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पाकिस्तान के इस पूर्व सैनिक को पद्मश्री अवार्ड क्यों दिया गया है?

मार्च 1971 की बात है. पाकिस्तानी सेना का 20 वर्षीय एक जवान जो वहां के सियालकोट सेक्टर में तैनात था, भारतीय सीमा में घुसते हुए पकड़ा जाता है. उसकी जेब में 20 रुपए मिलते हैं और उसके जूतों में पाकिस्तानी सेना की योजनाओं से जुड़े कुछ दस्तावेज और नक़्शे. भारतीय सैनिक उसे पाकिस्तानी जासूस समझकर उससे कई हफ्तों तक पूछताछ करते हैं. लेकिन वह सिर्फ एक ही जवाब देता है कि उसका नाम काजी सज्जाद अली जहीर है. वह पाकिस्तानी सेना द्वारा पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) में किए जा रहे अत्याचारों के चलते वहां से भागकर आया है और भारतीय सेना की मदद करना चाहता है. वह पूर्वी पाकिस्तान में पाक सेना की कुछ खुफिया योजनाओं के बारे में भारतीय सैनिकों को बताता है, जिन्हें भारतीय खुफिया एजेंसियों द्वारा सही ठहराया जाता है.

कई महीनों तक दिल्ली में एक सुरक्षित स्थान पर रखे जाने के बाद काजी सज्जाद अली जहीर को पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति बाहिनी के लड़ाकों को ट्रेनिंग देने के लिए भेज दिया गया. मुक्ति बाहिनी में पूर्वी पाकिस्तान की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन छेड़ने वाले बांग्लादेशी सैनिक, अर्धसैनिक और अन्य नागरिक शामिल थे. काजी जहीर ने मुक्ति बाहिनी और भारतीय सेना के बीच न केवल तालमेल बिठाने का काम किया बल्कि मौकों पर ऐसी योजनाएं बनाई जिनके चलते 1971 की लड़ाई में पाकिस्तानी सैनिकों को घुटने टेंकने पड़े.

बीती 10 नवंबर को भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल काजी सज्जाद अली जहीर को बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में उनके योगदान के लिए पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया.

“जिन्ना का पाकिस्तान हमारे लिए कब्रिस्तान बन गया था”

कर्नल जहीर 1969 के अंत में पाकिस्तानी सेना में शामिल हुए थे और उन्हें आर्टिलरी कोर में नियुक्ति मिली थी. इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में वे बताते हैं कि पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों पर अत्याचार किए जा रहे थे, इस सबने ही उन्हें पाकिस्तान सेना के खिलाफ बगावत करने को मजबूर किया.

पाकिस्तान से भागने के कारणों को याद करते हुए वे कहते हैं,

”जिन्ना का पाकिस्तान तो हमारे लिए कब्रिस्तान जैसा बन गया था. जिन्ना ने वादा किया था कि पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को भी समान अधिकार मिलेंगे, लेकिन हमें केवल मार्शल लॉ मिला. हमें पाकिस्तान में दूसरे दर्जे नागरिकों की तरह देखा जाता था, पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को अधिकारों से वंचित रखा गया. वादे के मुताबिक हमें लोकतंत्र कभी नहीं मिला. हमें तो वहां नौकरों की तरह समझा जाता था.”

कर्नल जहीर के मुताबिक पाकिस्तानी सेना में पूर्वी पाकिस्तान के सैनिकों के साथ भी सौतेला व्यवहार किया जाता था. द हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा,

“पाकिस्तानी सेना में हमारी ट्रेनिंग पाकिस्तानी सैनिकों की ट्रेनिंग से काफी अलग थी. जो भी सैनिक पूर्वी पाकिस्तान के रहने वाले थे, उनकी जासूसी की जाती थी, उनपर हमेशा नजर रखी जाती थी, उन्हें जबरदस्ती ऊर्दू बोलने के लिए कहा जाता था, उन्हें गालियां दी जाती थीं. उन्हें लगता था कि हम उनकी ज्यादतियों के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं.”

