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ऑनलाइन मंगाओ तो माचिस भी टीवी वाले बक्से में आती है, ये मामला क्या है बॉस?

रियलिटी शोज़ में जब कोई छोटा बच्चा धांसू परफॉर्मेंस देता है तो जज उस बच्चे के लिए कहते हैं, ‘छोटा पैकेट बड़ा धमाका. तू मुंबई आ रहा है.’ अब मुंबई आने का तो पता नहीं, पर मुहावरे का मतलब ये कि कम उम्र और हल्की सेहत वाले बच्चे ने ग़दर परफॉर्म कर दिया. लेकिन ऑनलाइन शॉपिंग कराने वाले कभी-कभी इसका जस्ट अपोज़िट कर गुजरते हैं. क्या कर गुजरते हैं, ये मेरी आपबीती सुनकर आपको पता चल जाएगा.

तो, एक बार मैंने ऑनलाइन ‘नेल-कटर’ का आर्डर किया. डिलिवरी वाले भाईसाब आए और घर की घंटी बजाई. मेरा नाम लिया. बोले, ‘आपका पार्सल आया है.’ हमने कहा लाइए. भाईसाब ने हमें एक बड़ा सा चौकोर डिब्बा थमा दिया. हमने सोचा- ‘मंगाया था नेल-कटर, फ़ोन भेज दिया क्या?’

मन ही मन खुश तो हुए, लेकिन फ़ेक ऑनेस्टी वाले फेस के साथ हमने उनसे कहा, ‘भाई नेल-कटर मंगवाया था, ये क्या है?’ उन्ने इनवॉइस देखी. मुस्कुराए और मेरे साइन लेकर चले गए. जाते-जाते बोले, ‘ख़ुद ही खोलकर देख लीजिए.’

हमने ख़ुशी-ख़ुशी डिब्बा खोलना शुरू किया. इतनी ख़ुशी कि खोलना नहीं फाड़ना समझ लीजिए. भूरा वाला बॉक्स खोला तो अन्दर कागज़ भरा हुआ था, वो भी इतना कि सिलवटें हटाकर अगर बिछा लें, तो चटाई बन जाए. या दस-पांच लोग आराम से बैठकर मूंगफली रख कर खा लें.

डिलीवरी बॉय (फोटो सोर्स- आज तक).
डिलीवरी बॉय (फोटो सोर्स- आज तक)

और लास्ट में निकला वही जो हमने ऑर्डर किया था, यानी एक अदना सा नेल-कटर. और तब ‘छोटा पैकेट बड़ा धमाका’ वाले मुहावरे का विपरीतार्थी मुहावरा तपाक से निकल पड़ा- खोदा पहाड़ निकली चुहिया.

हालांकि उस डिब्बे में नेल कटर, बबल रैप और ब्राउन पेपर के अलावा एक बड़ी चीज़ ज़रूर थी. उसमें था एक सवाल. कि ऑनलाइन सामान बेचने वाले आख़िर ऐसा करते क्यूं हैं? क्या इसलिए कि हमें जता सकें कि उनके पास दूसरे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से ज्यादा गत्ता-कागज़ है? या इसलिए कि वो ज्यादा बड़ी पैकिंग में छोटे आइटम भेजकर हमसे डिलिवरी फ़ीस ज्यादा चार्ज कर सकें? या इसलिए कि छोटे डिब्बे चुक गए थे जो नेल-कटर, मोबाइल वाले डिब्बे में भेज दिया? वैसे ये वाकया हमारे अकेले के साथ नहीं हुआ है, भुक्तभोगी और भी हैं. जैसे ये वाली प्रोडक्ट अनबॉक्सिंग तो वाकई हमारे मुहावरे पर ‘हेंस प्रूव्ड’ का ठप्पा लगाती है.

तो, अपने और इन अभी कंफ्यूज़्ड लोगों की मानसिक शान्ति के लिए हमने थोड़ा रिसर्च किया और लेकर आए ये ABM, बोले तो आसान भाषा में.

