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'मिनटों में लोन' देने वाली गैलेक्सी कार्ड कंपनी के यूज़र बनने से पहले ये रिपोर्ट पढ़ लीजिए!

(गैलेक्सी ऐप का पक्ष मिलने के बाद ख़बर अपडेट की गई है)

फर्ज करें किसी दिन आपको मेसेज आता है कि फलां आदमी ने लोन लेते हुए आपका नंबर बतौर रेफरेंस दिया है. मेसेज में लिखा है,

अगर आप चाहते हैं कि —-(नाम) के खिलाफ FIR ना हो तो 8894xxxxxx नंबर पर संपर्क करें.

अब पुलिस और FIR का नाम सुनते ही आम आदमी घबरा सा जाता है. ऐसे में उसके पास दो ऑप्शन होते हैं-

पहला, मेसेज को फ्रॉड और ठगी की साजिश मानकर नज़रअंदाज़ कर दे,
दूसरा, लोन लेने वाले शख्स के नंबर पर कॉल घुमाए.

अब कॉल घुमाने पर सामने से रोती-सी आवाज़ आती है. क्योंकि वो शख़्स भी लगातार आ रहे फोन कॉल्स से परेशान है.

बिहार के रहने वाले मृत्युंजय कुमार के साथ पिछले कुछ दिनों से ऐसा ही हो रहा है. वो इंस्टेंट लोन देने वाली एक कंपनी गैलेक्सी कार्ड पर भरोसा कर ठगा महसूस कर रहे हैं. वे अकेले ऐसे शख्स नहीं हैं. परेशानी उनकी भी है जिन्हें बताया जाता है कि किसी ने लोन लिया और रेफरेंस में उनका नाम दे दिया.

ऐसे कम से कम पांच लोगों से लल्लनटॉप ने बीते दिनों में संपर्क किया है, जिन्हें गैलेक्सी कार्ड का ये मेसेज मिला. उनका स्पष्ट कहना है कि जिस आदमी का नाम मेसेजों में आ रहा है, वो उसे नहीं जानते.

इंस्टेंट लोन के नाम पर फ़र्ज़ीवाड़ा?

इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे लोगों की संख्या पांच से कहीं ज्यादा हो सकती है. ऐसे में ये जानना जरूरी है तुरंत कर्ज देने वाली कंपनियां या ऐप्लिकेशन (जैसे गैलेक्सी कार्ड) और इनसे जुड़ी परेशानियां क्या हैं. इसे मृत्युंजय कुमार के मामले और इस मुद्दे पर काम कर रहे लोगों से मिली जानकारी के जरिये विस्तार से बताते हैं.

हमारी पड़ताल में पता चला कि मेसेज में गैलेक्सी कार्ड लेने वाले शख़्स का नाम और मोबाइल नंबर दिया होता है. मृत्युंजय के मामले में नंबर उनका था, नाम किसी दिनेश कुमार लाधिया का था. इसलिए वायरल मेसेज में लिखा गया कि दिनेश को कॉल करके जानकारी दें और उनके खिलाफ FIR दर्ज होने से बचाएं.

ये सारे मेसेज किसी फोन नंबर से नहीं, बल्कि मेसेजिंग सर्विसेज़ के ज़रिये भेजे जाते हैं. यानी आप मेसेज भेजने वाले से संपर्क करना चाहें तो कर नहीं पाएंगे.

गैलेक्सी ऐप की तरफ से शख़्स का नाम और नंबर लिखा मेसेज.
गैलेक्सी ऐप: इस तरह के मेसेज आम लोगों को मिल रहे हैं.

गैलेक्सी कार्ड कंपनी किन्हें और कैसे ये मेसेज भेजती है, ये बात कंपनी ने खुले तौर पर नहीं बताई है. हालांकि स्टोरी छपने के बाद कंपनी ने इस बारे में हमें जानकारी दी है. कंपनी दावा करती है कि वो कॉन्टेक्ट नंबर यूज़र की अनुमति के बाद उसकी फोनबुक से लेती है.

मेसेज भेजने का मकसद क्या?

इस तरह के वायरल मेसेज का एक मकसद लोन लेने वाले को सार्वजनिक रूप से शर्मसार करना हो सकता है. बिहार में अपना कारोबार चला रहे मृत्युंजय भी ऐसा ही महसूस कर रहे हैं. दी लल्लनटॉप से बातचीत में उन्होंने कहा-

“बीते कुछ दिनों से मेरा जीना मुश्किल हो गया है. रोज़ की 150 से ज़्यादा कॉल आ रही हैं. सभी कॉल्स उठानी पड़ती हैं, नहीं तो सामने वाला परेशान होगा. दिन में बहुत सारे लोगों के पास 3-4 बार मेसेज जाता है. कम पढ़े लिखे लोगों को जवाब देना मुश्किल हो जाता है. बहुत परेशान हो गया हूं.”

मृत्युंज के साथ क्या हुआ?

