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सड़क के मीम बनाकर मध्यप्रदेश की कांग्रेस सड़क पर ही रहेगी, विधानसभा नहीं पहुंचेगी

मधुर.
मधुर.

मधुर शर्मा मध्यप्रदेश से हैं. वही मध्यप्रदेश जहां मामा का राज है और ‘जहां की सड़कें अमरीका की सड़कों से अच्छी हैं’. विदिशा के छोटे से कस्बे बासौदा में रहने वाले मधुर ने कानून की पढ़ाई की है. कानून की किताबों से फुर्सत हो तो फेसबुक पर ‘मन की बात’ पोस्ट करते हैं. कविताएं भी लिखते हैं. सीएम शिवराज सिंह चौहान के सड़क वाले बयान के बाद बहुत छीछालेदर हुई. इस पर उन्होंने हमें कुछ लिख भेजा है जो यहां प्रस्तुतु है. आप भी अपने विचार, व्यंग्य, टिप्पणियां हमें  lallantopmail@gmail.com पर मेल कर सकते हैं. उपयुक्त हुईं तो प्रकाशित की जाएंगी.

 

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मेरी नज़रों में बहुत दिनों बाद एक अच्छा काम किया. मध्यप्रदेश की सड़कों की तुलना अमेरिका की सड़कों से कर दी. अब हम तो अमेरिका गए नहीं, जो गए हैं वहां की सड़कों पर चले हैं, वे ही ठीक से बता सकते हैं. पर अपने यहां के कांग्रेसी नेताओं ने यह मुद्दा भैराकर लपक लिया है. एक खराब रोड की फ़ोटो बार-बार सोशल मीडिया पर डाली जा रही है. इसे कभी कोई खण्डवा का बताता है, कभी कोई सिरोंज-बासौदा मार्ग बताता है, तो कभी कुछ और.

अब देखने वाली बात यह है कि एमपी भर की बदनामी का ज़िम्मा एक अकेली सड़क पर उसी तरह डाल दिया गया है, जैसे कांग्रेस के अखिल भारतीय खराब प्रदर्शन का ठीकरा राहुल गांधी पर फोड़ दिया जाता है. सड़क हो या राहुल गांधी असल माजरा ओवरलोड का ही है. यह तो हुई मज़ाक वाली बात. ऐसा नहीं है कि मध्यप्रदेश में सड़कें ख़राब नहीं हैं. पर ये भी सच है कि कांग्रेसी नेताओं ने खुद खराब सड़कों पर जाकर फ़ोटो खींचने की ज़हमत कभी नहीं उठाई. वैसे कोशिश करते भी, तो उन्हें ‘दिग्गीराज’ के मुकाबले थोड़ी ज़्यादा मेहनत करनी पड़ती. मध्यप्रदेश सड़कों के लिहाज़ से पहले की तुलना में काफी बेहतर हुआ है. यह मैं नहीं कह रहा हूं. यह वह लोग कहते हैं जो दिग्विजय सिंह के राज में भी मध्यप्रदेश आए हैं, घूमे हैं.

शिवराज के बयान के बाद अखबारों ने लगातार सड़कों से जुड़ी खबरें की थीं (फोटोःमधुर शर्मा)
शिवराज के बयान के बाद अखबारों ने लगातार सड़कों से जुड़ी खबरें की थीं (फोटोःमधुर शर्मा)

मैंने शुरू में कहा था कि मेरी नज़रों में शिवराज सिंह चौहान ने बहुत दिनों बाद कोई अच्छा काम किया है. अच्छा यूं कि बहुत दिनों बाद हमने मध्यप्रदेश में ‘विपक्ष’ नामक जीव की आवाज़ सुनी. लेकिन एक चकल्लस हो गई इस चक्कर में. कांग्रेस की टाइमिंग सही थी. चुनाव पहले मुख्यमंत्रियों के बयान इसी तरह लपकने चाहिए. लेकिन कांग्रेस एक अलिखित नियम को भूल गई. हम लूडो खेलते हुए कभी-कभी लगातार छह-छह आने पर एकाध चाल ‘भगवान को दे देते हैं’. ऐसा ही राजनीति में भी होता है. लेकिन कांग्रेस ने उस बयान को पकड़ लिया जिसे कायदे से उसे जाने देना चाहिए था.

