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कमल हासन की मूवी से निकला राजीव गांधी की हत्या का प्लान

24 मई, 1991 को दिल्ली में राजीव गांधी की शवयात्रा की तस्वीर. (AFP)

आज 30 जुलाई है और आज की तारीख़ का संबंध है भारतीय पीस कीपिंग फ़ोर्स के श्रीलंका पहुंचने से. 29 जुलाई, 1987 को हुए भारत-श्रीलंका शांति समझौते के अगले दिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद में इस पर बयान दिया,

“श्रीलंका में बिगड़ते हालातों को ध्यान में रखते हुए, हमारी सरकार और श्रीलंका सरकार के बीच शांति समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं. इस समझौते को लागू करने के लिए श्रीलंका सरकार ने भारत से मदद मांगी है. श्रीलंका की सरकार ने भारत से औपचारिक रूप से अनुरोध किया है कि जाफना प्रायद्वीप और यदि आवश्यक हुआ तो पूर्वी प्रांत में संघर्ष रोकने और हथियारों के आत्मसमर्पण को सुनिश्चित करने के लिए हम उन्हें सैन्य सहायता प्रदान करें.”

उन्होंने आगे कहा,

“भारत-श्रीलंका शांति समझौते के तहत हम इसे अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं. आज यानि 30 जुलाई, 1987 को भारतीय सेना की सशस्त्र टुकड़ियां जाफ़ना पहुंच चुकी हैं. मैं यह दोहराना चाहता हूं कि ऐसा श्रीलंका सरकार के अनुरोध पर किया गया है.”

प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संसद में जो बयान दिया. उस पर गौर करें तो वो बार-बार ये जताने की कोशिश कर रहे थे कि भारत की सेना श्रीलंका के आग्रह पर वहां गई है. अतः ये विदेशी हस्तक्षेप का मामला नहीं है. लेकिन दुनिया में जब भी विदेश नीति और डिप्लोमेसी की बात होती है. तो हमारी उम्मीद के विपरीत कोई बहुत शूं-शां नहीं होता. कोई फ़ायरब्रांड बयान नहीं होते. बहुत महीन (subtle) तरीक़े से बात कही जाती है और समझ भी ली जाती है.

राजीव गांधी (तस्वीर: Getty)

उदाहरण के लिए पिछले दिनों अमेरिकी विदेश मंत्री ऐंथनी ब्लिंकन भारत दौरे पर आए. इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बाक़ी महत्वपूर्ण लोगों से मुलाक़ात की. इस यात्रा में एक ख़ास मुलाक़ात का ज़िक्र आप बहुत बार सुनेंगे. वो है दलाई लामा के प्रतिनिधि से ब्लिंकन की मुलाक़ात. चीन के साथ अमेरिका के रिश्तों में काफ़ी तनाव है. लेकिन इस दौरे पर ब्लिंकन ने चाइना पर कोई बयान नहीं दिया. कहीं कोई ज़िक्र नहीं. लेकिन जो संदेश वो चाइना को देना चाहते थे. इस मुलाक़ात से वो उन्होंने दे दिया और चाइना समझ भी गया.

उस दिन राजीव गांधी भी अपने बयान से एक ख़ास संदेश देने की कोशिश कर रहे थे. ये संदेश था अंतरराष्ट्रीय कम्यूनिटी के लिए. संदेश कि भारत ने किसी देश के आंतरिक मामलों में जबरन दख़लअंदाजी नहीं की है. लेकिन ये भी सच है कि भारत इस पूरे मामले में गच्चा ख़ा गया. श्रीलंका के राष्ट्रपति जयवर्धने ने बड़ी ही चालाकी से पूरी ज़िम्मेदारी से हाथ खींच लिया, और सारा का सारा क्रेडिट ले गए. चूंकि संघर्ष श्रीलंका सरकार और LTTE के बीच था तो समर्पण की जो शर्तें तय हुई थीं, उन्हें मनवाने या लागू करने की ज़िम्मेदारी भी श्रीलंका की सेना की होनी चाहिए थी. लेकिन जयवर्धने ने दक्षिण श्रीलंका में हो रहे दंगों का हवाला दिया. और कहा कि भारतीय शांति सेना (IPKF) की ज़रूरत है क्योंकि श्री लंका की सेना को दक्षिण श्रीलंका पर ध्यान देना है.

