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क्या है 130 साल पुरानी लाइब्रेरी का इतिहास, जिसका एक हिस्सा नीतीश सरकार गिराने की तैयारी में है?

महात्मा गांधी ने एक लाइब्रेरी की तारीफ कई बार और कई लोगों से सुनी थी. तो एक बार उन्होने वहां जाने का मन बनाया. साल था 1925 का. गांधीजी ने इस लाइब्रेरी का दौरा किया. इसके बारे में गांधीजी लिखते हैं.

“मैंने इस सुंदर लाइब्रेरी के बारे में 9 साल पहले सुना था और तभी से मेरे मन में यहां जाने की इच्छा थी. मुझे दुर्लभ किताबों के इतने बड़े संग्रह की जांच परख करके बड़ा आनंद आया.”

जिस आदमी ने इस लाइब्रेरी को बनवाया था. उनकी भी महात्मा गांधी ने बहुत तारीफ की. आज हम आपको इस लाइब्रेरी और इसे बनाने वाले आदमी की कहानी सुनाएंगे. और बताएंगे कि यह लाइब्रेरी इस समय चर्चा में क्यों है?

किताबें. किसी की सबसे अच्छी दोस्त.और किसी-किसी को डंडे से मारने पर भी किताबें पढ़ने का मन नहीं करता. आज बात करेंगे पहली कैटेगरी वाले आदमी की. मतलब जिसके लिए किताबें सब कुछ हैं, दूसरी कैटेगरी वालों की बातें फिर कभी. आज हम जिस आदमी की बात करने जा रहे हैं, वह किताबों का बड़ा शौकीन था. लेकिन उसने बस जिंदगी भर किताबें ही नहीं पढ़ीं, बल्कि कुछ ऐसा भी कर दिया, जिससे आने वाले कई दशकों तक उसकी तरह के और भी किताबी कीड़ों के लिए किताबें पढ़ने में कोई दिक्कत ना हो. इसलिए अगर आप भी किताबों के शौकीन हैं, तो आपको इस आदमी के बारे में और उस लाइब्रेरी के बारे में भी जरूर जानना चाहिए. और अगर किताबों के शौकीन नहीं भी हैं, तो भी जान लीजिए, पैसा थोड़े ना लग रहा है.

विरासत में मिली किताबों की दुनिया

चलिए सस्पेंस खत्म करते हैं, हम जिस आदमी की बात कर रहे हैं वह आदमी थे, बिहार के खुदा बख्श खान. खुदा बख्श खान 2 अगस्त 1842 को सिवान जिले के ‘उखाई’ गांव में पैदा हुए थे. इनके पूर्वज मुगल बादशाह के यहां काम करते थे. उनका काम था किताबों का रखरखाव करना और मुगल साम्राज्य से जुड़े दस्तावेजों को लिखना. उनके पिता पटना में नामी वकील थे. और वो हाथों से लिखी हुई किताबों, जिन्हें पांडुलिपि(Manuscript) कहते हैं, उसके बड़े शौकीन थे. वह जितना कमाते थे, उसका ज्यादातर ऐसी किताबें खरीदने में ही खर्च कर देते थे. इनमें से कुछ ऐसी किताबें बड़ी दुर्लभ थीं. तो इसका मतलब खुदा बख्श को किताबों की दुनिया विरासत में मिली थी. खुदा बख्श के पिता उनको ‘उखाई’ से पटना लेकर आए. उन्होंने अपनी मैट्रिक की परीक्षा शानदार अंको से पास की. उच्च शिक्षा के लिए वह कोलकाता चले गए. लेकिन कोलकाता का माहौल उन्हें सूट नहीं किया. और वह बीमार होने लगे. इसी वजह से वे वापस पटना लौट आए. फिर उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से लॉ की पढ़ाई की. और धीरे-धीरे वे अपने पिता की तरह जाने-माने वकील बन गये. 1876 में खुदा बख्श के पिता का देहांत हो गया. लेकिन उनके पिता की एक दिली इच्छा थी कि उनका बेटा एक पब्लिक लाइब्रेरी बनाए. क्योंकि उनके पिता चाहते थे कि जिंदगी भर उन्होंने इतनी अच्छी-अच्छी किताबें इकट्ठा की हैं. उसका फायदा और लोगों को भी मिले. कुछ-कुछ ‘सब पढ़े, सब बढ़े’ जैसा.