इस सड़क वाली बयानबाज़ी से बेचारी कांग्रेस ने सड़क का वो मुद्दा उठा दिया जिसमें वो खुद सफा थी. अभी हाल ये हैं कि लोग सड़क के गड्ढे दिखा पा रहे हैं, ‘मेमे’ बना पा रहे हैं. लेकिन एक समय हालात ऐसे थे कि गड्ढों में ही सड़कें हुआ करती थीं. लेकिन तब ट्विटर नहीं था. :(

एक वक्त मधुर के कस्बे तक की सड़क ऐसी थी (फोटोःमधुर शर्मा)
एक वक्त मधुर के कस्बे तक की सड़क ऐसी थी (फोटोःमधुर शर्मा)

खैर, मैं अपने गांव की सड़क के बारे में बताता हूं. मेरा गांव है रसूलपुर. विदिशा जिले में पड़ता है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज यहीं से सांसद हैं. ज़िले में मेरा गांव जहां है, वहां विधानसभा लगती है गंजबासौदा. 1993 से लेकर 2003 तक जब 10 साल कांग्रेस का राज (दिग्गीराज) रहा, मैंने होश संभाल लिया था. तब मेरे गांव की सड़क ऐसी थी कि एक बार यदि कस्बे से गांव पहुंच गए तो इस तरफ से उस तरफ जाने की सोचने भर से रुह कंप जाया करती थी. लेकिन जैसे सबके दिन फिरते हैं, कांग्रेस के फिर गए. भाजपा के भी फिर गए. हमारी सड़क के भी फिर गए.

हमारे गांव की सड़क अब हमारी विधानसभा की सबसे अच्छी सड़क है. ये भारतीय जनता पार्टी के शासन काल में हुआ. इसलिए कांग्रेसियों की बात कुछ हज़म नहीं हो रही. क्योंकि यह तो वे भी जानते हैं (यदि ईमानदारी से कहें) कि भारतीय जनता पार्टी के राज में सड़कें कांग्रेस के राज से काफ़ी बेहतर हुई हैं.

मुझे तो डर है. कहीं शिवराज सिंह अमेरिका की लाइट से मध्यप्रदेश की लाइट की तुलना न कर दें. क्योंकि फिर कांग्रेस के नेता शिवराज को बिजली के मुद्दे पर घेरने की कोशिश करेंगे. और फिर मेरे जैसे किसी लड़के को (माने 90 के दशक में अवतरित हुए हर बच्चे को)अपना बचपन याद आ जाएगा. तब लाइट न के बराबर आती थी. खुले आसमान के नीचे सोते थे. जिन्हें औंधे मुंह सोने की आदत नहीं थी, वो पड़े-पड़े सारे तारामंडल रट डालते थे. लाइव डेमो में. कभी-कभी छतों पर मच्छरदानी लगाकर सोते थे, नीचे घर में चोरी हो जाती थी.

यू नो वॉट आई मीन (टम्बलर)

और बात यहीं खत्म नहीं होती. लाइट का आना भी उसके न आने जितनी ही बड़ी समस्या थी. क्योंकि लाइट आती भी थी, तो वोल्टेज महाराज पता नहीं कहां रह जाते थे. कैसेट वाले वीडियो गेम कई बार इस ख़राब वोल्टेज का शिकार हुए हैं. बच्चों की हाय से बुरा कुछ नहीं होता. इसलिए कांग्रेस को इन पुराने जख्मों को हरा नहीं करना चाहिए.