इंडिया टुडे से बातचीत में कर्नल जहीर कहते हैं,

“इसके बाद मुझे लगा मेरे अंदर तीन लोग हैं- मैं, मैं और सिर्फ मैं. फिर मैंने योजना बनानी शुरू कर दी कि मुझे किस रास्ते पर चलना है. मैंने जम्मू को जाने वाले शकरगाह मार्ग पर निकलने का फैसला किया, इस रास्ते पर शायद सबसे कम गश्त होती थी. इस तरह मैं भारतीय सीमा में आ गया.”

वे आगे बताते हैं कि जैसे ही वह भारत की ओर बढ़े, पाकिस्तान की ओर से गोलीबारी शुरू हो गई. बदले में भारत की ओर से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने भी जवाबी फायरिंग की. उन्होंने कहा कि वो एक बड़ी खाई में कूद गए, जिससे सुरक्षित रहे.

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लेफ्टिनेंट कर्नल काजी सज्जाद अली जहीर (फोटो क्रेडिट-इंडिया टुडे)

भारतीय सेना के साथ मिलकर पूर्वी पाकिस्तान में गुरिल्ला ऑपरेशन चलाया

भारतीय सेना द्वारा कर्नल जहीर को पूर्वी पाकिस्तान भेजे जाने के बाद वहां उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. उन्होंने जो गोपनीय दस्तावेज भारत को सौंपे थे, उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों की कमर तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने भारतीय सैनिकों के साथ तालमेल बनाकर मुक्ति बाहिनी के हजारों लड़ाकों को ट्रेनिंग दी. इन लड़ाकों ने पूर्वी पाकिस्तान के अंदर रहकर पाक सेना के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया था.

भारत-पाकिस्तान जंग का जिक्र करते हुए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा,

“हमने सितंबर 1971 से गुरिल्ला ऑपरेशन शुरू किया और पाकिस्तानी सेना को अधिकतम नुकसान पहुंचाने के लिए जल्दी से एक तोपखाने की बैटरी उठाई, क्योंकि उन्हें मानवाधिकारों का उल्लंघन करने से रोकना जरूरी था. हमने कई ऐसी जगहों को पाकिस्तानी सैनिकों से आजाद करवाया, जहां महिलाओं को बंधक बनाकर उनके साथ गलत काम किया जा रहा था.”

कर्नल के मुताबिक जब वे भारत आ गए तो पाकिस्तानी सेना ने उनके खिलाफ मौत की सजा का वारंट जारी किया था, जो उनके नाम से अभी तक जारी है. उन्हें मौत की सजा दिए जाने का ऐलान किया गया. कर्नल जहीर 1971 के मंजर को याद करते हुए बताते हैं कि उनके भागने के बाद पाकिस्तानी सेना उनकी मां और बहन को टारगेट करने लगी. हालांकि, वे दोनों भी किसी तरह भागने में कामयाब रही थीं. उनके मुताबिक पाकिस्तानी सैनिकों ने उनके घर को पूरी तरह से जला दिया था.

कर्नल काजी सज्जाद अली जहीर के पिता ब्रिटिश सेना में एक अधिकारी थे और द्वितीय विश्व युद्ध में बर्मा (म्यांमार) में हुई लड़ाई का हिस्सा थे. उनके छोटे भाई उस मुक्ति बाहिनी का हिस्सा था जिसने बांग्लादेश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी. कर्नल जहीर को 2013 में बांग्लादेश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार स्वाधीनता पदक से सम्मानित किया गया था.

द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नल जहीर अब उन बांग्लादेशी भारतीयों के परिवारों को सम्मानित करने के बांग्लादेश सरकार के प्रयासों की अगुआई कर रहे हैं जिन्होंने 13 दिनों तक चले 1971 के उस युद्ध में सर्वोच्च बलिदान दिया था, जिसके बाद बांग्लादेश बना था.


वीडियो देखें – नंगेपैर पद्मश्री लेने पहुंचीं तुलसी गौड़ा की किस तस्वीर पर फ़िदा है सोशल मीडिया?

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