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RCEP डील न करने से भारत का क्या घाटा होगा?

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भारत रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) डील साइन नहीं कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी RCEP शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने 4 नवंबर को बैंकॉक पहुंचे थे. प्रधानमंत्री मोदी ने इसे ‘अपनी आत्मा की आवाज़’ पर लिया फ़ैसला बताया है. ये सम्मेलन और इसमें हो रही बातचीत गोपनीय थी. इसलिए मीडिया में सिर्फ अनुमान ही लगाए जा रहे थे.

5 नवंबर को सरकार की ओर से वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सभी शंका-आशंकाओं पर विराम लगा दिया. इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने RCEP में भारत के शामिल न होने के कारण गिनाए.

मोदी ने महात्मा गांधी का भी ज़िक्र किया. गांधी जी के जंतर और अपनी अंतरात्मा के कारण यह फैसला लेने की बात कही थी.
मोदी ने महात्मा गांधी का भी ज़िक्र किया. गांधी जी के जंतर और अपनी अंतरात्मा के कारण यह फैसला लेने की बात कही थी.

कुछ वक्त पहले ख़बर आई थी कि प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहाकार समिति के सदस्य रहे सुरजीत भल्ला की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय सलाहाकार समूह बना है. इस समूह ने सलाह दी थी कि भारत RCEP में शामिल हो.

अब बड़ा सवाल ये कि आख़िर सरकार ने इस उच्च स्तरीय सलाहाकार समूह की सिफारिशों के खिलाफ फैसला क्यों लिया? क्या नरेंद्र मोदी सरकार ने विपक्ष और किसान-मज़दूर संगठनों की मांग मानी? या फिर आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार (फ्री ट्रेड) के ख़राब अनुभव (ऐसे बयान आए हैं सरकार की ओर से) की वजह से भारत RCEP में शामिल नहीं हुआ? इस दावों पर जानकारों की राय बंटी हुई है.

16वें आसियान-इंडिया सम्मिट में प्रधानमंत्री मोदी.
16वें आसियान-इंडिया सम्मिट में प्रधानमंत्री मोदी.

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक, RCEP ट्रेड डील में रखे गए 70 विषयों में से 50 पर भारत सरकार को आपत्ति थी. भारत ने इन सब मुद्दों पर चर्चा की. लेकिन आखिर में कुछ ऐसे मुद्दे रह गए, जिनपर भारत और बाकी 15 देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई. इसके बाद भारत ने RCEP में न शामिल होने का फैसला किया. जिन बड़े मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई वो हैं-

1. भारत के व्यापारिक घाटे को संतुलित करना
2. विदेशी आयात से भारतीय उद्योगों को सुरक्षा दी जाए
3. नॉन-टैरिफ बैरियर से छद्म व्यापार रुके
4. भारत के गुड्स और सर्विस सेक्टर के लिए बड़ा बाज़ार मिले
5.RCEP देशों में एक जैसे व्यापारिक शुल्क हो
6. डेयरी और खेती को RCEP से अलग रखा जाए

क्या व्यापारिक घाटा डील से हटने की वाजिब वजह है?

भारत का RCEP के बाकी 15 देशों के साथ क़रीब 105 बिलियन डॉलर का व्यापारिक घाटा है. 2014 में मोदी सरकार बनने तक ये 78 बिलियन डॉलर था. भारत ने आसियान के अलावा जापान, साउथ कोरिया, मलेशिया के साथ FTA किए हैं. इन सभी देशों के साथ भारत का व्यापारिक घाटा है. हालांकि, आर्थिक मामलों के जानकार और इंडिया टुडे हिंदी के संपादक अंशुमान तिवारी सरकार के डील से पीछे हटने के फैसले को अच्छा नहीं बताते हैं. खासतौर पर व्यापारिक घाटे को वजह बताकर. उनका मानना है,

RCEP डील के ब्यौरे अभी नहीं आए हैं. 2017-18 में सरकार ने अपने इकोनॉमिक सर्वे में बताया था कि भारत-आसियान के बीच मुक्त व्यापार समझौता अब तक भारत के सबसे सफल समझौतों में से एक है. पहले किसी भी सौदे को नापने का पैमान आयात-निर्यात के कुल जमा के आधार पर होता था. लेकिन अब दुनिया में नई व्यवस्था है जहां आयात-निर्यात के अलावा निवेश को भी तरजीह दी जाती है.

WTO के आ जाने के बाद से दुनिया ने माना कि सिर्फ सामान का लेन-देन ही व्यापार नहीं है. पूंजी की आवाजाही भी व्यापार है. तो ये कहना कि भारत आसियान के साथ व्यापार करके घाटे में है, ये एक तरफा नज़रिया होगा. नई पूंजी आने से रोज़गार बनते हैं. सवाल ये भी है कि क्या भारत आसियान देशों की कंपनियों को देश में बुलाना चाहता है या नहीं? व्यापारिक घाटा एक नज़रिया है. इसे पाटने के लिए और तरीके खोजने होंगे. अगर सरकार अब ये कहती है कि आसियान के साथ FTA करना भूल थी तो सरकार अपनी ही बात काट रही है. हमें अगर 8-9 फीसदी की ग्रोथ हासिल करनी है तो हमें निवेश की ज़रूरत है.

भारत का आसियान देशों के साथ व्यापारिक घाटा. स्रोत- PHD चैंबर ऑफ कॉमर्स.
भारत का आसियान देशों के साथ व्यापारिक घाटा. स्रोत- PHD रिसर्च ब्यूरो.

