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'1917': इस ऑस्कर की सबसे तगड़ी फ़िल्म जिसे देखते हुए मुंह खुला का खुला रह जाता है

हमारी 'ऑस्कर वाली फ़िल्में' (2020) सीरीज़ में दूसरी है डायरेक्टर सैम मेंडेज़ की '1917'.

“एक विधवा को खुश करने के लिए, रिबन के एक टुकड़े जैसा कुछ नहीं होता.”

– युद्ध के आदेशों में ख़ुद को झोंक देने वाला और तकरीबन पूरी तरह युद्ध की निरर्थकता से उकता चुका लेफ्टिनेंट लेज़्ली ये बात ब्रिटिश सैनिकों ब्लेक और स्कोफील्ड से कहता है, जब वे उसके पास आते हैं और अपने मिशन के बारे में बताते हुए कहते हैं कि जनरल एरिनमोर को पूरा यकीन है दुश्मन जर्मन सेना पीछे हट चुकी है और इलाका खाली कर चुकी है. इस पर लेज़्ली कहता है, “मुंह बंद करो! हम लोग इस घटिया जगह के एक-एक इंच को पाने के लिए लड़े हैं और मरे हैं. और अब एकदम से ये जगह मीलों तक खाली हो गई? ये एक बिछाया हुआ जाल है. पर ख़ैर, तुम खुश हो जाओ. इसमें भी मेडल छुपा हुआ है ये पक्की बात है. एक विधवा को खुश करने के लिए एक रिबन के टुकड़े जैसा कारगर कुछ नहीं होता.” वो बात जो युद्ध के बारे में इतनी कठोर ईमानदारी से कभी भी कही नहीं जाती.

ये कहानी उत्तरी फ्रांस के ग्रामीण मैदानों से शुरू होती है. जहां दूर दूर तक हरी घास बिछी है. हरे पेड़ हैं. पीले फूल भी हैं. ठंडी बयार है. और सलेटी बारूद के बादल हैं. पहला विश्व युद्ध चल रहा है. वेस्टर्न फ्रंट पर ब्रिटिश सेना के जनरल एरिनमोर दो सैनिकों को बुलाते हैं. लांस कॉरपोरल स्कोफील्ड और ब्लेक. इन्हें एक मिशन दिया जाता है. खतरनाक और करीब करीब असंभव. इन्हें दुश्मन जर्मन सेना के कब्जे वाले इलाके से होकर जाना है. अपनी सेना की एक बटालियन तक पहुंचना है. और उनको सुबह का अटैक रोकने के लिए कहना है. क्योंकि वहां जर्मन सेना ने जाल बिछा रखा है. अगर ब्रिटिश सेना ने हमला किया तो क़त्लेआम होगा.

जब स्कोफील्ड पूछता है कि क्या सिर्फ हम (दोनों) ही जा रहे हैं (या और भी सैनिक होंगे)? तो जनरल उसे जवाब देते हैं – “चाहे नीचे नरक की ओर हो या ऊपर राज सिंहासन की तरफ… वही इंसान सबसे तेज़ी से यात्रा करता है, जो अकेले यात्रा करता है.” सैल्यूट करके वो दोनों बाहर निकल आते हैं. मिशन पर इन दोनों को भेजने का एक खास कारण है. वो ये कि ब्लेक का भाई भी उस बटालियन में है जो मारी जाएगी. ऐसे में वो ड्यूटी करने के अलावा अपने भाई की जान बचाने के लिए भी जाएगा. और ऐसा करने के लिए इन दोनों के पास सिर्फ 8 घंटे हैं. 1600 सैनिकों की जिंदगी का सवाल है.

Oscars 2020 Series Lallantop 1917 Sam Mendes

‘1917’ एक मॉडर्न मास्टरपीस भी कही जा सकती है. इसकी दो बातें बड़ी ख़ास हैं.

पहली ये कि 119 मिनट की इस फ़िल्म को सिंगल टेक में बनाया गया है. टेक्नीकली कहें तो ये सिंगल टेक का आभास देती है. इसमें कई डिजिटल एडिट्स भी किए गए हैं. लेकिन वो दिखते नहीं. फ़िल्म अधिकतर 6 या 8 मिनट जितने लंबे टेक्स में शूट हुई है. ये लंबाई भी कोई मामूली बात नहीं है. वो भी तब जब सेट्स को रीयूज़ नहीं किया गया. एक सेट पर बहुत देर रुका नहीं गया. फ़िल्म के सेट पूरी तरह आउटडोर रहे हैं. हर एक बढ़ते मिनट के साथ एक नया सेट खुलता चला जाता है, जो विहंगम आकार वाला है. दुर्गम है. और बहुत ही असली लगने वाला है. ‘1917’ की मेकिंग ऐसी है कि ब्लेक और स्कोफील्ड इन दोनों सैनिकों के साथ हर पग, हर खाई, हर मलबे, हर बहाव और दुश्मन टैरेटरी में होने के हर पल के भय को दर्शक साथ रहकर महसूस कर सके.

