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अपनी आजादी के दिन पाकिस्तानी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के गले में 370 अटका है

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हम किसी भी कदम पर उन्हें (कश्मीरियों को) अकेला नहीं छोड़ेंगे. कश्मीरी हमारे लोग हैं. हम उनके दर्द को अपना दर्द समझते हैं. हम उनके साथ रहे हैं. हम आज भी उनके साथ हैं और हमेशा साथ रहेंगे.

ये कहने वाले हैं पाकिस्तान के राष्ट्रपति डॉक्टर आरिफ़ अल्वी. आज, यानी 14 अगस्त को पाकिस्तान अपनी आज़ादी का दिन मना रहा है. इस मौके पर देश का झंडा फहराते हुए राष्ट्रपति अल्वी ने सबसे ज्यादा बातें कश्मीर पर बोलीं. कश्मीर से मतलब वो हिस्सा, जो भारत के पास है. जिसपर पाकिस्तान अपना दावा करता है. राष्ट्रपति ने कहा, आज पूरी दुनिया देख रही है कि किस तरह पाकिस्तान कश्मीर के लोगों के साथ खड़ा है. प्रेजिडेंट अल्वी ने धमकाया भी. कि भारत के खिलाफ सोशल मीडिया पर लड़ाई शुरू करेंगे.

पाकिस्तान कोशिश कर रहा है, कामयाब नहीं हो पा रहा
राष्ट्रपति चाहे जो दावा करें, मगर कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैश करने की पाकिस्तान की कोई कोशिश अभी कामयाब नहीं हो रही. उसे संयुक्त राष्ट्र में जवाब मिल चुका है. कहा जा चुका है कि कश्मीर का मुद्दा उसके और भारत के बीच की बात है. इसे पाकिस्तान को द्विपक्षीय बातचीत से ही सुलझाना होगा. चीन भले ही पाकिस्तान के साथ हो. मगर रूस, जो कि चीन की ही तरह सुरक्षा परिषद का सदस्य है, इस मामले में भारत के साथ है. रूस ने साफ कहा है कि कश्मीर में भारत ने जो किया, अपने संवैधानिक ढांचे के भीतर किया. अमेरिका भी मध्यस्थता के सवाल से पीछे हट गया है. हालांकि प्रेजिडेंट ट्रंप ने पिछले दिनों जब मध्यस्थता वाली बात कही थी, तब भी भारत ने पूरी दृढ़ता से इसका विरोध किया था. कहा था कि हमेशा की तरह हम अब भी इस मसले पर किसी तीसरे पक्ष की दखलंदाज़ी स्वीकार नहीं करेंगे.

इमरान खान ने क्या कहा?
मगर इन सारे अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों के बीच पाकिस्तान अड़ा है. राष्ट्रपति अल्वी भी और प्रधानमंत्री इमरान खान भी. इमरान 14 अगस्त मनाने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) की असेंबली पहुंचे. वहां एक जॉइंट सेशन को संबोधित किया. कहा-

पाकिस्तान की आज़ादी के इस दिन पर मैं अपने कश्मीरी भाइयों और बहनों के साथ हूं.

इमरान ने जो कहा, उसकी कुछ बातें यूं हैं-

क़ायद-ए-आज़म ने आदमी के धर्म से ऊपर बढ़कर सोचा. वो अंग्रेजों के जाने के बाद हर इंसान की आज़ादी के बारे में सोच रहे थे. पिछले पांच सालों में कश्मीर के अंदर जो क्रूरता हुई वो इसी (हिंदुत्ववादी) विचारधारा की वजह से हुई. ये आर्टिकल 370 हटाने का फैसला नरेंद्र मोदी का ‘फाइनल सॉल्यूशन’ (यहूदियों को खत्म करने की नाज़ी प्लानिंग) था. हम सबको इस बात का डर है कि जब कश्मीर में कर्फ्यू हटेगा, तब हमें क्या मालूम चलेगा? भारत क्या करने की कोशिश करेगा?

