रत्याशी के 50-50 बैलेट पेपर की गड्डियां बनती हैं. और फिर वो गड्डियां गिन ली जाती हैं.

नाराज होकर इस तरह बैलेट बॉक्स खोल देना बहुत पुरानी बात नहीं है
नाराज होकर इस तरह बैलेट बॉक्स खोल देना बहुत पुरानी बात नहीं है

अब इसमें धांधली कहां होती है? धांधली के दो तरीके मुख्य हैं:

1. जब 50-50 वोटों की गड्डियां बनाई जाती हैं, उस वक्त जिसे जिताना होता है, उसकी गड्डी 50 से कम वोटों (करीब 40 मान लीजिए) की बनाई जाती है और जिसे हराना होता है, उसकी गड्डी में 50 से ज्यादा वोट (करीब 60 मान लीजिए) रख दिए जाते हैं. अब आप कहेंगे कि रीकाउंटिंग करवा लो. असली पेच यहीं है. रीकाउंटिंग में गड्डियां नहीं खोली जातीं, केवल गड्डियों को दोबारा गिन लिया जाता है.

2. जो दबंग लोग उपरोक्त तरीके से अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नहीं होते हैं, वो दूसरा तरीका भी अपनाते हैं. इसमें उनकी गड्डी में दूसरे उम्मीदवार के वोट रख दिए जाते हैं. ये दोधारी तलवार होती है. दूसरे उम्मीदवार का नुकसान और उनके वोटों में फायदा.

ये सब काउंटिंग के वक्त सबके सामने होता है. लड़ाई-झगड़ा चलता रहता है. काउंटिंग में धांधली होती रहती है. जो प्रत्याशी दबंग होता है, जिसके एजेंट दबंग होते हैं, जिसके पक्ष में स्थानीय प्रशासन और वोट गिनने वाले होते हैं, वो जीत जाता है. न मान रहे हों, तो यूपी के चुनावों में काउंटिंग कराने वालों से पूछ लीजिए.

ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप कोई नया नहीं है. जब भाजपा हारी थी, तब उसने भी यही आरोप लगाए थे. अब दूसरे हारे हैं, तो भी यही आरोप लग रहे हैं. अगर ईवीएम से छेड़छाड़ की चिंता वाकई थी, तो ये मांग पहले भी उठनी चाहिए थी.

ईवीएम मशीन से काउंटिंग के दौरान बैरीके़डडिंग के बाहर खड़े नेताओं के समर्थक
ईवीएम मशीन से काउंटिंग के दौरान बैरीके़डडिंग के बाहर खड़े नेताओं के समर्थक

लेकिन ईवीएम से जुड़ा सवाल अब भी कायम है. क्या ईवीएम से छेड़छाड़ की गई और क्या ईवीएम को हैक किया जा सकता है? ये दो अलग-अलग सवाल हैं.

EVM से छेड़छाड़ पर साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं, ‘वोटिंग के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ये मशीन इंटरनेट से जुड़ी नहीं होती, लिहाजा इसमें किसी साइबर क्राइम की कोई तरकीब काम नहीं करेगी, लेकिन इसमें गड़बड़ी की संभावना को नकारा नहीं जा सकता. सुरक्षा में तैनात लोगों के मेल-जोल से इस मशीन में गड़बड़ी की जा सकती है.’

वो कहते हैं, ‘EVM एक कंप्यूटर ही है और काउंटिंग के दौरान या पहले इसके लॉगरिथम या मैकेनिज़म को छेड़ा जा सकता है.’ उनके मुताबिक ईवीएम एक ऐसी मशीन है, जिसमें छेड़छाड़ करने के लिए हर एक मशीन से छेड़छाड़ करनी पड़ेगी, सारी मशीनों में एक साथ गड़बड़ी नहीं की जा सकती.

इसका उपाय क्या है?

vote-counting

इस चुनाव में क्या होगा, वो तो चुनाव आयोग या उसके बाद देश की अदालतें जानें. इसका एक उपाय VVPAT हो सकता है. VVPAT माने वोटर-वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल. ये ईवीएम के साथ एक इंतजाम होता है, जिसमें वोट डालने के बाद एक पर्ची निकलती है. पर्ची पाकर खुद वोटर इस बात को लेकर आश्वस्त हो सकता है कि उसने किसे वोट दिया है. इसके बाद पर्ची एक बक्से में चली जाती है. कोई विवाद होने पर चुनाव अधिकारी इससे मिलान कर सकते हैं. कोर्ट ने पहले ही चुनाव आयोग से ईवीएम के साथ VVPAT लगाने के लिए कहा था और आयोग ने इस बार कुछ जगह पर इसे लगाया भी है. ये कहा गया था कि देश के सभी मतदान केंद्रों में इसे लगाने की कीमत 1500 करोड़ रुपए होगी. देश में आशंका-रहित चुनावी नतीजों के लिए ये कीमत भी सही.

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में ही चुनाव आयोग से 2014 लोकसभा चुनाव के लिए धीरे-धीरे VVPAT लागू करने को कहा था. VVPAT लागू करने के लिए निर्देश देते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने जो बात कही थी, उसे याद रखना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये चुनावों की पारदर्शिता के लिए अनिवार्य है और इसी से वोटर का भरोसा बनाए रखा जा सकता है.


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