प्रभाकरण से मुलाक़ात

इस बीच सबसे बड़ी दिक़्क़त तो ये थी कि औपचारिक रूप से LTTE इस समझौते का हिस्सा ही नहीं था. लेकिन पर्दे के पीछे भारत सरकार लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण से अंडरस्टैंडिंग बनाने की कोशिश में लगी थी. पीस अकॉर्ड साइन होने से पहले 22 जुलाई, 1987 को राजीव गांधी और प्रभाकरण की एक ख़ास मुलाक़ात हुई. दो विशेष हेलिकॉप्टर भेजकर प्रभाकरण को जाफ़ना से भारत लाया गया ताकि शांति समझौते की शर्तों पर उसे मनाया जा सके.

प्रभाकरण (दाएं से दूसरा) अन्य लिट्टे नेताओं के साथ जाफना में (फ़ाइल फोटो: पीटीआई/एपी)

इस मीटिंग से पहले बार-बार प्रभाकरण एक ही बात दोहरा रहे थे. वो ये कि श्रीलंका की सरकार पर भरोसा नहीं किया जा सकता. उस समय के उनके इंटरव्यू और सरकारी अधिकारियों की बात से तो यही लगता है कि प्रभाकरण दिल से इस समझौते के पक्ष में नहीं थे. लेकिन ‘करना था इनकार मगर इकरार तुम्हीं से कर बैठे’ जैसा कुछ हुआ. और प्रभाकरण ने अनमने ढंग से हामी भर दी.

ख़ैर प्रभाकरण समझौते को लेकर राज़ी तो हो गए. पर उन्होंने लिखित में कोई वायदा नहीं किया. सब कुछ मुंह ज़बानी और भरोसे पे टिका था. प्रभाकरण से मुलाक़ात के अंत में राजीव उन्हें एक तोहफ़ा देना चाहते थे. कुछ ना मिला तो उन्होंने अपने बेटे यानि राहुल गांधी से कहा कि वो उनकी जैकेट ले आएं. ये जैकेट बुलेट प्रूफ़ थी. प्रभाकरण को जैकेट देते हुए राजीव ने कहा, ‘अपना ध्यान रखना’. जाने अनजाने शायद वो प्रभाकरण को ये जताना चाहते थे कि भारत तमिलों की सुरक्षा करेगा. ख़ैर अकॉर्ड पर दस्तख़त हुए और 30 जुलाई को भारत की सेना जाफ़ना पहुंच गई.

IPKF इन श्रीलंका

1971 में बांग्लादेश में मिली सफलता से राजीव गांधी सेना को लेकर अति आत्मविश्वास से भरे हुए थे. उन्हें लगा कि सेना के पहुंचने से समाधान जल्दी हो जाएगा. उत्तर और पूर्व के इलाक़ों में तमिलों को ज़्यादा अधिकार मिलेंगे तो वो संतुष्ट हो जाएंगे. पर LTTE, जिसकी तुलना उस समय जापान के कामीक़ाज़ बॉम्बर्स से की जाती थी, अलग तमिल राष्ट्र से कम किसी क़ीमत पर राज़ी नही था. दूसरी तरफ़ सिंहल सुप्रीमिस्ट इस बात पर नाराज़ थे कि एक दूसरे देश की सेना श्रीलंका में घुसकर तमिलों की आज़ादी के लिए लड़ रही है.

जाफ़ना में शांति सेना (तस्वीर: Getty)

बहरहाल लिट्टे ने हथियारों के समर्पण से इनकार कर दिया, जिससे LTTE और IPKF में लड़ाई छिड़ गई. 2 साल के अंदर IPKF ने LTTE के मिड लेवल काडर वाले बहुत से जूनियर लीडर्स का सफ़ाया कर दिया. लेकिन1989 में बोफ़ोर्स कांड के कारण राजीव गांधी सत्ता से बेदख़ल हो गए. उधर श्रीलंका में भी राष्ट्रपति की कुर्सी पर रानासिंघे प्रेमदासा बैठ चुके थे. सरकार में हुई इस उठापटक ने संघर्ष को एक नया मोड़ दे दिया. प्रभाकरण को लगा कि IPKF का मिशन लम्बा चला तो LTTE का सफ़ाया हो जाएगा. सिंहल लोगों के विरोध के चलते राष्ट्रपति प्रेमदासा भी IPKF के लौट जाने का अनुरोध कर रहे थे.

IPKF से विरोध के चलते प्रेमदासा और प्रभाकरण के बीच एक गुप्त समझौता हुआ. सरकार LTTE को हथियार सप्लाई करने लगी और रातों-रात पूरे कोलंबो में IPKF के ख़िलाफ़ पोस्टर लग गए. जिनमें लिखा था, IPKF यानि इनोसेंट पीपल किलिंग फ़ोर्स. हालांकि अपना काम निकल जाने के बाद 1993 में LTTE ने एक आत्मघाती हमला कर प्रेमदासा की हत्या कर दी.  सरकार बदल जाने के बाद श्रीलंका को लेकर भारत का रुख़ भी बदल चुका था. VP सिंह की सरकार ने 1990 में IPKF को वापस बुला लिया गया. इंटरनेशनल मीडिया ने इसे ‘भारत का वियतनाम मोमेंट’ नाम दिया. 3 साल चले इस मिशन में भारत के 1200 सैनिक शहीद हुए. जिनकी याद में 2014 में भोपाल में एक मेमोरियल बनाया गया.

