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खून उबाल देने वाली दुश्मनी, फिर भी चीन से रिकॉर्ड तोड़ व्यापार करने को क्यों मजबूर हैं हम?

गलवान घाटी में नए साल पर चाइनीज झंडा फहराए जाने की ‘ग्लोबल टाइम्स’ की खबर से अगर आपका खून उबाल मार रहा हो, तो एक और खबर पढ़ लीजिए. साल 2021 में भारत-चीन के बीच व्यापार ने अब तक के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं. साल के 11 महीनों में 46 फीसदी ज्यादा यानी 114 अरब डॉलर का व्यापार हुआ. अगर आखिरी महीने का अनुमानित आंकड़ा जोड़ लें तो पूरे साल में यह 125 अरब डॉलर के पार जा सकता है.

लेकिन इसमें हमारे लिए खुशी या सुकून की कोई बात नहीं है. चीन के जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम (GAC) की ओर से जारी आंकड़ों की मानें तो इसमें भारत का व्यापार घाटा करीब 54 फीसदी बढ़कर 61.5 अरब डॉलर हो गया है. यानी भारत ने जितना माल (26.3 अरब डॉलर) चीन को निर्यात किया, उससे 61.5 अरब डॉलर ज्यादा (87.8 अरब डॉलर) आयात किया.

ऐसा तब है, जब सरकार मेक इन इंडिया और प्रॉडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी स्कीमों से घरेलू कंपनियों को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रही है. फेस्टिव सीजन ही सही, पर वर्षों से बायकॉट चाइना वाली एक मुहिम भी चली ही आ रही है. इन सबके बावजूद चीन से हमारा इम्पोर्ट घटने के बजाय बढ़ रहा है. इसकी वजहों पर बहस नई नहीं है. लेकिन चीन सरकार का मुखपत्र कहे जाने वाले ग्लोबल टाइम्स ने एक बार फिर हमारी खिल्ली उड़ाई है. उसने घुमा-फिराकर यही कहा है कि चीन से सामान मंगाते रहने में ही भारत की भलाई है. तो क्या चीन से इम्पोर्ट वाकई हमारी मजबूरी बन चुकी है ? हमने ट्रेड, इंडस्ट्री और निर्यात संगठनों की मदद से इसकी पड़ताल की.

बायकॉट बनाम मजबूरी?

हर साल की तरह 2021 में भी भारत ने चीन से सबसे ज्यादा इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मंगाए हैं. उसके बाद मशीनरी, रिएक्टर्स, बॉयलर, केमिकल, प्लास्टिक, फर्टिलाइजर, आयरन-स्टील का नंबर आता है. यह फेहरिस्त लंबी है. गिनाने का मकसद सिर्फ यह बताना है कि घरेलू उपयोग और त्योहारी सामान का नंबर बहुत बाद में आता है. फेस्टिव सीजन में जिस चाइनीज सामान का बहिष्कार कर हम फूले नहीं समाते, उनकी कुल इम्पोर्ट में हिस्सेदारी दो फीसदी भी नहीं है. यानी हमारे आपके बहिष्कार से इन आंकड़ों का कुछ खास नहीं बिगड़ने वाला.

यहां एक बात साफ हो गई कि चीन पर असली निर्भरता हमारी इंडस्ट्रीज की है. इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि पिछले दिनों देश की सबसे बड़ी कार निर्माता मारुति सुजुकी के चेयरमैन आर.सी. भार्गव ने कहा कि चीन से किफायती कंपोनेंट का इम्पोर्ट हमारी जरूरत है और इसे रोकना समझदारी नहीं होगी.

अब आपको ले चलते हैं छोटी इंडस्ट्रीज की तरफ. करीब दस हजार ऑटो कंपोनेंट ट्रेडर्स वाले कश्मीरी गेट के कारोबारी और इम्पोर्टर उमेश सेठ ने हमें बताया-

“5 मई 2020 की गलवान घटना के बाद और कोरोना महामारी के बीच, सरकार ने चीन से आयात घटाने की खूब कोशिश की थी. कई आइटमों को ब्लैकलिस्ट कर दिया. ट्रेड-इंडस्ट्री से भी कहा गया कि आयात के लिए चीन से परे वैकल्पिक बाजार तलाशें. हमने विकल्प तलाशे. लेकिन निराशा ही हाथ लगी. कार की एक लाइट जो चीन से 1200 रुपये की पड़ती है, ताइवान में 3000 रुपये की मिलती है. एक छोटी सी वेयरिंग चीन से मात्र 2 रुपये पीस आती है. यहां इतने में तो उसकी डिब्बी भी नहीं मिलेगी. कार का एक फुटमैट घरेलू मैन्युफैक्चरर 800-1000 रुपये में देता है. सिंगापुर और ताइवान से वह 500 का पड़ेगा. लेकिन वही फुटमैट चीन से 300 रुपये में आ जाता है. चीन से इम्पोर्ट अचानक रोकना तो बैकफायर करेगा. हमें पहले अपनी मैन्युफैक्चरिंग को इस लायक बनाना होगा.”