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खुदा बख्श के पिता किताबों के बड़े शौकीन थे (प्रतीकात्मक तस्वीर- फोटो:Pixabay)

1877 में खुदा बख्श ‘पटना म्युनिसिपल कॉपोरेशन’  के पहले वाइस चेयरमैन बने. उन्होंने शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसी वजह से उन्हें ‘खान बहादुर’ की उपाधि दी गई. अपने पिता की इच्छा के अनुसार उन्होंने पटना में एक शानदार लाइब्रेरी बनवाई. जिसकी चर्चा आगे हम करेंगे. 1895 में हैदराबाद के निजाम के हाई कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश बने. 3 सालों तक वहां काम करने के बाद वह फिर पटना वापस लौट आए. लेकिन पटना आने के कुछ ही महीनों बाद वे लकवे से परेशान हो गए. और तब से वे अपना ज्यादातर समय लाइब्रेरी में ही बिताते थे. 1908 में उनकी मौत हो गई. लेकिन ये ऐसा काम करके गए थे, जो लोगों के दिमाग रूपी किताब के पन्ने पर ये अब भी लिखा हैं और हमेशा रहेंगे भी.

कहानी उस जानी-मानी लाइब्रेरी की

अपने पिता की दिली इच्छा के अनुसार खुदा बख्श ने एक सार्वजनिक लाइब्रेरी बनाने का निश्चय किया. जिससे की आम जनता भी आसानी से उन अच्छी-अच्छी किताबों को पढ़ सकें, जो उनके पिता ने इकट्ठा की हैं. उन्होंने इसे एक मिशन बना लिया. खुदा बख्श खान ने खूब प्रयास किए, कई अच्छी-अच्छी किताबें इकट्ठा की. इनमें से कई किताबें बहुत दुर्लभ और हाथ से लिखी हुई थीं. उन्होंने अरब देशों के शिक्षा केंद्रों से भी ढेर सारी ‘हाथ से लिखी हुई किताबों’ को इकट्ठा किया. अब अगला काम था किताबों को रखना और उसके लिए चाहिए थी एक बिल्डिंग. खुदा बख्श ने दो मंजिला बिल्डिंग बनाने का विचार बनाया. काम शुरू हुआ. नींव रखी गई. और धीरे-धीरे करके 1888 तक यह नई नवेली इमारत बनकर तैयार हो गई. अब खुदा बख्श ने अपने किताबों के खजाने को इस नई नवेली इमारत में लाना शुरू किया. और काम पूरा हो गया. 29 अक्टूबर 1891 को यह लाइब्रेरी आम लोगों के लिए खोल दी गई.

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खुदा बख्श खान (फोटो:kblibrary.bih.nic.in)

इस लाइब्रेरी में अरबी, फारसी, तुर्की आदि भाषाओं में हाथों से लिखी हुई लगभग 4000 दुर्लभ किताबें थी. इसके अलावा अरबी, फारसी और अंग्रेजी भाषाओं में कई प्रिंटेड किताबें भी थीं. बाद में इसका नाम ‘ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी’ रखा गया. लेकिन खुदा बख्श के सम्मान में इसका नाम बाद में बदलकर ‘खुदा बख्श ओरिएंटल पब्लिक लाइब्रेरी’ कर दिया गया. जिसको आम बोलचाल में लोग ‘खुदा बख्श लाइब्रेरी’ कहते हैं. 1891 से ही यह लाइब्रेरी लोगों के लिए एक आकर्षण का केंद्र रही है. 26 दिसंबर 1969 को इस लाइब्रेरी को ‘राष्ट्रीय महत्व का संस्थान’ का दर्जा दे दिया गया. यह एक स्वायत्त संस्था है. जो भारत सरकार के ‘संस्कृति मंत्रालय’ के अंतर्गत काम करती है. आज भी विद्वानों के लिए यह लाइब्रेरी किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है. महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, अब्दुल कलाम जैसी कई महान हस्तियों ने इस लाइब्रेरी का दौरा किया है.