अच्छा रिसर्च आपके साथ शेयर करने से पहले एक आवश्यक चीज़ बता दें, कि क्या ऐमज़ॉन क्या फ्लिपकार्ट या क्या मिंतरा, सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. मतलब ये अनुभव आपको ऐमज़ॉन के साथ ही हो ऐसा नहीं है. लेकिन सबसे बड़ा और इंटरनेशनल ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल होने के चलते हमें ज़्यादातर कंटेट ऐमज़ॉन से ही जुड़ा मिला. ख़ासतौर पर इंटरनेशनल और वेल रिसर्च्ड कंटेंट.

ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफ़ॉर्म एमजॉन और फ्लिपकार्ट. एमजॉन जहां दुनिया का सबसे बड़ा शॉपिंग प्लेटफॉर्म है वहीं फ़्लिपकार्ट इंडिया बेस्ड सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है (तस्वीर- इंडिया टुडे)
ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफ़ॉर्म ऐमजॉन और फ्लिपकार्ट. ऐमजॉन जहां दुनिया का सबसे बड़ा शॉपिंग प्लेटफॉर्म है वहीं फ़्लिपकार्ट इंडिया बेस्ड सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म है (तस्वीर- इंडिया टुडे)

#ऑनलाइन शॉपिंग बिज़नेसेज़ का पैकेजिंग सॉफ्टवेयर सिस्टम-

एक ट्विटर यूजर एलेग्जेंडर सेविन कहते हैं कि ऐमजॉन एक कॉम्प्लिकेटेड सॉफ्टवेयर का यूज़ करता है. किसलिए? ये तय करने के लिए कि जिस ट्रक में डिलिवरी के लिए प्रोडक्ट्स ले जाए जा रहे हैं, उसमें और क्या-क्या है. माने अगर हमने नेल-कटर मंगवाया है तो वो जिस ट्रक में पैक करके ऐमजॉन के वेयरहाउस से निकलेगा, उसमें और किस-किस साइज़ के पैकेट हैं.

टेट्रिस एक बड़ा फ़ेमस वीडियो गेम है. खेला होगा आप लोगों ने. उसमें ऊपर से अलग-अलग साइज़ और शेप के ब्लॉक्स आते थे और उन्हें नीचे सेट करना होता था. लाइन पूरी हो गयी तो गायब हो जाती थी और अगर आपने ब्लॉक्स आड़े-तिरछे लगाकर मोबाइल स्क्रीन ऊपर तक भर दी तो गेम ओवर.

Simplepost नाम की एक वेबसाइट के मुताबिक़ ऐमजॉन का सॉफ्टवेयर ट्रक में रखे अलग-अलग प्रोडक्ट्स के बॉक्सेज़ के साथ टेट्रिस जैसा ही कुछ खेला करता है.

एमजॉन डिलीवरी ट्रक (फोटो रिप्रजेंटेशन - आज तक)
ऐमजॉन डिलीवरी ट्रक (फोटो रिप्रजेंटेशन – आज तक)

इस लॉजिक के हिसाब से मान लीजिए मेरा नेल-कटर या आपके इयर-बड्स की डिबिया भले ही रत्ती भर जगह में आ जाएं लेकिन उन्हें पैक ऐसे डिब्बे में किया जाएगा जो डिब्बों की लाइन को ठसाठस भर दे. अब ट्रक भले ही स्पीड ब्रेकर्स पर हिचकोले खाए, अन्दर के डिब्बों में आपसी भिड़ंत नहीं होगी. माने डिब्बे टस-से-मस नहीं होंगे. और न आप शिकायत करेंगे कि हमने आई-फ़ोन की जो टच-स्क्रीन मंगवाई थी, वो टूटी हुई आई.

ऐमज़ॉन भी कहता है कि हम ट्रक में डिब्बे पैक करते वक़्त साइज़ की डिसिजन मेकिंग इसी हिसाब से करते हैं कि कस्टमर को डैमेज प्रोडक्ट न मिले. हालांकि 2016 से ऐमज़ॉन एक नए कंप्यूटर सिस्टम का इस्तेमाल कर रहा है ताकि कस्टमर्स को छोटे प्रोडक्ट्स के लिए बड़े डाइमेंशन्स का डिब्बा न भेजा जाए.