इंटेलिजेंस की नाकामी

इस बीच 1990 में तमिलनाडु का नीलगिरी इलाक़ा, जहां श्रीलंकाई तमिलों के कुछ गुट रहते थे, उनके और जाफ़ना के बीच कुछ संदेश इंटरसेप्ट किए गए. इन संदेशों में ‘राजीव गांधी’ और ‘उड़ा दो’, ‘मार दो’ जैसे शब्दों का ज़िक्र था. उस समय IPKF के काउंटर इंटेलिजेंस हेड हुआ करते थे, कर्नल हरिहरण. उन्होंने ये बात सीधे भारतीय सुरक्षा एजेंसियों तक पहुंचाई. IB को लगा कि तमिलों का ग़ुस्सा IPKF को लेकर है, जिसे वापस बुला लिया गया था. और राजीव तब प्रधानमंत्री भी नहीं थे. इसलिए इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं गया.

1988 से 1994 तक रॉ के हेड हुआ करते थे बी रमन. अपनी किताब में रमन ने बताया कि इसी दौरान जर्मन इंटेलिजेंस ने उन्हें एक और इंटरसेप्ट के बारे में बताया. जिसके अनुसार-

एक व्यक्ति जो LTTE का समर्थक था बार-बार मद्रास का दौरा कर रहा था. ख़ास बात ये थी कि ये व्यक्ति एक्सप्लोसिव्स यानि धमाकों का एक्सपर्ट था.

ये सब क्या और क्यों हो रहा था? इसके लिए उस वक्त से एक साल पहले की एक घटना को जानना होगा.

द डे ऑफ़ जैकल

IPKF के ऑपरेशंस के दौरान 24 जुलाई, 1989 को ‘द हिंदू’ अख़बार में एक रिपोर्ट छपी. रिपोर्ट में लिखा था ‘एक शूटआउट में प्रभाकरण मारा गया’. खबर तो झूठ निकली लेकिन प्रभाकरण को इससे भारत के मंसूबों की भनक लग गई. मंसूबा ये कि दिल्ली सरकार उसे मरवाना चाहती है. इसके चलते उसने अंडरग्राउंड होने का प्लान बनाया और वो जाफ़ना के जंगलों में छुप गया. सेना से बचने के लिए वो किसी भी जगह पर एक रात से ज़्यादा नहीं रुकता था. दिल्ली की निगाह उस पर थी. लेकिन खबर लगने पर वो मिनटों में ग़ायब हो जाता था.

कमल हासन की फिल्म ‘ओरु कैधियिन डायरी’ का पोस्टर

उन दिनों उसके पास बस एक मूवी प्रोजेक्टर हुआ करता था. फ़िल्में देखना उसे बहुत पसंद था. कमल हासन की फ़िल्म ‘ओरु कैधियिन डायरी’ उसकी पसंदीदा फ़िल्मों में से एक थी. फ़िल्म की कहानी बदले पर आधारित थी. एक और फ़िल्म थी जिसे वो बार-बार देखा करता था. ये थी फ़्रेड ज़िनेमान की 1973 में आई फ़िल्म ‘द डे ऑफ़ जैकल’. फ़िल्म में एक अंडरग्राउंड अर्धसैनिक समूह, फ़्रांसीसी राष्ट्रपति की हत्या का प्लान बनाते हैं. लेकिन जब उनके कई प्रयास विफल हो जाते हैं, तो वे ‘द जैकल’ नाम के एक कुख्यात हिटमैन को ये काम सौंपते हैं. कुछ इंटेलिजेंस अधिकारियों का मानना है कि इन फ़िल्मों को देखकर ही उसने राजीव गांधी को मारने का प्लान बनाया. जबकि कई का कहना है कि मोसाद और CIA उसके पीछे थे.

जो भी कारण रहा हो. 1990 में ही उसने ठान लिया था कि राजीव गांधी की हत्या कर दी जाए. इसका एक मुख्य कारण ये भी था कि अगर राजीव दुबारा प्रधानमंत्री बनते तो IPKF लौट भी सकती थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद राजीव की सुरक्षा इतनी कड़ी हो जाती कि उसे भेद पाना मुश्किल होता. इसलिए चुनावों से पहले ही ये काम किया जाना ज़रूरी समझा गया.

