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Pegasus: हैकिंग की दुनिया का वो 'घोड़ा', जो डेटा सुरक्षा की हर दीवार लांघ जाता है

पेगासस (Pegasus). इसका एक मतलब तो ग्रीस के देवताओं का वो सफेद घोड़ा है, जो अपने पंखों के सहारे किसी को भी सातवें आसमान पर पहुंचा दे. लेकिन हम जिस ‘पेगासस’ की बात करने जा रहे हैं, वो एक ऐसी खूफिया तकनीक है जो हर डिवाइस और सॉफ्टवेयर में सेंध लगा सकती है. क्या एंड्रॉयड फोन और क्या आई फोन, इसकी पहुंच से कोई नहीं बच सकता. बीती 18 जुलाई की रात से पेगासस ने भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में राजनीतिक उथल-पुथल मचा दी है. भारत की बात करें तो यहां बवाल इतना बढ़ा कि देश के आईटी मिनिस्टर को संसद में इसे लेकर बयान देना पड़ा. आखिर ऐसा हुआ क्या था, क्यों शुरू हुई पेगासस की चर्चा, इस बार कौन था पेगासस के निशाने पर और किन पर लग रहे हैं आरोप. सभी सवालों के जवाब जानिए.

पेगासस है क्या?

डेटा लीक होने से जुड़ी खबरें आपने पढ़ी होंगी. फलां कंपनी का डेटा लीक हो गया, यूजर्स का डेटा लीक हो गया. वगैरा-वगैरा. ये काम ऐसे सॉफ्टवेयर के जरिए किए जाते हैं जो उस ‘दीवार’ को तोड़ देते हैं, जो डेटा को सुरक्षित रखती है. इन सॉफ्टवेयर को ‘मैलवेयर’ कहते हैं. ऐसा कोई मैलवेयर अगर किसी डिवाइस मतलब कंप्यूटर, मोबाइल फोन या टैब में डाल दिया जाए तो उस डिवाइस की सारी जानकारी निकाली जा सकती है. सारी मतलब सारी. किसको कॉल किया, क्या बात हुई, कौन से मेसेज किए आदि. मोबाइल का कैमरा और माइक्रोफोन हैक करके रियल टाइम सबकुछ सुना और देखा भी जा सकता है.

पेगासस को दुनिया का सबसे खतरनाक मैलवेयर माना जाता है. इसे डिवाइस तक पहुंचाने के लिए किसी कैरियर, जैसे ईमेल, वेब लिंक या मेसेज आदि की जरूरत नहीं पड़ती. एक मिस्ड कॉल फोन पर जाता है और पेगासस एक्टिव हो जाता है. पेगासस स्पायवेयर को इजराइली कंपनी NSO ग्रुप ने बनाया है.

भारत में बवाल क्यों मचा हुआ है?

फ्रांस की संस्था फॉर्बिडन स्टोरीज (Forbidden Stories) और एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने मिलकर पेगासस स्पायवेयर को लेकर बड़ा खुलासा किया है. इन दोनों संस्थानों का दावा है कि उनके पास करीब 50 हजार फोन नंबर्स की एक लिस्ट है, जिन्हें पेगासस स्पायवेयर के जरिए हैक किया गया है. इन दोनों संस्थानों ने इस लिस्ट को दुनियाभर के 16 मीडिया संस्थानों के साथ शेयर किया है. कई हफ्तों के इन्वेस्टिगेशन के बाद खुलासा हुआ है कि अलग-अलग देशों की सरकारें कथित रूप से पत्रकारों, विपक्षी नेताओं, बिजनेसमैन, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों और वैज्ञानिकों समेत कई लोगों की जासूसी कर रही हैं. इस जांच को ‘पेगासस प्रोजेक्ट’ नाम दिया गया है.

भारत में ये खुलासा ‘द वायर’ नाम के मीडिया संस्थान ने किया है. द वायर का दावा है कि स्पायवेयर के जरिए भारत में कई प्रतिष्ठित पदों पर बैठे लोगों का फोन हैक किया गया. जिन लोगों की जासूसी की गई है उनमें 300 भारतीय लोगों के नाम शामिल हैं. बताया गया है कि लिस्ट में शामिल भारतीयों के नाम एक-एक करके सामने रखे जाएंगे. पहली लिस्ट पत्रकारों की निकली है जिसमें 40 भारतीय नाम हैं.