#छोटे डिब्बे गोदाम में खो जाते थे

QUORA पर इसी सवाल के जवाब में, कि ऐमजॉन लगातार बड़े डिब्बों का इस्तेमाल क्यूं कर रहा है, ऑगस्टस स्मिथ (Augustus Smith) बड़ा इंट्रेस्टिंग जवाब देते हैं. वो पहले ऐमजॉन में पैकिंग डिपार्टमेंट में ही काम कर चुके हैं, और अब डेटा एनालिस्ट का काम करते हैं. कहते हैं,

जिस एल्गोरिदम के हिसाब से ऐमजॉन में प्रोडक्ट्स की पैकिंग की जाती थी, कभी-कभी उसके इंस्ट्रक्शन छोटे साइज़ के प्रोडक्ट्स को बड़े डिब्बों में पैक करने के होते थे, और उन डिब्बों में  लकड़ी के छिलके, कागज़ वगैरह भरने होते थे. ये वेस्टेज जैसा लग सकता है, बट इट मेक सेंस. छोटे बॉक्सेज़ कई बार खो जाते थे, इसलिए बड़े साइज़ के डिब्बों का इस्तेमाल किया जाता था.

आगे ऑगस्टस बताते हैं कि अल्गोरिदम आपकी पैकिंग परफॉर्मेंस को भी मेज़र करता था, माने मापता था. पैकेजिंग के काम की स्पीड कम हुई तो सज़ा मिलती थी, काम करते-करते पसीना आ जाता था, वगैरह-वगैरह. 

#रोबोट पर चलने वाली अलमारियों की गलती

तो, अब तक हमें नेल-कटर को बड़े डिब्बे में पैक करने की मोटा-माटी दो वजहें मिल गईं.

# एक कि छोटे वेयरहाउस में डिब्बे खो जाते थे.

# और दूसरा कि जिस ट्रक में प्रोडक्ट रख के भेजे जाते थे, उसमें डिब्बे ऐसी यूनिफॉर्मिटी में रहें कि हिले-डुले और टकराएं न.

पर हमने थोड़ी और मेहनत की, और पता चला कि वेयरहाउसेज़ में पैकिंग की प्रक्रिया के दौरान भी ऐसा कुछ होता है जिसका लेना-देना छोटे प्रोडक्ट्स की बड़े डिब्बों में पैकिंग से हो सकता था.

Indiatimes की एक स्टोरी के मुताबिक़, गोदामों में प्रोडक्ट्स काफ़ी भारी-भरकम अलमारियों में रखे होते हैं, जिनपर बाकायदा प्रोडक्ट्स की कैटेगरी की चिप्पियां लगी होती हैं. कुछ साल पहले तक इन अलमारियों से सामान को निकालने के लिए वर्कर्स को चल कर जाना होता था. लेकिन अब ये अलमारियां ख़ुद एक रोबोट ड्रिवेन सिस्टम पर चल कर वर्कर्स तक आती हैं. और इस पूरे कंप्यूटर ऑपरेटेड सिस्टम को पता रहता है कि कौन से प्रोडक्ट के लिए किस साइज़ का डिब्बा और चिपकाने के लिए कितना टेप चाहिए, लेकिन कई बार इस सिस्टम से मिस्टेक भी हो जाती है.

इन्हीं रोलर वाली मशीन पर प्रोडक्ट्स के बॉक्स चलकर वर्कर्स तक आते हैं (फोटो साभार - बिज़नेस टुडे).
इन्हीं रोलर वाली मशीनों पर प्रोडक्ट्स के बॉक्स चल कर वर्कर्स तक आते हैं (फोटो साभार – बिज़नेस टुडे)

यहां एक और ट्विटर यूजर Daniel Bevis, जो कि वेयरहाउसेज़ में पैकिंग का काम कर चुके हैं, कहते हैं कि सॉफ्टवेयर सिस्टम जैसा कुछ नहीं है बल्कि होता ये है कि कई बार पैकिंग करने वाले लोग ही वो डिब्बा उठा लेते हैं जो सबसे पास होता है, उसका साइज़ वगैरह बिना सोचे.