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चाइनीज सामान के बहिष्कार की मुहिम की फाइल फोटो (साभार: आजतक)

फिनिश्ड गुड्स पर लगे रोक

पिछले कुछ समय से चीन भारत से बड़े पैमाने पर आयरन का आयात करता है. कई बार भारत के कुल उत्पाद का 80-90 फीसदी तक. फिर उसी से स्टील और दूसरे प्रॉडक्ट बनाकर भारत ही नहीं दुनियाभर में बेचता है. अब घरेलू मैन्यूफैक्चरर्स को यह बात खटक रही है. उद्योग संगठन भी इसका विरोध करते रहे हैं.

पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के प्रेसिडेंट प्रदीप मुल्तानी कहते हैं,

‘चीन के साथ सीमा पर जो कुछ होता रहा, वह तो दुखी करने वाला है ही, इम्पोर्ट के ये आंकड़े भी हमें अच्छे नहीं लगते. लेकिन दुर्भाग्य से अभी हम कच्चे माल और कंपोनेंट के मामले में चीन की जगह नहीं ले सकते. सरकार को चाहिए कि वह ज्यादा से ज्यादा इंसेंटिव देकर उन चीजों को यहीं बनाए जो चीन से आ रही हैं. फिलहाल हमारी कोशिश चीन से फिनिश्ड गुड्स रोकने की होनी चाहिए. इसके अलावा बिजली, लेबर, लॉजिस्टिक्स की हमारी लागत में कमी आए तो कोई वजह नहीं कि हम चीन को टक्कर न दे पाएं.’

लेकिन दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं, जो मानते हैं कि अगर हम चाइनीज कच्चे माल से उत्पादन में जुटे हैं, तो चीन को रॉ मैटीरियल रोकना कहां तक उचित होगा. मसलन, देश में बनने वाली ज्यादातर दवाइयों के लिए करीब 65 फीसदी कच्चा माल चीन से आता है. पैरासिटामॉल जैसी जरूरी दवा का एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट (API) भी चीन से ही आता है. चीन से हाल में जिन चीजों का आयात बढ़ा है, उनमें मोबाइल पार्ट और ऑटो कंपोनेंट जैसे इंटरमीडियरी प्रॉडक्ट ज्यादा हैं. इससे भारतीय मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात में मदद ही मिली है. 1 अप्रैल 2021 को केंद्र सरकार ने PLI स्कीम लॉन्च की थी. मकसद था देश में टेलिकॉम उपकरणों का उत्पादन बढ़ाना. एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले नौ महीनों में ही देश में करीब 6200 करोड़ रुपये के टेलिकॉम प्रॉडक्ट बनाए गए हैं.

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स्टील उत्पादन की सांकेतिक तस्वीर ( साभार :आजतक)

लागत में हम कहां ठहरते हैं?

चीन में इंडस्ट्री की बेहद कम लागत ही उसे प्रतिस्पर्धी बनाती है. इसी के दम पर चीन ने वैश्विक निर्यात में अमेरिका और जर्मनी को पीछे छोड़ दिया है. वहां लॉजिस्टिक कॉस्ट कुल लागत की 3-4 फीसदी है, जबकि भारत में यह 10-14 फीसदी तक आती है. चीन के सुपरमार्केट ईवू से व्यापारिक संबंध रखने वाले पवन कुमार ने बताया-

‘चीन के गुआंगजो से मुंबई पोर्ट 7300 किलोमीटर दूर है, जबकि दिल्ली से मुंबई 1400 किलोमीटर. लेकिन चीन से मुंबई तक शिपमेंट मंगाने की लागत दिल्ली से मुंबई के ट्रक भाड़े से भी कम है. ऐसे में चीन से सामान मंगाना किसी भी ट्रेडर के लिए किफायती होगा. यह बात रॉ मैटीरियल और कंपोनेंट मंगाने वाली इंडस्ट्रीज पर भी लागू होती है.’

