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देश में ऑक्सीजन की किल्लत केजरीवाल सरकार की गड़बड़ी से बढ़ी?

अप्रैल और मई के महीने में हमने जो देखा उसे भूलाने के लिए अभी बहुत कम वक्त गुज़रा है. हमने अस्पतालों के बाहर लोगों को इलाज के अभाव में तड़पकर मरते देखा. ऑक्सीजन के एक-एक सिलेंडर की जद्दोजेहद देखी. श्मशान घाटों- कब्रिस्तानों में शवों की लंबी कतारें देखी. और इन सब के बीच वो खबरें भी देखी कि ऑक्सीजन की किल्लत से अस्पातालों में एक-एक बार में दर्जनों लोगों की मौत हुई. इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि कोरोना की दूसरी लहर में कितने ही लोगों की मौत ऑक्सीजन के अभाव में हुई. अस्पतालों में ऑक्सीजन वाले बेड खत्म थे. लोग अपने बूते पर ऑक्सीजन सिलेंडरों का इंतजाम करने में लगे थे. जिन्हें ज़रूरत पड़ी वही समझते हैं कि कितना मुश्किल था ऑक्सीजन का एक सिलेंडर जुटाना. ट्विटर-फेसबुक पर सिलेंडर्स के लिए हेल्प मांगी जा रही थी. देश की राजधानी दिल्ली के कितने ही अस्पतालों के हमने वो SOS देखे, जिसमें वो कहते थे कि 1 घंटे की ऑक्सीजन बची है या दो घंटे की ऑक्सीजन बची है. और फिर एक दिन हमें ये खबर दिखती है कि दिल्ली में ऑक्सीजन की किल्लत थी ही नहीं, जितनी ऑक्सीजन की ज़रूरत थी उससे 4 गुना ज़्यादा ऑक्सीजन मांगी जा रही थी, दिल्ली के पास तो इतनी ऑक्सीजन थी कि स्टोर करने की जगह भी नहीं थी. सुप्रीम कोर्ट की बनाई ऑडिट कमेटी की रिपोर्ट में ये बात कही गई हैं. तो असल में हुआ क्या. अगर पर्याप्त ऑक्सीजन थी तो क्या जो किल्लत हमने देखी, उसका क्या जवाब है?

ऑक्सीजन के ऑडिट वाला पूरा मामला समझते हैं

कोरोना की दूसरी लहर के वक्त ऑक्सीजन की आपूर्ति को लेकर केंद्र और राज्यों में झगड़ा चल रहा था. राज्यों को लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन देना केंद्र सरकार का काम है. इसलिए दिल्ली समेत कई राज्य कह रहे थे कि उन्हें ज़रूरत के हिसाब से ऑक्सीजन नहीं मिल रही है. ऑक्सीजन की किल्लत का मामला दिल्ली सरकार हाई कोर्ट में लेकर गई. वहां से मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा. दिल्ली के कई अस्पतालों ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, ये कहते हुए है कि उनके पास पर्याप्त ऑक्सीजन सप्लाई नहीं है, और ऑक्सीजन के अभाव में मरीजों की मौत हो सकती है. सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूढ़ की बेंच ऑक्सीजन के मामले पर सुनवाई कर रही थी. सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली सरकार ने कहा था कि उसे रोज़ाना 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की ज़रूरत है. केंद्र सरकार से इतनी ऑक्सीजन मिल नहीं रही थी. पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई तो ऑक्सीजन की सप्लाई बढ़ाई गई. ये मई के पहले हफ्ते की बात है. हालांकि तब भी दिल्ली को लगातार 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन नहीं मिल रही थी. सिर्फ 5 मई को ही दिल्ली को 730 मीट्रिक टन यानी जितनी मांगी उससे ज़्यादा ऑक्सीजन मिली थी. 6 मई को 577 मीट्रिक टन और 7 मई को 488 मीट्रिक टन ऑक्सीजन मिली थी. जबकि दिल्ली सरकार कह रही थी कि 700 मीट्रिक टन से कम में उसका काम नहीं चलेगा. यहां ये समझिए कि एक मीट्रिक टन 1 हज़ार किलो के बराबर होता है.

