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कोरोना की वजह से 16 करोड़ लोगों के खाने पर संकट क्यों खड़ा हुआ?

दुनियाभर की कोरोना रिपोर्ट लेकर एक बार फिर आपके सामने आ चुके हैं. हमारा फ़ोकस किन बिंदुओं पर होगा?

– पहले बात करेंगे यूनाइटेड नेशंस की एक रिपोर्ट पर. दुनियाभर में लगभग 16 करोड़ लोगों के जीवन पर संकट खड़ा है. इनका भविष्य बाहरी मदद पर निर्भर है. करीब 2.8 करोड़ लोग अगले कुछ समय में काल के गाल में समा सकते हैं. रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस संकट का एक बड़ा कारण कोरोना महामारी भी है. इस दावे की वजहें क्या है? यूएन की रिपोर्ट में और क्या-क्या दर्ज़ है?

– दूसरे बिंदु में बात करेंगे इंडोनेशिया के स्वैब स्टिक घोटाले की. ख़बर है कि कोरोना टेस्ट के लिए एक ही स्टिक का कई बार इस्तेमाल किया गया. अब इस मामले का भंडा फूट चुका है. पुलिस का दावा है कि ये स्कैम पिछले साल के दिसंबर से चल रहा है. इस घोटाले के बारे में और क्या पता चला है? साथ में इससे हुए नुकसान का आकलन भी करेंगे.

पहले यूएन की रिपोर्ट

कोरोना महामारी कितनी भयावह हो सकती है? आंकड़ों की नज़र से देखते हैं. पिछले डेढ़ साल में दुनियाभर में लगभग साढ़े 15 करोड़ लोग संक्रमित हुए. इनमें से लगभग साढ़े 32 लाख लोगों ने अपनी जान गंवा दी.

अगर कहा जाए कि कोरोना महामारी का संकट छोटा है तो आपको कतई यकीन नहीं होगा. लेकिन यही सच है. कोरोना महामारी की वजह से एक ऐसा दूसरा संकट पैदा हुआ है, जिसकी जद में अभी तक 16 करोड़ की आबादी आ चुकी है. इनमें से तीन करोड़ लोगों पर सीधी तलवार लटक रही है. अगर कुछ हफ़्तों में उनके पास मदद नहीं पहुंची तो मौतों का पहाड़ खड़ा हो सकता है.

Global Report On Food Crisis 2021
UN ने 201 का ‘ग्लोबल रिपोर्ट ऑन फ़ूड क्राइसिस’ रिलीज़ किया है.

ये दावा यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट में किया गया है. 05 मई को यूएन ने इस साल का ‘ग्लोबल रिपोर्ट ऑन फ़ूड क्राइसिस’ रिलीज़ किया. इस रिपोर्ट के मुताबिक, फ़ूड इनसिक्योरिटी यानी भोजन के प्रति असुरक्षा पिछले पांच साल में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है. वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डेविड बीज़ली ने कहा कि ये बढ़ोत्तरी अकल्पनीय है. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये आंकड़े छोटी-सी झलक भर हैं. असलियत इससे कहीं ज़्यादा बदतर है.

ये पूरी रिपोर्ट 307 पन्नों की है. इसमें फ़ूड इनसिक्योरिटी का सामना कर रहे देशों को पांच फ़ेज में बांटा गया है. पहले फेज़ में वैसे देश हैं, जहां लोगों को आसानी से दोनों टाइम का खाना मिल रहा है. उन्हें दूसरी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ती. यहां स्थिति नियंत्रण में है.

David Beasley
वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डेविड बीज़ली. (तस्वीर: एपी)

फ़ेज टू में रखे गए देशों में स्थिति ‘तनावग्रस्त’ है. इसमें शामिल देशों में लोगों के पास भोजन तो है, लेकिन उन्हें बाकी बुनियादी ज़रूरतों के लिए काफी मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं.

इसके बाद वाले तीनों फ़ेज में संकट का स्तर बढ़ता है. फ़ेज थ्री को ‘संकट-काल’, फ़ोर को ‘आपातकाल’ और फ़ेज फ़ाइव को ‘प्रलय या अकाल’ का नाम दिया गया है. इन केटेगरीज़ में कुल 55 देशों के लोग शामिल हैं. इनमें से अधिकतर देश अफ़्रीका के हैं. हालांकि, इसमें सेंट्रल अमेरिका, अफ़ग़ानिस्तान, हैती और सीरिया जैसे देशों का नाम भी है.