दूसरी ख़ास बात इसका ग़ैर-साधारण वॉर फ़िल्म होना है. ‘1917’ क्रिस्टोफऱ नोलन की कोई दो साल पहले आई ‘डनकर्क’ की धारा की फ़िल्म है. या फिर 2016 में आई ‘हैकसॉ रिज’ जैसी. जिसे देखकर आप युद्ध को रोमैंटिसाइज़ नहीं करते. युद्ध देखते हुए मज़ा नहीं आता. बल्कि उसकी विषमता, भयावहता, नग्नता और रक्तपात से कांपते हैं. इन सबसे अधिक आप सोचने को मजबूर होते हैं कि लापरवाह या प्रोपोगैंडा मीडिया के बहकावे में आकर युद्ध की मांग करने वाले लोग क्या कभी समझ पाते हैं कि वॉरज़ोन में एक सैनिक का जीवन कोई वीरता भरी नशीली कविता नहीं होता. बल्कि वो वहां रेंगता है, एक-एक क्षण अपनी जान बचाता है और जब मरता है तो उस मौत का कोई जायज़ कारण नहीं होता. वॉर की अर्थहीनता को प्रकट करना इस फ़िल्म की उपलब्धि है. और ऐसा करते हुए वो सैनिकों की गरिमा को कहीं कम नहीं करती.

इस संदर्भ में एक सीन भुलाए नहीं भूलता. कि एक हवाई डॉगफाइट के दौरान एक जर्मन विमान ज़मीन पर क्रैश हो जाता है. आग लग जाती है. ब्लेक और स्कोफील्ड उसमें बैठे पायलट को बचाने की कोशिश करते हैं ये जानते हुए भी कि वो जर्मन है. दुश्मन है. वो जलते विमान में से उसे बाहर निकालते हैं. एक उसे ढांढस बंधाता है, संभालता है और दूसरा उसके लिए पानी लेने जाता है.

फिल्म में ऐसे दृश्यों की लंबी सूची है जो बांध देते हैं या बींध देते हैं. जैसे –

1 जब आगे बढ़ रहे दोनों ब्रिटिश सैनिकों के सामने कंटीली बाड़ में उलझे पड़े सैनिकों के शव आते हैं.

2 वो सीन जहां स्कोफील्ड दुश्मन की गोलियों से बचकर भाग रहा होता है और फिर तेज़ बहती नदी में छलांग लगाता है. फिर उसमें ख़तरनाक बहावों से गुज़रता है, गिरता है. थक के चूर जब वो किनारे की ओर बढ़ रहा होता है तो वहां कोई ढेर सा जमा होता है. वो उस पर चढ़कर आगे खिसकना शुरू करता है. वो ढेर और कुछ नहीं, सैनिकों के तेरते शव हैं. स्कोफील्ड एक-एक लाश के ऊपर से घिसटता हुआ ज़मीन पर पहुंचता है. बदहवास और आतंकित.

1917 Oscar Movie Actor George Mackay Dead Bodies Scene
उस दृश्य में स्कोफील्ड. वो कठिनाइयों के आगे स्वीकार भाव से चलता है. (फोटोः यूनिवर्सल पिक्चर्स)

3 क्लाइमैक्स से कुछ पहले का एक सीन जहां स्कोफील्ड देखता है कि अब खंदक में से होते हुए कर्नल मकेंज़ी तक पहुंचना संभव नहीं. बहुत देर होने को है. तो वो खंदक से बाहर निकल मैदान में ही दौड़ पड़ता है, दूसरे सिरे तक पहुंचने के लिए. वो दौड़ता जाता है. मैदान में धावा बोलने के लिए दौड़ रहे सैनिकों से टकराकर गिरता जाता है. लेकिन फिर उठकर दौड़ना शुरू कर देता है. करीब एक चौथाई मील वो भागता है. हम देखते देखते थक जाते हैं, इस सीन को निर्मित करते हुए दौड़ने वालों का क्या हाल हुआ होगा. एक्टर जॉर्ज मकै समेत.

सैम मेंडेज़ ने इस फ़िल्म को डायरेक्ट किया और क्रिस्टी विल्सन-केर्न्स के साथ मिलकर लिखा है. वे इंग्लिश थियेटर से आते हैं. 1999 में पहली ही फ़िल्म से इंद्रधनुष बना दिया था. अपनी डायरेक्टोरियल डेब्यू ‘अमेरिकन ब्यूटी’ के लिए उन्होंने बेस्ट डायरेक्टर का ऑस्कर जीता था. बीस बरसों के सिनेमा करियर में ‘1917’ उनकी आठवीं फ़िल्म है. इससे पहले उन्होंने दो जेम्स बॉन्ड मूवीज़ बनाई थीं. 2012 में आई ‘स्कायफॉल’ और 2015 में आई ‘स्पैक्टर’. ‘1917’ की कहानी उनके ज़ेहन में तब से रही है जब वो बच्चे हुआ करते थे. क्योंकि उनके दादा एल्फ्रेड मेंडेज़ पहला विश्व युद्ध लड़े थे. वो एक पोस्ट से दूसरी पोस्ट संदेश पहुंचाते थे. बचपन में सैम को उन्होंने ऐसे ही एक मैसेंजर की कहानी सुनाई थी. धुंधली ही सही वो सैम को हमेशा याद रही. यहीं से फ़िल्म का आधार आया.