तो ऑक्सीजन की किल्लत वाले मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई को 12 सदस्यों की एक टास्क फोर्स बनाई. इस टास्क फोर्स का मुख्य काम था कि देश के हर राज्य में ज़रूरत के हिसाब से ऑक्सीजन की सप्लाई तय करे. सुप्रीम कोर्ट की बनाई टास्क फोर्स में 10 डॉक्टर्स थे. इनके अलावा केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव थे. कैबिनेट सचिव को टास्क फोर्स का संयोजक बनाया गया. यानी कुल 12 मेंबर थे. अब इसमें डॉक्टर्स कौन कौन थे, उनके नाम भी गिन लेते हैं.

(1) डॉ. भबतोष बिस्वास, पूर्व कुलपति, प. बंगाल यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज
(2) डॉ. देवेंदर सिंह राणा, अध्यक्ष, सर गंगाराम हस्पताल, दिल्ली
(3) डॉ. देवी प्रसाद शेट्टी, अध्यक्ष, नारायणा हेल्थकेयर, बेंगलुरू
(4) डॉ. गगनदीप कांग, प्रोफेसर, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर, तमिलनाडु
(5) डॉ. जे वी पीटर, निदेशक, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लोर, तमिलनाडु
(6) डॉ. नरेश त्रेहन, चेयरमैन, मेदांता अस्पताल, गुरुग्राम
(7) डॉ. राहुल पंडित, ICU निदेशक, फोर्टिस हस्पताल, मुलुंड, मुंबई
(8) डॉ. सौमित्र रावत, हेड, सर्जिकल गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी, गंगाराम अस्पताल, दिल्ली
(9) डॉ. शिव कुमार सरीन, सीनियर प्रोफेसर, इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंस, दिल्ली और
(10) डॉ. ज़रीर एफ उडावाडिया, श्वास रोग विशेषज्ञ, हिंदुजा और ब्रीच कैंडी अस्पताल, मुंबई

इस टास्क फोर्स के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेडिकल ऑक्सीजन की सप्लाई और इंटरनल डिस्ट्रिब्यूशन के ऑडिट की कमेटी बनाई. ऑडिट टीम में डॉ रणदीप गुलेरिया और डॉ संदीप बुधिराज को शामिल किया गया. रणदीप गुलेरिया दिल्ली एम्स के निदेशक हैं और डॉ संदीप बुधिराज मेक्स हेल्थकेयर के डायरेक्टर हैं. इनके अलावा ऑडिट टीम में केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार से एक एक आईएएस अफसर को शामिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से कहा गया था. तो इसमें दिल्ली सरकार से प्रधान सचिव गृह भूपिंदर एस भल्ला शामिल हुए और केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुबोध यादव शामिल हुए. इनके अलावा विस्फोटक नियंत्रक – संजय के सिंह भी ऑडिट टीम में शामिल थे.

दिल्ली सरकार ने ज़रूरत से अधिक ऑक्सीजन मांगी?

तो अब इस ऑडिट कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दी है. और रिपोर्ट मीडिया के पास भी आई गई. रिपोर्ट में लिखा है कि दिल्ली सरकार ने ज़रूरत से 4 गुना ज़्यादा ऑक्सीजन मांगी. रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में जितनी असल में ऑक्सीजन खर्च हो रही थी और जितने खर्च का हिसाब लगाया गया उसमें बहुत बड़ा अंतर है.

ऑडिट कमेटी ने 25 अप्रैल से 10 मई के बीच कोरोना के पीक में ऑक्सीजन का ऑडिट किया है. रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली सरकार ने 1140 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की ज़रूरत बताई थी. ये कैलकुलेशन सही नहीं है. बेड क्षमता के फॉर्मूले के हिसाब से दिल्ली में 289 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की ही ज़रूरत थी. चार अस्पतालों के नाम भी लिखे गए हैं जिनका ऑक्सीजन की ज़रूरत का हिसाब गलत था. सिंघल, आर्यन आसिफ अली, ESIC मॉडल और लाइफरे अस्पतालों ने कम बेड होने के बावजूद ज़्यादा लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन की मांग की. कुछ अस्पताल मीट्रिक टन और किलोलीटर में भी फर्क नहीं कर पाए. रिपोर्ट के मुताबिक इस तरह के गलत कैलकुलेशन से दिल्ली में ओवरऑल ऑक्सीजन की ज़रूरत बढ़ गई.