यहां रहने वाली आबादी का बड़ा हिस्सा कुपोषण का शिकार है. उन्हें बमुश्किल खाना मिल पा रहा है या फिर उन्हें भोजन के लिए बाकी बुनियादी आवश्यकताओं को दरकिनार करना पड़ता है.

Malnutrition Africa
अफ्रीका की आबादी का बड़ा हिस्सा कुपोषण का शिकार है. (तस्वीर: एपी)

लगभग एक लाख 33 हज़ार लोग फ़ेज फाइव में हैं. यानी वे अकाल का सामना कर रहे हैं. सच कहा जाए तो वे हर दिन मौत का इंतज़ार कर रहे हैं. उन्हें मदद की तत्काल ज़रूरत है. अगर मदद नहीं पहुंची तो वहां मौतों की गिनती गिननेवाला कोई नहीं बचेगा. इनमें से आधे से ज़्यादा लोग साउथ सूडान के हैं. बाकी यमन और बुर्किना फ़ासो में. ये तीनों देश सिविल वॉर से जूझ रहे हैं. यमन में 80 फीसदी से अधिक लोग बाहर से आनेवाली मानवीय मदद पर निर्भर हैं.

हालात कितने खराब हैं, एक उदाहरण से समझते हैं. अल जज़ीरा की एक टीम यमन में विस्थापित लोगों के एक कैंप में पहुंची. वहां उन्हें एक दिल दहलाने वाली कहानी पता चली. उस कैंप में बहुत दिनों से खाने की मदद नहीं आई थी. कोई ख़बर नहीं ले रहा था. लोग राह देखते-देखते मर रहे थे. आख़िरकार, हफ़्ते भर बाद वहां मदद पहुंची. जब वॉलंटियर्स खाना देने एक तंबू के पास गए. उन्होंने देखा कि उससे धुआं बाहर निकल रहा है. उन्हें लगा कि अंदर खाना पक रहा है. लेकिन असल में अंदर एक बर्तन में पानी उबाला जा रहा था. उसमें कुछ पत्तियां पड़ीं थी. वो महिला पिछले एक हफ़्ते से अपने बच्चों को वही पानी उबाल कर पिलाकर सुला रही थी. ऐसी अनगिनत कहानियां हैं. लाखों लोग तो बस आंकड़ा बनकर रह गए.

भोजन की असुरक्षा का सबसे बड़ा नुकसान बच्चों को होता है. ग्रोइंग एज में उन्हें ज़रूरी पोषण नहीं मिल पाता. इसके चलते उनका शरीर अपने आकार में नहीं आ पाता. कुपोषण के कारण उन्हें बीमारियां घेर लेती हैं. जिस जगह पर खाने की तगड़ी कमी हो, वहां के हेल्थ सिस्टम की आप कल्पना ही कर सकते हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन 55 देशों में 7.5 करोड़ बच्चे कुपोषण की समस्या का सामना कर रहे हैं. सिर्फ यमन में इस साल पांच बरस से कम के 04 लाख बच्चों की मौत होने की आशंका जताई गई है.

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रिपोर्ट्स के मुताबिक, 55 देशों में 7.5 करोड़ बच्चे कुपोषण की समस्या का सामना कर रहे हैं. (तस्वीर: एपी)

इस अभूतपूर्व संकट की वजहें क्या हैं?

यूएन की रिपोर्ट में तीन कारण गिनाए गए हैं.