सड़क, बिजली, पानी में भारतीय जनता पार्टी हर लिहाज़ से कांग्रेस से बेहतर है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कांग्रेस वाले अपने दफ्तर बंद कर के वॉटर प्यूरिफायर बेचने निकल जाएं. छोड़ना बस इन तीन मुद्दों को है. पकड़ने के लिए बहुत कुछ है. मिसाल के लिए व्यापमं घोटाला. लेकिन कांग्रेस व्यापमं के मुद्दे पर मौन रहती है. मुखर होती भी है तो होमवर्क के आभाव में सिफ़र ही रहती है. संगठन के आभाव में कोई कवायद ज़मीन पर आ ही नहीं पाती. डम्फर कांड (ये टाइपो नहीं है; हम डम्पर को डम्फर ही कहते हैं ) को कांग्रेस ने हाथों से रेत की तरह सरका दिया. रेत से याद आया कि मध्यप्रदेश में नदियों से रेत रातों-रात गायब हो जाती है. बिना बिल्टी-रसीद. फिर महाराष्ट्र में प्रकट हो जाती है. ऐसा हमने सुन रखा है. अभी मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग में भी गड़बड़झाला हुआ. पर जन समस्याओं, घोटालों पर कांग्रेस में वो आक्रामकता नहीं दिखती जो भाजपा के विपक्ष में रहते समय दिखती थी.

मध्यप्रदेश सरकार ने हाल ही में हिन्दी सम्मेलन में 30 करोड़ रुपए खर्च किए
मध्यप्रदेश सरकार ने हाल ही में हिन्दी सम्मेलन में 30 करोड़ रुपए खर्च किए

व्यापमं की बात निकली थी, उसी पर लौटते हैं. व्यापमं को पन्ना के खींचेगे तो बनता है ‘व्यावसायिक परीक्षा मंडल.’ मध्यप्रदेश सरकार द्वारा गठित एक निकाय. स्व-वित्तपोषित और स्वायत्त (लोल). व्यापमं राज्य के शैक्षिक संस्थानों में और सरकारी नौकरियों में दाखिले-भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित करता था. फिर नतीजा घोषित करता था. शिवराज मामा के रहते इसमें घोटाला हुआ. इतना आपको मालूम है. उस से जुड़ी एक मज़ेदार बात बात बताता हूं. मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन हुआ था. विश्व हिंदी सम्मेलन नाम से. इसका बजट रखा गया 15 करोड़ का. समाचार पत्रों में छपी एक खबर के अनुसार ख़र्च हुए 30 करोड़. दोगुने रुपए खर्च करने में कोई दिक्कत नहीं.

दिक्कत इस बात में है कि हिंदी प्रेम के लिए 30 करोड़ फूंकने वाली भाजपा सरकार ने व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं) का नाम अंग्रेज़ी में कर दिया है – ‘प्रोफेशनल एग्ज़ामिनेशन बोर्ड’. ये हुआ विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित करने के तुरंत बाद. व्यापमं का नाम बदलने के पीछे अपने दाग धोने की सरकार की मंशा साफ नज़र आती है. मध्यप्रदेश सरकार ने हिंदी प्रेम और व्यापमं एक बाल्टी में भिगो के धो दिया. अब दोनों नज़र नहीं आ रहे.

हिंदी सम्मेलन के बाद व्यापमं का नाम अंग्रेज़ी में कर दिया गया
हिंदी सम्मेलन के बाद व्यापमं का नाम अंग्रेज़ी में कर दिया गया

विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस के लुंज-पुंज रवैये का खामियाज़ा सिर्फ उन छात्रों को नहीं भुगतना पड़ा है जो व्यापमं घोटाले के कारण अपनी योग्यता का झुनझुना बजा रहे हैं. राज्य सरकार को सारे सही-गलत कामों में वॉकओवर मिला हुआ है. कोई पूछने वाला नहीं है. मध्यप्रदेश में एक एक्टिव सरकार से ज़्यादा एक एक्टिव विपक्ष की ज़रूरत है आज. इसलिए कांग्रेस को चाहिए कि सही वक्त पर सही मुद्दे उठाए. सड़क के गड्ढों पर मेमे बनाते रहे तो कांग्रेस के नेता सड़क पर ही प्रचार करते रह जाएंगे, विधानसभा नहीं पहुंचेंगे कभी.


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