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मैंने मजदूरों को देखा है, इमारतों से गिरते हुए, शहतूत बन जाते हुए

himanshu singhयह लेख दी लल्लनटॉप के लिये हिमांशु सिंह ने लिखा है. हिमांशु दिल्ली में रहते हैं और सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और प्रतिष्ठित करेंट अफेयर्स टुडे पत्रिका में वरिष्ठ संपादक भी रह चुके हैं. समसामयिक मुद्दों के साथ-साथ विविध विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं. अभी हिमांशु ने लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों को लेकर लिखा है. आप भी पढ़िए.


इंसान किसी भी उम्र का हो, उसकी स्मृतियों में शहतूत का एक पेड़ ज़रूर रहता है. हमारी पहली दोस्ती, लड़ाई, गुटबाज़ी इसी के साए में हुई थी. पहले धोखे हमने यहीं खाए और दिए. हम सभी के जीवन की पहली बेशकीमती मासूम घटनाओं का गवाह होता है ये शहतूत.

देह में अगर स्वभावों की ग्रंथियां होतीं, तो बचपने की ग्रंथि शहतूत जैसी होती, और उससे हमारे मन में शहतूत का रस रिसता. पर सभी का बाल मन शहतूत हो, ये ज़रूरी नहीं है. कुछ के लिए बेर, तो कुछ के लिए जामुन और इमली ही उनका शहतूत हैं. हम सभी के अपने-अपने शहतूत होते हैं.

जब तक हम अपने मन की सुनते रहे, शहतूत, बेर, इमली, जामुन और न जाने कितने गुमनाम फल हमारे दिलों पर राज करते रहे. पर जिस दिन हमने सस्ते-मंहगे का पहला पाठ पढ़ा, हमने सेब और अनार में जबरिया स्वाद खोजना शुरू कर दिया. अपने पहले प्रेम को तिरस्कृत किया हमने.

यूं समझिए, गांव का बिरजू शहर आकर बृजेश बाबू हो गया. और अपनी राधा को छोड़ रुक्मणी को अपना लिया.

अब हमारे बचपन के साथी शहतूत और जामुन, शहर के डिवाइडर पर खड़े रह जाते हैं और हम उन्हें नजरंदाज कर के आगे बढ़ जाते हैं. अब हम लाट साहब हो गए हैं. जमीन पर पड़े शहतूत और जामुन कुचलते हुए आगे बढ़ जाना हमारी फितरत हो गई है. अहसान फ़रामोशी कोई हमसे सीखे. अपनी जड़ें काटना कोई हमसे सीखे.

शहतूत प्रतीक है उन सब लोगों और तबकों का भी, जिन्होंने हमें तो बड़ा कर दिया, पर हमें बड़ा करने में वो खुद खर्च हो गए. और जब उन्हें संभालने की बारी हमारी आई, तो बड़ी बेशर्मी से हमने मुंह मोड़ लिया. फिर ये चाहे हमारे समाज के बुजुर्ग हों या हमारा मज़दूर वर्ग. ठगा हमने सभी को है.

इस कोरोना महामारी के समय हमने पूरी बेशर्मी के साथ भूखे असहाय मजदूरों को बेसहारा छोड़ दिया. और उन्हें उन नगरों से बेदखल कर दिया जिसकी इमारतों की कंक्रीट में उनका पसीना मिला हुआ है.

खैर, बात शहतूत की हो रही थी, तो मैं भटकूंगा नहीं. मैं सबीर हका का ज़िक्र करूंगा जो ईरान के कवि और पेशे से मजदूर हैं. ये लेख जितना शहतूत के हिस्से में है, उतना ही मजदूरों का भी है. दोनों एक ही तो हैं!

तो पढ़िए सबीर हका की कविता ‘शहतूत’

शहतूत

क्‍या आपने कभी शहतूत देखा है,
जहां गिरता है, उतनी ज़मीन पर
उसके लाल रस का धब्‍बा पड़ जाता है.

गिरने से ज़्यादा
पीड़ादायी कुछ नहीं.

मैंने कितने मज़दूरों को देखा है
इमारतों से गिरते हुए,
गिरकर शहतूत बन जाते हुए.


विडियो- कोरोना वायरस महामारी के दौरान पलायन करते मजदूरों की ताकतवर तस्वीरें

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