– पहली वजह है, युद्ध और आपसी संघर्ष. कई देशों में सिविल वॉर चल रहा है. कहीं पर लोगों में असुरक्षा है. कई जगहों पर राजनैतिक अस्थिरता है. कुछ उदाहरण देखते हैं.
> साल 2011 में सीरिया में अरब स्प्रिंग की आहट हुई. असद सरकार को हटाने का आंदोलन सिविल वॉर में बदल गया. कई पक्ष बन गए. इंटरैनशनल हित भी जुड़े. उनके बीच झगड़ा चलता रहा. इन सबके बीच में आम लोग पिस रहे हैं. लाखों लोगों को अपना बना-बसा घर छोड़कर कैंपों में शिफ़्ट होना पड़ा. दो जून की रोटी के लिए उन्हें हर पल संघर्ष करना पड़ रहा है.
> यमन में सिविल वॉर 2014 में शुरू हुआ था. हूती विद्रोहियों और सेना के बीच. लड़ाई चल ही रही है. यमन अकल्पनीय मानवीय संकट के बीच में है.
> नाइजीरिया में बोकोहराम के डर से लाखों लोग पलायन कर चुके हैं. ये अभी भी जारी है.
> अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के नेतृत्व में ‘वॉर ऑन टेरर’ शुरू किया था. साल 2001 में. पिछले बीस साल से युद्ध चल रहा है. अमेरिका ने अपने सैनिकों को वापस बुलाने की डेडलाइन भी तय कर दी है. मनचाही सफ़लता न मिलने के बावजूद. नुकसान किसका हुआ? अफ़ग़ान जनता का. तालिबान अभी भी कायम है. अमेरिका के जाने के बाद वो और मज़बूत होगा. बीस सालों से बुनियादी चीज़ों के लिए जूझ रही आम जनता की मुश्किलें और बढ़ेंगी.

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यमन में 2014 से सिविल वॉर जारी है. (तस्वीर: एपी)

– दूसरी वजह है, मौसम. कई देशों ने पिछले साल चक्रवात और तूफानों का सामना किया है. होंडुरास, पनामा, निकारागुआ, ग्वाटेमाला समेत कई और देशों में मौसम ने तबाही मचाई. सेंट्रल अमेरिका में करीब 83 लाख लोग विस्थापित हुए. फसलों का भारी नुकसान भी हुआ. प्रोडक्शन कम होने के चलते चीज़ों के दाम आसमान छूने लगे. लोगों को ज़िंदा रहने के लिए बाकी ज़रूरतों में कटौती करनी पड़ी. भूख से परेशान लोग पलायन का रास्ता अपना रहे हैं.

– तीसरी और सबसे बड़ी वजह है कोरोना महामारी और उससे लगा आर्थिक झटका. नंबर 1 और नंबर 2 वाले कारण तो पहले से चले आ रहे थे. कोरोना ने इसपर कई गुणा तेज़ चोट की. इस महामारी से कोई भी देश अछूता नहीं रहा. अमेरिका जैसी महाशक्ति इस महामारी में सबसे अधिक प्रभावित हुई. जो देश मानवीय मदद पहुंचाते थे, उनको अपना फ़ोकस शिफ़्ट करना पड़ा. उन्हें अपने यहां उपजी चुनौती से लड़ने में बेहिसाब संसाधन लगाने पड़े. इसके चलते भी मदद की रफ़्तार धीमी पड़ी.

अल्प-विकसित देशों में लॉकडाउन का भी उल्टा प्रभाव पड़ा. लोगों की आय के स्रोत बंद हो गए. मसलन, दिहाड़ी मज़दूरों और स्ट्रीट वेंडर्स के लिए कोई काम नहीं बचा. उन्हें भी भोजन के लिए सरकारी सहायता की लाइन में खड़ा होना पड़ा.

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दुनिया के कई हिस्सों से भूख से परेशान लोग पलायन का रास्ता अपना रहे हैं.. (तस्वीर: एपी)

महामारी में महंगाई का ग्राफ़ अचानक से ऊपर चला गया. यूएन के आंकड़े कहते हैं कि पिछले साल खाने के सामान की कीमतों में 240 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई. निम्न-आय वाले परिवारों के लिए ये किसी आघात से कम नहीं है.

इसके अलावा, संक्रमण के खतरे की वजह से मूवमेंट भी प्रभावित हुआ. सीमाएं पहले जितनी खुली नहीं रह गईं. इसके चलते भी मदद पहुंचने में देरी हुई.

आगे का रास्ता क्या है?

यूएन के सेक्रेटरी-जनरल अंतोनियो गुटेरेस ने इस रिपोर्ट का आमुख लिखा है. इसमें वो लिखते हैं,

‘21वीं सदी में भूखमरी और अकाल की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. हम साथ में मिलकर इसे खत्म कर सकते हैं.’