चीन में 45 पर्सेंट इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन सरकारी नियंत्रण में है. बाकी कंपनियों को भी एक सीमा तक परचेज की सरकारी गारंटी हासिल होती है. इसके अलावा यूनिट लगाने के लिए सस्ती जमीन, फ्री ट्रेड जोन, मार्केट डिवेलपमेंट ग्रांट, टैक्स छूट लागत घटाने में मददगार होता है. चीन में बैंकों से लोन 3-4 फीसदी ब्याज दर पर उपलब्ध हो जाता है, जबकि यहां लघु उद्योगों को भी 10-12 फीसदी से कम पर लोन नहीं मिलता.

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चाइनीज शिपमेंट की सांकेतिक तस्वीर

सस्ती मशीनरी का दबदबा

भारत से चीन को होने वाले निर्यात में बड़े पैमाने पर इंजीनियिरंग गुड्स भी हैं. लेकिन फिर भी देश के सभी तरह के उद्योगों में चाइनीज मशीनरी की घुसपैठ लगातार बढ़ी है. मसलन, प्लास्टिक मोल्डिंग डाई भारत में बनवाने के लिए किसी कारोबारी को छह महीने इंतजार करना पड़ता है और कीमत बैठती है 40 लाख रुपये. यही डाई 15 लाख में तीन महीने के भीतर चीन से बनकर आ जाती है.

जानकारों का कहना है कि अगर सरकार चीन के अलावा दूसरे वैकल्पिक देशों से सामान मंगाने पर कस्टम ड्यूटी में छूट दे तो इम्पोर्टर उधर का रुख कर सकते हैं. लेकिन अब भी ज्यादातर एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर हमारी इकॉनमी को अगले कई साल तक 7-8 फीसदी या इससे ज्यादा रेट से ग्रो करना है, तो चाइनीज कंपोनेंट पर रोक लगाकर यह संभव नहीं दिखता.

फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के प्रेसिडेंट डॉ. ए. शक्तिवेल कहते हैं,

‘चीन से अचानक इम्पोर्ट बंद करने से यहां इंडस्ट्रीज के सामने सरवाइवल की चुनौती आ जाएगी. बड़े पैमाने पर उद्योग चीन से मंगाए कलपुर्जों की असेंबलिंग पर निर्भर हैं. सरकार अपने लेवल पर इस दिशा में काम कर रही है. कोविड के बाद कई चीजों के उत्पादन में हम आत्मनिर्भर भी हुए हैं. लेकिन अभी समय लगेगा.’

ए. शक्तिवेल ने कहा कि जिन-जिन उत्पादों में हम आत्मनिर्भर होते जाएंगे, चीन से आयात अपने आप बंद हो जाएगा.

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कार मैन्युफैक्चरिंग की सांकेतिक तस्वीर ( साभार: आजतक)

निर्यात बढ़ाकर दें जवाब

जानकारों का यह भी कहना है कि भारत को चाइनीज इम्पोर्ट रोकने के बजाय अपना निर्यात बढ़ाने पर फोकस करना चाहिए. भले ही इसके लिए चाइनीज कंपोनेंट, मशीनरी और कच्चे माल का सहारा क्यों न लेना पड़े. फिलहाल भारत से चीन को होने वाले निर्यात में लौह अयस्क, ग्रेनाइट स्टोन, पेट्रोलियम उत्पाद, कार्बनिक रसायन, रिफाइंड कॉपर, कॉटन यार्न, मछली, मसाले, काली मिर्च और कुछ अन्य खाद्य चीजें हैं.

कॉमर्स मिनिस्ट्री की ओर से जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक भारत ने बीते साल निर्यात में तेजी दिखाई है. हालांकि चीन से इम्पोर्ट बढ़ा है, लेकिन कई चीजों के आयात में उस पर से निर्भरता घटी है. मसलन, आयात में सबसे बड़ी हिस्सेदारी इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट की होने के बावजूद इसमें पहले के मुकाबले गिरावट आई है. इसी तरह कई चीजों का निर्यात भी चीन को बढ़ा है.

पिछले साल भारत ने चीन को चावल का रिकॉर्ड निर्यात किया है. इसके अलावा भी कई खाद्य सामान के निर्यात में तेजी आई है. देश का कुल निर्यात बीते अक्टूबर तक 300 अरब डॉलर को पार कर गया था और इस वित्त वर्ष (2021-22) में इसके 400 अरब डॉलर के लक्ष्य के भी पार जाने की उम्मीद है.


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