नरेंद्र मोदी ने बहुत बड़ी ग़लती की है. उन्होंने अपना फाइनल कार्ड चल दिया है. उन्होंने कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बना दिया है. पहले कश्मीर के बारे में बात करना बड़ा मुश्किल होता था. अब दुनिया की नज़रें हैं कश्मीर और पाकिस्तान पर. मैं कश्मीर की आवाज़ बुलंद करने वाला दूत बनूंगा. 

RSS की इस विचारधारा ने भारत के संविधान की अहमियत कम कर दी है. बीजेपी सरकार ने मीडिया पर नियंत्रण कर लिया है. विपक्ष के नेता डरकर बोल रहे हैं. संघ के ठग लोगों को कॉन्फ्रेंस में शरीक नहीं होने दे रहे. जज भी उनसे डरे हुए हैं. ऐसा नाज़ी जर्मनी में होता था. बुद्धिजीवी भी सरकार के बारे में बोलने से डर रहे हैं. बीजेपी भारत को बर्बादी की तरफ ले जा रही है. भारत के लोग ख़ौफ में रह रहे हैं. वो लोग कश्मीर तक ही नहीं रुकेंगे. वो पाकिस्तान की तरफ भी बढ़ेंगे. हमारे पास जानकारी है. पाकिस्तानी सेना को पूरी बात मालूम है. भारत ने ‘आज़ाद कश्मीर’ (जिसे हम भारत में PoK कहते हैं) में कार्रवाई करने की योजना बनाई है. मैं प्रधानमंत्री मोदी से कहता हूं. ये मेरा संदेश है आपके लिए. आपकी हर ईंट का जवाब पत्थर से दिया जाएगा. आप जो भी करेंगे, हम उसका जवाब देंगे. हम आख़िर तक जाएंगे इसके लिए.

इमरान कई ट्वीट भी कर चुके हैं इस मूड के
इससे पहले इमरान खान ने इसी मिजाज़ पर कई ट्वीट भी किए उन्होंने. लिखा कि उन्होंने ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी’ और भारतीय जनता पार्टी का चेहरा पूरी दुनिया के आगे बेनकाब कर दिया है. इमरान लगातार कश्मीर पर लिख-बोल रहे हैं. 11 अगस्त को किए एक ट्वीट में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की हिंदुत्ववादी विचारधारा की तुलना नाज़ी आइडियोलॉजी के साथ की थी. लिखा कि इस विचारधारा के कारण हिंदुस्तान के मुसलमानों को दबाया जाएगा. उनका शोषण होगा. और फिर पाकिस्तान को निशाना बनाया जाएगा. इमरान ने लिखा कि नस्लीय सफ़ाया करके कश्मीर की जनसंख्या का हाल-चाल बदलने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से सवाल भी पूछा. कि क्या वो चुपचाप भारत को ये सब करता देखते रहेंगे. और जैसे कभी हिटलर का तुष्टीकरण किया था, वैसे ही इस मामले में भी करेंगे.

इमरान खान और पाकिस्तान के लिए कई सवाल हैं
अपने गिरेबां में झांकना बहुत आसान होता है. मगर लोग इतना आसान काम नहीं कर पाते. वरना इमरान खान और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ये सारी बातें नहीं बोलते. उन्हें अपने यहां बहुत कुछ ठीक करना है. धार्मिक कट्टरपंथ. आतंकवाद. आतंकवाद का एक्सपोर्ट. झूठा और सतही लोकतंत्र. सैनिकशाही. और, अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार. न केवल पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदू और ईसाई. बल्कि शिया और अहमदिया जैसी मुस्लिम माइनॉरिटिज़ भी ज़ुल्म का शिकार हैं. उन्हें दोहरा स्तर का नागरिक समझा जाता है. खुलेआम सिस्टमैटिक तरीके से उनका दमन किया जाता है. उनके साथ भेदभाव किया जाता है. और ऐसा आज से नहीं हो रहा. आइडिया ऑफ पाकिस्तान ही सेकुलर नहीं था. धर्म तो धर्म.