ये संकट कैसे खत्म होगा? जानकार कहते हैं कि इसके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को आगे आना होगा. जिनके पास संसाधन हैं, उन्हें पहल करनी होगी. जिन देशों में सिविल वॉर या संघर्ष की स्थिति है, उसे खत्म कराना होगा. ताकि और लोग विस्थापन का शिकार न हों.
एक ज़रूरी तर्क ये भी है. विशेषज्ञों की राय है कि इन देशों में प्राथमिकता के आधार पर कोरोना की वैक्सीन लगाई जाए. इससे इकोनॉमी को खोलने और प्रतिबंधों को हटाने में तो मदद मिलेगी ही, हेल्थ सिस्टम पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव की आशंका भी घटेगी.
ये सब विकसित देशों के हाथ में है. बस इच्छाशक्ति दिखाने की दरकार है.

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यूएन के सेक्रेटरी-जनरल अंतोनियो गुटेरेस (तस्वीर: एपी)

अब लौट कर आते हैं एशिया की तरफ

इंडोनेशिया में एक अजीबोग़रीब घोटाले का पता चला है. यहां कोरोना टेस्ट में इस्तेमाल होने वाली किट को धोकर दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा था. कोरोना के टेस्ट में नाक और मुंह से सैंपल लेने के लिए एक पतली स्टिक का यूज किया जाता है. कई देशों में यात्रा के लिए आपको एयरपोर्ट पर नेगेटिव कोरोना रिपोर्ट दिखानी होती है. अधिकतर एयरपोर्ट्स टेस्टिंग की फ़ैसिलिटी उपलब्ध कराते हैं. ये अब ‘न्यू नॉर्मल’ का हिस्सा बन चुका है.

इंडोनेशिया में मेडन शहर के एयरपोर्ट पर भी सेम सिस्टम है. यहां सरकारी कंपनी ‘कीमिया फ़ार्मा’ के साथ करार है. यही कंपनी एयरपोर्ट पर टेस्ट किट उपलब्ध कराती है. पिछले कुछ दिनों में पुलिस के पास पैसेंजर्स की शिकायतें आ रहीं थी कि उन्हें एयरपोर्ट पर फ़ेक टेस्ट रिपोर्ट मिल रहीं है. एयरपोर्ट वाली जांच में उनका रिजल्ट पॉजिटिव आ रहा था, जबकि बाहर की लैब में वे कोरोना नेगेटिव हो रहे थे.

पुलिस ने शिकायत की जांच की. उन्होंने अपनी टीम से एक ऑफ़िसर को अंडरकवर बनाकर एयरपोर्ट पर भेजा. जब उसकी रिपोर्ट भी पॉजिटिव आई तो पुलिस का शक गहरा गया. इसके बाद छापा मारा गया. और वहां दिखा कि यूज़ हो चुकी स्वैब वाली स्टिक को पानी से धोकर वापस पैक किया जा रहा है. इससे न सिर्फ़ जांच के रिजल्ट पर असर पड़ने की आशंका होती है, बल्कि जिसे संक्रमण न हुआ, उसको भी संक्रमण का खतरा हो सकता है.

Indonesia Coronavirus
रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इंडोनेशिया में यह स्कैम दिसंबर 2020 से चल रहा है (तस्वीर: एपी)

पुलिस ने इस कांड में शामिल कई आरोपियों को गिरफ़्तार किया गया है. दावा है कि ये स्कैम पिछले साल दिसंबर से चल रहा है. अनुमान है कि इससे कम-से-कम 09 हज़ार लोग प्रभावित हुए होंगे. पुलिस ये भी जांच रही है कि घोटाले से मिले लगभग एक करोड़ रूपये का इस्तेमाल कहां हुआ है.

कीमिया फ़ार्मा ने इस कुकर्म में शामिल सभी स्टाफ़्स को बर्ख़ास्त कर दिया है. कंपनी दावा कर रही है कि प्रोसेस को और सख़्त बनाया जाएगा और ईमानदार स्टाफ़्स की नियुक्ति की जाएगी. फिलहाल, इस कांड से प्रभावित हुए लोग कंपनी पर मुकदमा दायर करने की तैयारी कर रहे हैं. वे अपने नुकसान के लिए मुआवज़ा मांग रहे हैं.

इंडोनेशिया, एशिया में कोरोना महामारी से सबसे अधिक प्रभावित हुए देशों में से है. यहां अब तक लगभग 17 लाख संक्रमण और 46 हज़ार मौतें दर्ज़ हो चुकी हैं.


विडियो- कोरोना माउंट एवेरेस्ट पहुंचा, नेपाल के सामने क्या खतरे हैं?

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