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अमेरिका से अच्छी खबर आई है, इंडिया की फिल्म ने ऑस्कर जीत लिया

25 फरवरी 2019 को 91वें अकैडमी अवॉर्ड्स अनाउंस किए गए. इस बार ऑस्कर से इंडिया का भी एक कनेक्शन है. ये कनेक्शन है एक शॉर्ट फिल्म या डॉक्यूमेंट्री, जो चाहे कह लीजिए. इस फिल्म का नाम है ‘पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस’. इसे ऑस्कर्स के शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री कैटेगरी में दुनियाभर की नौ और शॉर्ट डॉक्यूमेंट्रीज़ के साथ नॉमिनेट किया गया था. समाज में पीरि‍यड्स के टैबू पर बनी यह डॉक्यूमेंट्री ने बेस्ट डॉक्यूमेंटी अवॉर्ड में ऑस्कर जीत लिया है. बधाई हो.

इस डॉक्यूमेंट्री की कुछ दिलचस्प बातें हम आपको नीचे बता रहे हैं.

ट्वीट देखिए.

किस बारे में है ‘पीरियड. दी एंड ऑफ सेंटेंस’?

ये कहानी है दिल्ली से कुछ 106 कि.मी दूर उत्तर प्रदेश के एक शहर हापुड़ के महिलाओं की. इन महिलाओं ने छोटे शहरों में पीरियड्स को लेकर एक बनी-बनाई धारणा के खिलाफ जंग छेड़ दी थी. ये डॉक्यूमेंट्री बात करती है उन औरतों की जिनकी पिछली पीढ़ियों को सैनिटरी पैड के दर्शन नहीं थे. न ही उसके बारे में कुछ पता था. इससे उस गांव की लड़कियों को कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें पेश आती थीं. कभी उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ता, तो कभी पढ़ाई ही छोड़ देनी पड़ती थी. इसके बाद उनके गांव में एक सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन लगा दी गई. इस चीज़ ने उनके जीवन में आमूलचूल बदलाव ला दिया. जिन महिलाओं को सैनिटरी पैड्स के बारे में पता तक नहीं था, अब उन्होंने इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. वो भी अपने हाथों से बनाकर. वो इन पैड्स का सिर्फ खुद ही इस्तेमाल नहीं करती, इसे बेचती भी हैं. ताकि दूसरी महिलाओं तक भी ये सुविधा पहुंच पाए और उनकी आय का साधन भी हो. अक्षय कुमार की फिल्म ‘पैडमैन’ भी इस चीज़ के बारे में थी. वो फिल्म अरुणाचलम मुरुगनाथम की असल ज़िंदगी से प्रेरित होकर बनाई गई थी. इस शॉर्ट फिल्म/डॉक्यूमेंट्री में जिन पैड बनाने वाली मशीनों को लगवाया गया है, वो मुरुगनाथम की ही बनाई हुई है. इसलिए फिल्म में मुरुगनाथम की झलकी मिलेगी लेकिन इस डॉक्यूमेंट्री का ज़्यादा फोकस पैड को इस्तेमाल करने वाली महिलाओं पर रखा गया है. बाकी हापुड़ गांव की महिलाएं ही इसमें काम करती दिखाई देंगी.

फिल्म का पोस्टर.
फिल्म का पोस्टर.

फिल्म का नाम भी कतई क्रिएटिव है

इस 26 मिनट लंबी डॉक्यूमेंट्री/ शॉर्ट फिल्म का नाम है ‘पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस’. ये अंग्रेजी भाषा में है. इसकी मतलब भी काफी ट्रिकी है. एक तो पीरियड वो होता है, जिसे शुद्ध हिंदी में मासिक धर्म कहते हैं. और दूसरा पीरियड होता है ग्रैमर में. पिछले वाक्य में ‘में’ के ठीक बाद जो बिंदी लगी है, उसे भी पीरियड ही कहते हैं. आसान भाषा में समझें तो किसी वाक्य के आखिर में लगने वाली बिंदी, जिसे बातचीत की भाषा में फुल स्टॉप कहा जाता है. उस लिहाज़ से इस फिल्म का नाम ये कहना चाहता है कि ‘पीरियड’ से सिर्फ कोई वाक्य खत्म होना चाहिए, किसी पढ़ाई या स्कूल नहीं! क्लीयर हुआ?

अमरीकी स्कूल, ईरानी डायरेक्टर औरइंडियन प्रोड्यूसर

दी पैड प्रोजेक्ट एक संस्था है, जो पीरियड संबंधी विषयों पर काम कर रही है. उसने कैलिफॉर्निया के ओकवुड नाम के हाई स्कूल के बच्चों और उनकी टीचर मेलिसा बर्टन की मदद से ये डॉक्यूमेंट्री बनाई है. ‘पीरियड. दी एंड ऑफ सेंटेंस’ को डायरेक्ट किया है ईरानी-अमरीकी मूल की फिल्ममेकर रायका जेहताब्ची ने. रायका इससे पहले 2016 में ईरानी भाषा में ‘मादरान’ और 2018 में ‘श्नूफ’ नाम की शॉर्ट फिल्में बना चुकी हैं.

इसे प्रोड्यूस किया है इंडियन प्रोड्यूसर गुनीत मोंगा ने. गुनीत अपने प्रोडक्शन हाउस सिख्या एंटरटेनमेंट की मदद से पहले भी कई कंटेंट ड्रिवन फिल्मों से जुड़ी रह चुकी हैं. अगर गुनीत के प्रोडक्शन में बनी फिल्मों के नाम लिए जाएं, तो ‘दसविदानिया’, ‘दैट गर्ल इन येलो बूट्स’, ‘दी लंचबॉक्स’, ‘मसान’, ‘हरामखोर’ और ‘मॉनसून शूटआउट’ जैसी नाम शामिल हैं. इनमें से ‘दी लंचबॉक्स’ को 2015 बाफ्टा (BAFTA) में बेस्ट गैर-अंग्रेज़ी फिल्म कैटेगरी में नॉमिनेट किया गया था. साथ ही उस फिल्म को दुनियाभर में सराहा भी गया था. अब उन्हीं के को-प्रोडक्शन में बनी ‘पीरियड. एंड ऑफ सेंटेंस’ ऑस्कर में शॉर्ट डॉक्यूमेंट्री कैटेगरी में अवार्ड जीत गई है. नॉमिनेट होने के बाद पीटीआई से बात करते हुए गुनीत ने बताया था कि वो उत्साहित और प्राउड महसूस कर रही हैं. वो चाहती हैं कि उनकी फिल्म टॉप फाइव में पहुंचे. यहां तक पहुंचना भी उनके लिए बड़ी बात है. और अब उनकी फ़िल्म ऑस्कर जीत गई है.


वीडियो देखें: 2019 के गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड्स जीतने वाली 9 टीवी और वेब सीरीज

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