फ़िल्म में दो ब्रिटिश सैनिकों का रोल करने वाले एक्टर्स अपेक्षाकृत नए हैं. ब्लेक का रोल करने वाले डीन चार्ल्स चैपमैन को तो हमने फिर भी टीवी सीरीज़ ‘गेम ऑफ थ्रोन्स’ में सर्सी के छोटे बेटे टॉमेन बराथियन की भूमिका में देखा है. पिछले साल वे टिमथी शालामे के साथ पीरियड फ़िल्म ‘द किंग’ में भी नजर आए. लेकिन स्कोफील्ड का रोल करने वाले जॉर्ज मकै अधिकतर लोगों के लिए नया चेहरा हैं. ये और बात है कि वे करीब 18 साल से ब्रिटेन में फ़िल्में कर रहे हैं. इस फ़िल्म में मुख्य पात्र वे ही हैं. उनका स्टैमिना अच्छा है, बहुत आगे जाएंगे.

प्रोडक्शन डिज़ाइन और एडिटिंग के अलावा फिल्म की सिनेमैटोग्राफी का विशेष ज़िक्र किया जाना चाहिए जिसकी पूरे अवॉर्ड सीज़न में सबसे ज्यादा चर्चा रही है. इसके कारीगर हैं रॉजर डीकिन्स जो अपने क्राफ्ट के मामले में दुनिया में अभी मौजूद सबसे बेस्ट लोगों में से एक हैं. उन्होंने ‘ब्लेड रनर 2049’, ‘सिकारियो’, ‘द शॉशेंक रिडेम्पशन’, ‘द बिग लेबोवस्की’, ‘अ ब्यूटीफुल माइंड’, ‘द विलेज’, ‘ट्रू ग्रिट’ और ‘स्कायफॉल’ जैसी फ़िल्मों की सिनेमैटोग्राफी की है. ‘ब्लेड रनर 2049’ के लिए उन्होंने बेस्ट सिनेमैटोग्राफी का ऑस्कर भी जीता. इस बार ‘1917’ के लिए भी जीत लिया है. वे 15 बार नॉमिनेट हो चुके हैं.

2020 के ऑस्कर में ‘1917’:
10 नॉमिनेशन मिले. तीन जीते.

बेस्ट पिक्चर – सैम मेंडेज़, पिप्पा हैरिस, जेन-ऐन टेंगरेन, कैलम मैकडगल
डायरेक्टर – सैम मेंडेज़
राइटिंग (ओरिजिनल स्क्रीनप्ले) – सैम मेंडेज़, क्रिस्टी विल्सन-केर्न्स
सिनेमैटोग्राफी – रॉजर डीकिन्स
मेकअप और हेयरस्टायलिंग– नाओमी डॉन, ट्रिस्टन वर्स्लुइस, रबेका कोल
म्यूजि़क (ओरिजिनल स्कोर) – थॉमस न्यूमैन
प्रोडक्शन डिज़ाइन – डेनिस गैस्नर, सेट डैकोरेशन – ली सेन्डेल्स
साउंड एडिटिंग – ऑलिवर टार्नी, रैचल टेट
साउंड मिक्सिंग – मार्क टेलर, स्टुअर्ट विल्सन
विजुअल इफेक्ट्स – गीयोम रॉशेरॉन, ग्रेग बटलर, डॉमीनिक टूही

2020 की ऑस्कर सीरीज़ की अन्य फ़िल्मों के बारे में पढ़ें:
Parasite – 2020 के ऑस्कर में सबको तहस नहस करने वाली छोटी सी फ़िल्म
Ford Vs Ferrari – जब 24 घंटे चलने वाली खतरनाक रेस में ड्राइवर के साथ कार कंपनी ही धोखा कर देती है
Judy – वो महान एक्ट्रेस जिसे भूख लगने पर खाना नहीं गोलियां खिलाई जाती थीं
Joker – इस फ़िल्म को लेकर क्यों लगा कि ये हिंसा करवाएगी?
Marriage Story – मोटी फ़िल्मों के नीचे दबी अनोखी छोटी सी कहानी जो ज़रूर देखनी चाहिए
Once Upon A Time In Hollywood – किस नामी एक्ट्रेस के नृशंस हत्याकांड पर बेस्ड है ये फ़िल्म?
Jojo Rabbit – यहूदी नरसंहार करने वाले नाज़ियों पर बनी कॉमेडी फ़िल्म जिसे आज देखना बहुत ज़रूरी है

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