रिपोर्ट कहती है कि दिल्ली में ऑक्सीजन की सप्लाई बहुत ज़्यादा थी. इसीलिए टैंकर्स खाली नहीं हो सके, हॉस्पिटल में पूरी तरह भरे ऑक्सीजन के टैंकर्स खड़े रहे. इस ऑडिट रिपोर्ट में पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव्ज सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन यानी PESO की स्टडी का भी ज़िक्र है. PESO के मुताबिक 10 मई को दिल्ली में ऑक्सीजन टैंक्स 71 फीसदी तक भरे हुए थे. और अगर एडिशनल 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की सप्लाई होती तो उसे रखने के लिए भी जगह नहीं थी. रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन को स्टोर करने के लिए भी पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है. दिल्ली में ऑक्सीजन की रोज़ाना वाली खपत 284 और 372 मीट्रिक टन के बीच थी. दिल्ली में सरप्लस ऑक्सीजन थी जिससे बाकी राज्यों को लक्विड मेडिकल ऑक्सीजन की सप्लाई प्रभावित हो रही थी. अगर इसी तरह चलता रहता तो एक बड़ा डिजास्टर हो सकता था.

विपक्षी दलों ने केजरीवाल सरकार को घेरा

तो सुप्रीम कोर्ट की बनाई ऑडिट कमेटी की ये फाइंडिंग्स हैं. और अगर ये बातें सही हैं तो वाकई बहुत गंभीर मामला है. रिपोर्ट आने के बाद कांग्रेस और बीजेपी ने दिल्ली की केजरीवाल सरकार को घेरना शुरू कर दिया है.

विपक्ष के इन आरोपों पर दिल्ली की सरकार कह रही है कि ऐसी कोई रिपोर्ट ही नहीं है. आज डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि ऑडिट कमेटी की कोई रिपोर्ट ही नहीं आई है.

दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल का भी ट्विट आया. उन्होंने लिखा-

मैं अपने 2 करोड़ लोगों की सांसों के लिए लड़ा. जब आप चुनावी रैली कर रहे थे, मैं रात भर जग कर Oxygen का इंतज़ाम कर रहा था. लोगों को ऑक्सिजन दिलाने के लिए मैं लड़ा, गिड़गिड़ाया लोगों ने ऑक्सिजन की कमी से अपनों को खोया है. उन्हें झूठा मत कहिए, उन्हें बहुत बुरा लग रहा है.

इस भावुकता वाले जवाब के साथ सीएम केजरीवाल को तथ्यात्मक जवाब भी देना चाहिए. केजरीवाल को बताना चाहिए कि ऑडिट कमेटी की रिपोर्ट में लिखी बातों में कितनी सच्चाई है. ऑडिट कमेटी ने दिल्ली में बेड के हिसाब से ऑक्सीजन का कैलकुलेश किया है. केंद्र सरकार के पैमानों के हिसाब से हर आईसीयू बेड में हर मिनट 24 लीटर ऑक्सीजन की ज़रूरत मानी जाती है और नॉन आईसीयू बेड के लिए हर मिनट 10 लीटर ऑक्सीजन की ज़रूरत तय की गई थी. अनुमान है कि इसी हिसाब से ऑडिट कमेटी ने ऑक्सीजन की ज़रूरत का हिसाब लगाया होगा. अगर बेड्स वाली कैलकुलेशन से ज़्यादा ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ी तो उसका जवाब केजरीवाल सरकार के हिस्से में आता है. और जवाब इसका भी मिलना चाहिए कि जब ऑक्सीजन के टैंक भरे थे फिर अस्पतालों से ऑक्सीजन की कमी वाले कॉल क्यों आ रहे थे. इस पूरे मामले में दिल्ली की सरकार को अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए.


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