फ़ाइनल चैप्टर

इसी के तहत एक योजना बनाई गई. उसने अपने चार मुख्य कमांडरों को बुलाया. उन्हें अपना प्लान बताया. इन कमांडरों में से एक था ‘बेबी’ सुब्रमनियम, जो भारत में तमिलनाडु से ऑपरेट किया करता था. इस काम के लिए सुब्रमनियम ने मद्रास में एक प्रिंटिंग प्रेस को अपना अड्डा बनाया. कुछ लोकल लोगों को अपने मिशन में जोड़ा. दो फोटोग्राफ़र भी चुने गए ताकि हत्या को कैमरे में क़ैद किया जा सके. अप्रैल 1991 में लिट्टे की दो ख़ास मेम्बर्स धनु उर्फ़ गायत्री और शुभा उर्फ़ शालिनी को इस काम के लिए चुना गया. हत्या को कैसे अंजाम देना है, इसके लिए बाक़ायदा प्रैक्टिस भी की गई.

12 मई को हमले की फुल ड्रेस रिहर्सल की गई. इसके लिए उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल नेता वीपी सिंह की रैली को चुना. वीपी सिंह ये रैली करुणानिधि के सपोर्ट में करने आ रहे थे. जगह थी मद्रास से 40 किलोमीटर दूर थिरूवलूर. वहां पहुंचकर इन लोगों ने पूरे सुरक्षा इंतज़ाम का जायज़ा लिया. इतना ही नहीं, जब वीपी सिंह रैली के लिए पहुंचे, तो धनु ने आगे बढ़कर उनके पैर भी छुए. जब पूरा प्लान तय हो गया तो इन लोगों ने 20 मई की रात एक फ़िल्म देखी और अगली सुबह श्रीपेरम्बदूर के लिए निकल गए. राजीव गांधी वहां एक चुनावी रैली में आने वाले थे. जैसे ही राजीव गांधी पहुंचे, सब लोग उन्हें माला पहनाने के लिए आगे आए. इनमें से एक धनु भी थी. इस दौरान वहां मौजूद सब इन्स्पेक्टर अनसुइया ने धनु को रोकने की कोशिश की. लेकिन राजीव ने उनसे कहा कि उन्हें आने दें.

धनु ने राजीव को चंदन की माला पहनाई और पैर छूने के लिए झुकी. वैसे ही, जैसे 9 दिन पहले वीपी सिंह के छुए थे. फर्क बस कुर्ते के नीचे, डेनिम की जैकेट में छिपे बम का था. राजीव गांधी जैसे ही धनु को ऊपर उठाने के लिए झुके, धनु ने बम का बटन दबा दिया. तारीख़ थी 21 मई, 1991. इसके ठीक 18 साल बाद यानि 18 मई, 2009 को वेलुपिल्लई प्रभाकरण श्रीलंका की सेना के साथ हाथों मारा गया. और इसी के साथ लिट्टे ने अपनी हार मान ली. इस कहानी का कुछ नाटकीय रूपांतर आपने अमेज़न प्राइम की सीरीज़ फ़ैमिली मैन 2 में देखा होगा. अमेज़न प्राइम पर ही एक और सीरीज़ मौजूद है. जिसका नाम है ‘द मैन इन द हाई कैसल’. इस सीरीज़ की कहानी इस प्रकार है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अगर हिटलर जीत जाता तो क्या होता. बाक़ी स्पॉइलर नहीं देते. देखना चाहें तो देख सकते हैं.

घटनास्थल से मिले राजीव गांधी के जूते (फ़ाइल फोटो)

हम समझते हैं कि केवल बड़ी-बड़ी घटनाएं भविष्य पर असर डालती हैं. हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं. लेकिन सोचिए अगर सुरक्षा एजेंसियों ने रेडियो इंटरसेप्ट्स पर ध्यान दिया होता, या सब इन्स्पेक्टर अनसुइया ने धनु को आगे बढ़ने से रोक दिया होता तो हमारा वर्तमान कैसा होता. आज़ राजीव गांधी ज़िंदा होते तो उनकी उम्र 77 साल होती. तुलना के लिए देखें तो प्रधानमंत्री मोदी अभी 70 की उम्र के हैं. ये ख़याल बटरफ़्लाई इफ़ेक्ट के हिस्से जमा हो जाता है. वही बात कि अमेज़न के जंगलों में कहीं एक तितली पंख फड़फड़ाती है और दूर यूरोप में तूफ़ान आ जाता है.

ये वीडियो भी देखें- श्रीलंका में LTTE और तमिल विद्रोह की कहानी क्या है?

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