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गली-गली उग आए स्वघोषित देशभक्तों को देख कर लगता है 'देशभक्ति' भारत की सबसे बड़ी समस्या है

आज की तारीख़ में भारत की सबसे बड़ी समस्या अगर कोई है तो वो है देशभक्ति. जी हां देशभक्ति. राष्ट्रप्रेम की जो सतही लहर गांव-गांव, गली-गली बह रही है, उसके शोर में बाकी सब कुछ गायब सा हुआ जा रहा है. हमारी नाकामियां, हमारी काहिली, हमारा गैर-ज़िम्मेदाराना रवैया, हमारी मूलभूत समस्याएं, सब.

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देशभक्ति का नारा रामबाण नुस्खा बन चुका है हमें व्यस्त रखने का. ज़रा कहीं हवा में उछल जाए ये नारा और हम जज़्बातों की रौ में मीलों-मील बहे चले जाते हैं. बाकी सब मुद्दे निरर्थक हो जाते हैं. इस देशभक्ति की धार की तीव्रता को कम करने की बहुत जरुरत महसूस होती है मुझे. इसकी आड़ में हमारे रहनुमा (सभी पार्टियों के) हमें बरसों तक भटकाते आये हैं और भटकाते रहेंगे. बहुत आसान है उनके लिए ये सब.

बुर्के का मैंने हमेशा विरोध किया है, लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए इसका एक व्यावहारिक उपयोग भी देखा है मैंने. उन्हें अगर अर्जेंट में कहीं आसपास जाना है तो उसके लिए उन्हें अपना हुलिया दुरुस्त करने की जहमत नहीं करनी पड़ती. वो जैसी भी हैं, जो भी पहना है उसपर बुर्का डाल लेती हैं और निकल पड़ती हैं.

बुर्का अंदर के मैले-कुचैले कपड़ों का खूबसूरती से बचाव कर लेता है. साथ ही मज़हब ज़िंदाबाद होता है वो अलग. देशभक्ति भी कुछ-कुछ उस बुर्के की तरह ही हो गयी है आजकल. अंदर की बदसूरती ढांपने के काम आ रही है. साथ ही राष्ट्रप्रेम की उदात्त भावना की जय हो जाती है सो अलग.

अपने देश से प्यार करना अच्छी बात है. लेकिन देश किसे माना जाए इसकी समझ होना भी उतना ही जरुरी है. देश सरहदों के अंदर बंधी ज़मीन का नहीं, बल्कि लोगों के समूह का पर्यायवाची होना चाहिये. प्यार लोगों से हो, झंडे से नहीं. सिलेक्टिव देशभक्ति बहुत घातक है. एक तरफ हम सेना के जवान को देशभक्ति का सर्वोच्च प्रतीक बना कर उसका अतिशयोक्ति अलंकार में गुणगान करते हैं और दूसरी तरफ वही जवान जब समस्याएं गिनाने लगे तो उसकी ज़िंदगी जहन्नुम बना देते हैं. उसी जवान की औलाद को रेप की धमकियां देते हैं. सोच का ये दोहरापन हमारी बेसिक समझ पर बहुत बड़ा सवालिया निशान है.

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Source: The Indian Express

हम पाकिस्तान को गालियां देकर, ‘भारत महान है’ का श्लोक दोहराते रह कर या फिर तिरंगे को प्रोफाइल पिक्चर बना कर महज़ अपने आक्रोश को शांत करते हैं. अपने अहम की संतुष्टि करते हैं. हमारी देशभक्ति महज़ इतने तक ही सीमित है. सच्ची और कारगर देशभक्ति तभी होगी जब हम जन-सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर बात करेंगे और अपने आसपास के लोगों से प्रेम करना सीख जाएंगे. हम कितने देशभक्त हैं ये हम नहीं कोई और ही तय कर रहा है. और बहुत उथले तौर से तय कर रहा है. क्यों किसी को ये हक़ दें हम?

इससे पहले कि आप के हाथ गालियां टाइप करने लग जाएं जरा दो मिनट थम कर समझने की कोशिश कीजियेगा, मैं कहना क्या चाह रहा हूं. मुझे उस भावना से दिक्कत नहीं है जो भारत के नाम पर गर्व की अनुभूति कराती है. मुझे समस्या इस भावना को बुर्का बना लेने से है. देशभक्ति नेगेटिव नहीं पॉजिटिव होनी चाहिए. किसी और से नफ़रत देशभक्ति का बड़ा ही छिछला पैमाना है.

ग़दर के तारा सिंह को हैंड-पंप उखाड़ते देख कर खुश होना बचपना है. तारा सिंह से ये सीखना है कि वो प्रेम की खातिर ज़माने भर से भिड़ गया. प्रेम ज़्यादा मायने रखता है. हर हाल में. समझना होगा इसे. और हो सके तो इस बात को भी कि मूलभूत समस्याओं का चर्चा के केंद्र में रहना ज़्यादा जरुरी है. बात रोटी, कपड़ा, मकान की हो, ना कि झंडे और डंडे की. प्राथमिकताएं तय करने में हम भारतीय हमेशा फिसड्डी रहे हैं. उम्मीद करता हूं ये मंज़र कभी तो बदलेगा.

पाश की कविता ‘भारत’ पढ़ाना चाहूंगा.

भारत
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहां कहीं भी प्रयोग किया जाए
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं

इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में हैं
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं
और वह भूख लगने पर
अपने अंग भी चबा सकते हैं

उनके लिए जिंदगी एक परंपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति
जब भी कोई समूचे भारत की
राष्ट्रीय एकता की बात करता है
तो मेरा दिल चाहता है-
उसकी टोपी हवा में उछाल दूं

उसे बताऊं
कि भारत के अर्थ
किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं
वरन खेतों में दायर हैं
जहां अन्न उगता है
जहां सेंध लगती है… 


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