#डिब्बों का वज़न भी मैटर करता है-

हालांकि मामला सिर्फ साइज़ का नहीं है. इन्वेंटरी सिस्टम, पैक किये जाने वाले बॉक्सेज़ का वज़न भी देखता है. वरना हेरा-फेरी भी हो सकती है. अगर किसी छोटे प्रोडक्ट के लिए ऑटोमैटिकली कोई बड़ा डिब्बा चूज़ कर ही लिया गया है तो कोई वर्कर उसे मैन्युअली ठीक भी करना चाहे तो नहीं कर सकता. माने अगर बड़ा डिब्बा हटाकर छोटा डिब्बा रख दें तो भी काम नहीं बनेगा, बल्कि ऐसा करने पर पूरे कार्गो का वज़न बदल जाएगा. क्यूंकि पहले अलॉट किये गये डिब्बे का वज़न अलग था, और इस छोटे वाले का वज़न अलग.

# पीछे से ही ऐसा आया है-

तो लुब्ब-ए-लुबाब ये कि मैन्युअल फॉल्ट से लेकर तकनीकी गड़बड़ी तक सब संभव है, जिसके चलते नेल-कटर की अनबॉक्सिंग ने हमें ख़ुशी का झूठा एहसास दिलाया था.

अब अनबॉक्सिंग के बाद बचे डिब्बे से आप बच्चों को पेपर क्राफ्टिंग सिखाएं या उसे डस्टबिन की तरह इस्तेमाल करें, बबल व्रैप में नाखून गड़ाकर आनंदित हों या छोटे बच्चों के नीचे कुशन की तरह बिछा दें, ये आपकी मर्ज़ी है. लेकिन अगर आप वाकई झुंझलाए हुए हैं तो ठीकरा केवल शॉपिंग साइट्स पर फोड़ना ठीक नहीं है. कई बार आपका प्रोडक्ट सीधे शॉपिंग कराने वाले बिज़नेसेज़ से न आकर ड्रॉपशिपिंग का काम करने वाले लोगों के थ्रू भी आता है.

इन शॉपिंग साइट्स के थ्रू अपने लिस्टेड प्रोडक्ट बेचने वाले छोटे बिज़नेस भी ऐसा कर देते हैं. अब मान लीजिए उनके यहां इतना स्ट्रिक्ट पैकेजिंग सिस्टम नहीं है, या पैकेजिंग करने वाला वर्कर अपने मालिक से नाराज़ है और अपने मालिक के बबल वाले WRAP और कार्डबोर्ड रोल का नुकसान ही चाहता है तो हो सकता है वो किंग साइज़ बर्गर के अन्दर अठन्नी जितनी पैटी रखके दे दे.

डड्रॉपशिपिंग (प्रतीकात्मक तस्वीर - इंडिया टुडे)
ड्रॉपशिपिंग (प्रतीकात्मक तस्वीर – इंडिया टुडे)

आशा है कि पहाड़ खोदने पर क्या निकल सकता है और क्यूं निकल सकता है ये आप अबतक समझ गये होंगें. हालांकि कई बार ऑनलाइन शॉपिंग में ट्राईपॉड स्टैंड की जगह टूथपेस्ट और मोबाइल फ़ोन की जगह साबुन की बट्टी भी डिब्बे में बंद होकर आ जाती है. इस मामले में फिर कभी बात करेंगे. बाकी हम फिर कभी किसी हास्यास्पद मुसीबत के एक्सप्लेनर के साथ आपसे मिलेंगें, शुक्रिया.


इस स्टोरी को शिवेंद्र के साथ मिलकर लिखा गया है.


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