किन पत्रकारों के नाम हैं लिस्ट में?

वायर की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पेगासस से जुड़े एमनेस्टी इंटरनेशनल और फॉर्बिडन स्टोरीज के डेटा में दिल्ली के बड़े मीडिया समूहों और लोकल मीडिया के पत्रकारों के नाम शामिल हैं. इनके नाम हैं,

– हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक शिशिर गुप्ता
– इंडियन एक्सप्रेस में डिप्टी एडिटर सुशांत सिंह, मुजामिल जलील, रितिका चोपड़ा
– ईपीडब्ल्यू के पूर्व संपादक परंजॉय गुहा ठाकुरता
– आउटलुक के पूर्व पत्रकार एसएनएम आबिदी
– द हिंदू की पत्रकार विजेता सिंह
– इंडिया टुडे के संदीप उन्नीथन
– द ट्रिब्यून की स्मिता शर्मा
– TV18 के मनोज गुप्ता
– द वायर के दो संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन और एमके वेणु

इसके अलावा लिस्ट के हवाले से पत्रकार रोहिणी सिंह, स्वाति चतुर्वेदी सहित कई राज्यों के लोकल मीडिया के पत्रकारों के नाम लिए गए हैं. वहीं, विपक्ष के तीन बड़े नेता, एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति, मोदी सरकार के दो मंत्री और सुरक्षा एजेंसियों के मौजूदा और पूर्व प्रमुखों समेत कई बिजनेसमैन के नाम भी लिस्ट शामिल हैं. द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, ये हैकिंग साल 2018 से 2019 के बीच तब हुई जब 2019 की चुनावी सरगर्मियां जोरों पर थीं.

Hackers
पहली रिपोर्ट के मुताबिक देश के 40 पत्रकारों का फोन टेप किया गया. (सांकेतिक फोटो)

भारत सरकार ने क्या कहा?

भारत सरकार ने ‘पेगासस प्रोजेक्ट’ से जोड़कर लगाए गए एमनेस्टी और फॉर्बिडन स्टोरीज के आरोपों से इनकार किया है. उसने कहा है कि इन आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है कि भारत सरकार सूची में शामिल लोगों की स्पायवेयर के जरिए जासूसी करा रही थी. इस मुद्दे पर सरकार की तरफ से जारी आधिकारिक बयान में कहा गया है,

“भारत एक मजबूत लोकतंत्र है, जो अपने सभी नागरिकों की निजता के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है. इस प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाते हुए पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2019 और आईटी नियम, 2021 को भी पेश किया गया है, ताकि सभी के निजी डेटा की रक्षा की जा सके और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यूजर्स को सशक्त बनाया जा सके. मौलिक अधिकार के रूप में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्रतिबद्धता भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है. हमने हमेशा खुले संवाद की संस्कृति पर जोर दिया है. हालांकि भारत सरकार को भेजे गए सवालों से संकेत मिलता है कि ये एक गढ़ी जा रही कहानी है जो न केवल तथ्यों से परे है, बल्कि जिसे लेकर पहले ही नतीजा निकाल लिया गया है.’

बयान में आगे कहा गया है,

‘ऐसा लगता है कि आप एक इनवेस्टिगेटर, जज और जूरी सभी की भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं. पूछे गए सवालों के जवाब पहले ही पब्लिक डोमेन में हैं. ये भी खराब तरीके से की गई एक रिसर्च का नमूना है. आरटीआई के जरिए पेगासस के उपयोग के बारे में भारत सरकार की प्रतिक्रिया को मीडिया द्वारा प्रमुखता से रिपोर्ट किया गया है. ये उन दुर्भावनापूर्ण दावों का खंडन करने के लिए काफी है, जिनके मुताबिक भारत सरकार और पेगासस के बीच कथित रूप से संबंध है. पहले भी भारत सरकार पर WhatsApp पर पेगासस का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया गया था. उन रिपोर्ट्स में भी कोई तथ्य नहीं था और भारत के सुप्रीम कोर्ट में WhatsApp समेत सभी पक्षों ने इसका खंडन किया था. ये न्यूज रिपोर्ट भी भारतीय लोकतंत्र और इसकी संस्थाओं को बदनाम करने के लिए एक कैंपेन प्रतीत होती है.”