विदेशों में भी कायम है जलवा

इस लाइब्रेरी में एक से बढ़कर एक किताबें हैं.उदाहरण के तौर पर देखें, तो एक किताब है जिसका नाम है- तारीख-ए-खानदान-ए-तिमूरियाह. जो कि हाथ से लिखी हुई किताब है. आपको बता दें कि इस किताब की दुनिया में केवल एक ही कॉपी है और वो इस लाइब्रेरी में है. यह किताब मुगल बादशाहों से संबंधित है, इसमें शानदार चित्रकारी की गई है. जोकि  मुगल काल में होने वाली बेजोड़ चित्रकारी का एक नमूना है. इस लाइब्रेरी में रूमी की किताबें, फिरदौसी का शाहनामा, दीवान-ए-हाफिज, जिसमें जहांगीर की दस्तखत है, जैसी कई किताबें हैं. यहां रखी गई कई किताबों का जिक्र तो यूनेस्को की ‘मेमोरी ऑफ वर्ल्ड रजिस्टर’ में भी है. इस समय इस लाइब्रेरी में फारसी, अरबी,उर्दू, तुर्की आदि भाषाओं में हजारों किताबें हैं. यहां विदेशों से भी छात्र, अध्यापक, इतिहासकार आदि लोग आते हैं. यहां आने वाले लोग ज्यादातर पाकिस्तान, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, उज़्बेकिस्तान आदि देशों से होते हैं. लेकिन अब चीन, अमेरिका और यूरोपीय देशों से आने वाले लोगों की संख्या में भी इजाफा हुआ है. यहां पर आकर पढ़ने वाले विदेशी लोगों में ईरान के शीर्ष सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं.

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इस लाइब्रेरी में विदेशों से भी लोग किताबें पढ़ने आते हैं(फोटो:kblibrary.bih.nic.in)

लाइब्रेरी इस समय सुर्खियों में क्यों है?

नीतीश कुमार सरकार की एक प्रस्तावित योजना के अनुसार पटना में कारगिल चौक से पीएमसीएच होते हुए NIT मोड़ तक एक एलिवेटेड कॉरिडोर बनेगा. जिसमें खुदा बख्श लाइब्रेरी का भी कुछ हिस्सा जाएगा. इसमें कर्जन रीडिंग रूम और इसका फ्रंट गार्डन शामिल है, आपको बता दें कि कर्जन रीडिंग रूम का नाम ब्रिटिश वायसराय लार्ड कर्जन के नाम पर रखा गया है. जिन्होंने 1903 में इस लाइब्रेरी का दौरा किया था. बिहार सरकार की योजना का साहित्यकारों, इतिहासकारों, बुद्धिजीवियों और तमाम किताब-प्रेमियों ने विरोध करना शुरू कर दिया हैं. शाइस्ता बेदार, जोकि इस लाइब्रेरी की डायरेक्टर हैं, उन्होंने भी इस प्रस्ताव का पुरजोर विरोध किया है. उन्होंने बताया कि इस लाइब्रेरी में एक से बढ़कर एक किताबें हैं. उदाहरण के तौर पर, लोगों को यहां सबसे पुरानी हिंदी डिक्शनरी भी मिल सकती है. जोकि मिर्जा खान बिन फखरुद्दीन मोहम्मद द्वारा लिखी गई थी. इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज(INTACH) नामक एक NGO ने भी सरकार के इस प्रस्ताव का विरोध किया है. INTACH ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अपील की है कि वो खुदा बख्श लाइब्रेरी के एक हिस्से को गिराने का प्रस्ताव खारिज कर दें. INTACH ने यह भी कहा है की अगर सरकार से बात नहीं बनी, तो वह कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं.


ये स्टोरी हमारे साथ इंटर्नशिप कर रहे नीलोत्पल ने लिखी है.


वीडियो- मजदूर की बनाई लाइब्रेरी में आग लगने के बाद लोगों ने बढ़ाए मदद के हाथ

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