इमरान को तो लोकतंत्र की अथॉरिटी साबित करनी चाहिए पहले
इमरान खान को ये भी बताना चाहिए कि बलूचिस्तान और PoK में उनकी सेना, पहले की सरकारें और वो खुद क्या कर रहे हैं? कैसे उन्होंने बलूचिस्तान की डेमोग्रफी को बदला. किसने वहां सैकड़ों लोगों को लापता कर दिया. कैसे और क्यों कराची की डेमोग्रफी को एक सोची-समझी रणनीति के तहत बदला गया.

हमको बेशक बेहतर होना है, मगर…
ऐसा नहीं कि जम्मू-कश्मीर में लिए गए मोदी सरकार के फैसले का पूरे भारत में समर्थन हो रहा हो. आलोचना भी हो रही है. सवाल भी पूछे जा रहे हैं. उंगलियां भी उठ रही हैं. मगर यही हमारे लोकतंत्र की ताकत है. यहां हमारे पास सरकारों की आलोचना करने, उनसे सवाल करने का हक़ है. कश्मीर में आज बंदिशें हैं. मगर ये हिंसा और तनाव बढ़ने की आशंकाओं के मद्देनज़र लिया गया फैसला है. मोदी सरकार से लगातार भारत के अंदर कश्मीर पर सवाल पूछा जा रहा है. भारत को यकीनन और बेहतर होना है, मगर इमरान खान को चाहिए कि वो अपने वतन में कम से कम हमारे जैसा लोकतंत्र ही हासिल कर लें. यहां तो उनके ही चुने जाने के पीछे सेना की साज़िश का अंदेशा है. कहा जाता है कि सेना ने बैकग्राउंड में रहकर अपने लिए एक कठपुतली सरकार चुनी. विपक्षियों को जान-बूझकर निशाना बनाया गया.

…और जिन्ना का नाम लेने से पहले पाकिस्तान को ये सारे जवाब देने चाहिए
इमरान को खुद से और अपने वतन से सवाल पूछना चाहिए. कि जिस जिन्ना का वो नाम लेते हैं, क्या उनका ही सपना पूरा कर पाए? क्यों जिन्ना को उनके आखिरी दिनों में अलग-थलग कर दिया गया? क्यों 11 अगस्त, 1947 को दिए गए जिन्ना के सेकुलर भाषण के बाद सरकार की तरफ से कराची में प्रेस को निर्देश दिया गया. कि वो जिन्ना के भाषण के अंश न छापें. जिन्ना सेकुलर नहीं हैं, ये साबित करने के लिए मुस्लिम लीग ने एड़ी-चोटी का जोर क्यों लगा दिया? क्यों जिन्ना का अंतिम संस्कार दो अलग-अलग तरीकों से हुआ? रिश्तेदारों ने पर्सनली चुपके-चुपके शिया तरीके से और पाकिस्तानी हुकूमत ने सार्वजनिक तौर पर सुन्नी तरीके से? क्यों जिन्ना की बहन फातिमा को अपने भाई की मौत के दो साल बाद तक किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में बोलने की परमिशन नहीं दी सरकार ने? क्यों जिन्ना की तीसरी बरसी पर राष्ट्र के नाम संदेश देते हुए उनके रेडियो संदेश का प्रसारण काट दिया गया? जिस जिन्ना का नाम भुनाते हैं इमरान, उनकी ही बहन फातिमा ने अपने भाई के गुजरने के बाद कहा था-

अगर मेरे भाई को पता होता कि ये सब होगा, तो क्या उन्होंने पाकिस्तान बनवाने के लिए इतनी कड़ी मेहनत की होती? क्या वो ऐसा देश बनाना चाहते, जिसके पास अपना संविधान तक न हो? जहां न्याय न हो? जहां माहिर चापलूस ताकतवर बन बैठे हों और ईमानदार-इज्जतदार लोग पीछे छूट जाएं? अगर पाकिस्तान को ऐसा ही बनना था, तो फिर पाकिस्तान बनाना एक गलती थी.


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