फोन टैपिंग विवाद पर संचार मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 19 जुलाई को लोकसभा में बयान भी दिया है. उन्होंने कहा,

“फोन टैपिंग से जासूसी के आरोप गलत हैं. लीक डेटा का जासूसी से कोई लेना देना नहीं है. फोन टैपिंग को लेकर सरकार का प्रोटोक़ल बेहद सख्त है और डेटा से ये साबित नहीं होता कि सर्विलांस किया गया है.”

Ashwini Vaishnav
हाल ही में आईटी मिनिस्टर का पद संभालने वाले अश्विन वैष्णव ने 19 जुलाई को लोकसभा में बयान देकर जासूसी की बातों को सिरे से नकार दिया.
(फाइल फोटो-पीटीआई)

पेगासस बनाने वाली कंपनी ने क्या कहा?

इजरायल की कंपनी NSO दुनियाभर में पेगासस सॉफ्टवेयर बेचती है. उसने एमनेस्टी और फॉर्बिडन स्टोरीज की लिस्ट को ‘विवादित’ बताया है. NSO ने कहा कि लिस्ट उसके सॉफ्टवेयर की फंक्शनिंग से किसी भी तरह से मेल नहीं खाती. कंपनी ने अपने आधिकारिक बयान में लिखा है,

“फॉर्बिडन स्टोरीज की रिपोर्ट गलत धारणाओं और अपुष्ट जानकारियों से भरी हुई है. जो स्रोतों की विश्वसनीयता और हितों के बारे में गंभीर संदेह पैदा करती है. ऐसा लगता है कि “अज्ञात स्रोतों” ने ऐसी जानकारी प्रदान की है जिसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है और जो वास्तविकता से बहुत दूर हैं. उनके दावों की जांच करने के बाद हम उनकी रिपोर्ट में लगाए गए झूठे आरोपों का दृढ़ता से खंडन करते हैं. उनके पास जो जानकारी मौजूद है उसके लिए कोई तथ्यात्मक दस्तावेज़ मौजूद नहीं है. असल में ये आरोप इतने अपमानजनक और वास्तविकता से दूर हैं कि NSO मानहानि के मुकदमे पर विचार कर रहा है.”

कंपनी ने ये भी लिखा,

“हमारे पास ये विश्वास करने की वजह है कि लीक हुई लिस्ट के नंबर वे नहीं हैं, जिन्हें सरकारों ने पेगासस के इस्तेमाल से टारगेट किया है. ये लिस्ट उन नंबरों की हो सकती है, जिन्हें किसी और काम के लिए इस्तेमाल किया है. “

पेगासस को बनाने वाली कंपनी लगातार ये दावा करती रही है कि वो किसी निजी कंपनी को ये सॉफ्टवेयर नहीं बेचती है. बल्कि इसे सिर्फ सरकार और सरकारी एजेंसियों को ही आतंकवाद, चाइल्ड पोर्नोग्राफी आदि से लड़ने के लिए उपलब्ध कराती है.

पहले भी आया है नाम

पेगासस का नाम पहले भी मोबाइल फोन हैकिंग के लिए सामने आ चुका है. दुनियाभर में पेगासस सबसे पहले 2016 में सुर्खियों में आया था. तब UAE के मानवाधिकार कार्यकर्ता अहमद मंसूर को अनजान नंबर से कई SMS मिले थे, जिनमें कई लिंक भेजे गए थे. अहमद को जब इन मेसेज को लेकर संदेह हुआ तो उन्होंने साइबर एक्सपर्ट्स से इनकी जांच करवाई. खुलासा हुआ कि अहमद अगर मेसेज में भेजे लिंक पर क्लिक करते तो उनके फोन में पेगासस डाउनलोड हो जाता.

2 अक्टूबर 2018 को सऊदी अरब के पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या हो गई थी. इस हत्याकांड की जांच में भी पेगासस का नाम सामने आया था. एजेंसियों ने शक जताया था कि जमाल खशोगी की हत्या से पहले उनकी जासूसी की गई थी. फिर 2019 में भी पेगासस सुर्खियों में था. तब Whatsapp कंपनी ने कहा था कि पेगासस के जरिए करीब 1400 पत्रकारों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की Whatsapp डिटेल्स उनके फोन से हैक की गई थीं.


वीडियो – एयर इंडिया के 45 लाख ग्राहकों का पर्सनल डेटा लीक होने के बाद अधिकारियों ने क्या कहा?

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