हालांकि, क्रिसिल में अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा सरकार के फैसले से सहमत हैं. वो इसके पीछे राजनीतिक कारण भी देखते हैं. बीबीसी से बातचीत में सुनील सिन्हा ने कहा,

“इस तरह के समझौतों में सबसे महत्वपूर्ण बात होती है कि किसी भी देश के लिए इस तरह के सहयोग में क्या फायदा है. लेकिन RCEP का देश में विरोध हो रहा था और कहा जा रहा था कि ये भारत के लिए ज़्यादा फायदेमंद नहीं है. मुझे लगता है कि जब इस पर बातचीत हुई तो भारत के अधिकारियों को ऐसा लगा कि भारत को जितना फायदा होगा, उसे कहीं अधिक नुकसान हो जाएगा. इस वजह से भारत ने इस समझौते पर आगे बढ़ने से मना कर दिया होगा.”

ICICI सिक्योरिटीज़ में अर्थशास्त्री अनाघा देवधर का मानना है कि

RCEP में शामिल न होने से भारत का प्रभाव क्षेत्र कम हो जाएगा. भारत एशिया के बाकी देशों में बेहतर दाम पर व्यापार करने के मौके गंवा रहा है. हालांकि इससे घरेलू इंडस्ट्री को गलाकाट प्रतिस्पर्धा और चीन की डंपिंग से सुरक्षा मिलेगी. 

भारत सरकार ने छद्म व्यापार को भी बड़ी चिंता माना है

छद्म व्यापार भारत की बड़ी चिंता है. छद्म व्यापार में किसी दूसरे देश के प्रॉडक्ट्स तीसरे देश के रास्ते भारत पहुंच सकते हैं. जिससे भारत के हितों का नुकसान हो सकता है. अंशुमान के मुताबिक,

अगर भारत RCEP की बातचीत में बना रहता तो ये मामला हल हो सकता था. भारत अब इस बातचीत से बाहर आ गया है , वो भी प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद (क्योंकि ये शीर्ष स्तर है), तो भारत को अब नए सिरे से बातचीत शुरू करनी होगी. इसमें समय लग सकता है. भारत बड़ा बाज़ार है. भारत को तगड़ा मोलभाव करना होगा और अपनी शर्तें मंगवानी होंगी. ट्रेड डील से बाहर होना जाना, अलग-थलग रहना हल नहीं है.

प्रधानमंत्री मोदी के साथ चीन के प्रधानमंत्री ली क्यांग के साथ.
प्रधानमंत्री मोदी के साथ चीन के प्रधानमंत्री ली क्यांग.

चीन अपना माल भारत में डंप कर देगा!

चीन दुनिया का मेनुफेक्चरिंग हब है. चीन के साथ लगभग हर बड़े देश का व्यापारिक घाटा है. अंशुमान तिवारी के मुताबिक,

भारत में चीन से वही सामान आता है जो या तो यहां बनता नहीं या फिर स्थानीय उत्पाद के मुकाबले सस्ता है. हमें अपने बाज़ार के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ानी होगी. भारत चीन को तमाम तरह की रियायतें देता आया है. उसे ठीक करने की ज़रूरत है. चीन की डंपिंग का डर एक तरफ है, लेकिन बाज़ार को प्रतिस्पर्धी बनाने की ज़रूरतें दूसरी तरफ है. इन दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा. दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक संगठन में शामिल न होना भी भारत के हित में नहीं है.

अकेले चीन के साथ ही भारत का व्यापारिक घाटा 63 बिलियन डॉलर के क़रीब है.
अकेले चीन के साथ ही भारत का व्यापारिक घाटा 63 बिलियन डॉलर के क़रीब है.

राजनीति का कितना असर रहा इस फैसले पर?

भारत के उद्योग बड़े पैमाने पर चाहते थे कि भारत RCEP से बाहर रहे. अंशुमान के मुताबिक,

‘घरेलू इंडस्ट्री संरक्षण चाहती है. वो हमेशा प्रतिस्पर्धा से डरती है. भारत की कई कंपनियां (टेक्सटाइल, मेटल, डेयरी सेक्टर) चाह रही थीं कि भारत RCEP में शामिल न हो. अगर भारत शामिल नहीं होगा तो इसके असर 2 साल में दिखने लगेंगे. ये बड़ा मौका था जहां कांग्रेस ने इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने की कोशिश की. भाजपा का समर्थन करने वाला स्वदेशी जागरण मंच भी इसका विरोध कर रहा था. कांग्रेस के लिए ये अच्छा मौका था. शायद सरकार दवाब में आ गई और इस समझौते से हट गई.’

नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया भी RCEP में शामिल होने को बेहतर मानते हैं. RCEP जॉइन न करने के फैसले के बाद उन्होंने कहा,

सभी दरवाज़े बंद नहीं हुए हैं. न ही भारत सरकार की ओर से और न ही RCEP के बाकी देशों की ओर से. आने वाले वक्त में भारत को मोलभाव करना चाहिए. कुछ अपनी मौजूदा मांगें छोड़नी चाहिए और कुछ बेहतर डील हासिल करनी चाहिए.

केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल.
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल.

अंशुमान तिवारी एक कूटनीतिक ग़लती की ओर भी इशारा कर रहे हैं. उनका मानना है कि भारत की तरफ से प्रधानमंत्री के स्तर पर इसकी घोषणा नहीं होनी चाहिए. जो भी समस्याएं थीं, वो निचले स्तर पर ही ख़त्म हो जानी चाहिए थीं. लेकिन अब भी देर नहीं हुई है. अगर सरकार समझौता करती है तो भारत फ्री ट्रेड का फायदा उठा सकता है.


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