मृत्युंजय बताते हैं कि वे साल 2019 में नोएडा के एक कॉलेज में प्रोफेशनल कोर्स कर रहे थे. इसी दौरान उन्हें गैलेक्सी कार्ड के बारे में पता चला था. उनका दावा है,

“मुझे घर की DTH सर्विस (एयरटेल) रिचार्ज करनी थी. गूगल पर खोजा तो गैलेक्सी कार्ड के बारे में पता चला. गैलेक्सी कार्ड में तुरंत क्रेडिट (लोन) अप्रूव हो जाता था, जिसका बिल अगले महीने बनता था. मेरे केस में भी यही हुआ. शुरुआत में 500 रुपये की लिमिट थी. जब मैंने 500 रुपये का रिचार्ज करना चाहा तो हो नहीं पाया. लेकिन ऐप 500 रुपये का बिल दिखाने लग पड़ा. मेरे पास इसके सारे सबूत भी हैं.”

मृत्युंजय ने हमसे 2019 के इस रिचार्ज की डिटेल्स शेयर की हैं. वो दावा करते हैं कि उनका DTH रिचार्ज नहीं हुआ था और उसके सबूत भी हैं. उन्होंने हमें रिकवरी के लिए बीते 2 सालों से आ रहे मेसेज भी दिखाए. इस सबसे परेशान मृत्युंजय कहते हैं,

“शायद कॉलेज के दिनों की गलती भुगत रहा हूं. मैं कॉलेज में था, इतनी जानकारी नहीं थी. इंस्टेंट क्रेडिट देने वाला गैलेक्सी कार्ड ऐप मिला. इसके तहत 500 रुपये का क्रेडिट तुरंत उपलब्ध हो गया. मैंने DTH रिचार्ज करने की कोशिश की थी, जो पूरा नहीं हुआ. कोई भी ट्रांजेक्शन हिस्ट्री चेक कर सकता है. लेकिन गैलेक्सी कार्ड कंपनी ने मुझे बिल भेजना शुरू कर दिया. मैं साल 2019 से कंपनी को ईमेल, फोन और वॉट्सऐप के ज़रिए संपर्क करने की कोशिश कर रहा हूं. लेकिन कोई सुनवाई नहीं. हर महीने फाइन जोड़कर बढ़ा हुआ बिल भेज दिया जाता है.”

मृत्युंजय ने 2019 से 2021 तक गैलेक्सी कार्ड कंपनी को भेजे ईमेल्स और वॉट्सऐप चैट के स्क्रीनशॉट साझा किए हैं.  मृत्युंजय का दावा है कि ‘वो 2019 से ही गैलेक्सी कार्ड कंपनी से संपर्क करके पेमेंट के बारे में बात करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन कंपनी की और से रिप्लाई नहीं आता. अगर वॉट्सऐप पर कभी रिप्लाई आता भी है तो आगे कोई एक्शन नहीं होता. कंपनी की वेबसाइट पर दिए नंबर पर कभी कॉल नहीं लगती और ना ही कॉल रिक्वेस्ट डालने पर उनकी ओर से फोन आता है.’

2019 में 500 रुपये से शुरू हुई मृत्युंजय की कहानी अब 2000 रुपये तक पहुंच गई है.

मृत्युंजय को ये मेसेज 2019 से ही आ रहे हैं. उनका दावा है कि उन्होंने लोन नहीं लिया. कंपनी ने गलत बिल बनाया है. मेसेजों में साफ देखा जा सकता है कि जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोन में ब्याज़ जुड़ता चला गया. (तस्वीर- लल्लनटॉप, स्रोत- मृत्युंजय)
मृत्युंजय को ये मेसेज 2019 से ही आ रहे हैं. उनका दावा है कि उन्होंने लोन नहीं लिया. कंपनी ने गलत बिल बनाया है. मेसेजों में साफ देखा जा सकता है कि जैसे-जैसे समय बीतता गया, लोन में ब्याज़ जुड़ता चला गया. (तस्वीर- लल्लनटॉप, स्रोत- मृत्युंजय)

परेशान मृत्युंजय आखिर ये ‘लोन’ चुकाना चाह रहे हैं. लेकिन वो ऐसा नहीं कर पा रहे, क्योंकि गैलेक्सी कार्ड ऐप में लोन चुकाने का भी कोई ऑप्शन काम नहीं कर रहा. मृत्युंजय ने गैलेक्सी कार्ड ऐप पर लोन चुकाने के प्रोसेस की वीडियो रिकॉर्डिंग भी शेयर की. ऐप खुलते ही री-पेमेंट का ऑप्शन सामने आता है. लेकिन उसमें संख्या भरने के बावजूद कोई रिस्पॉन्स नहीं आता. यानी पैसे चुकाने की कोशिश करें तो वो भी नहीं हो पा रहा है.

गैलेक्सी कार्ड कंपनी का पक्ष

गैलेक्सी कार्ड ऐप गूगल प्लेस्टोर पर मौजूद है. वहां रिव्यू सेक्शन में ऐप के बारे में कई आलोचनात्मक टिप्पणियां देखी जा सकती हैं. हमने गैलेक्सी कार्ड कंपनी की वेबसाइट जांची तो वहां भी कोई खास जानकारियां नहीं दिखीं.

गैलेक्सी कार्ड की रजिस्टर्ड कंपनी जीसीटी टेक्नॉलोज़ीस का पता दिल्ली के सैदुलाजाब इलाके का है. वेबसाइट पर जॉइनिंग चार्ज, ब्याज और सालाना फीस के बिना मात्र 3 मिनट में लोन अप्रूव होने की बात लिखी हुई है. इसके अलावा वेबसाइट पर कोई खास जानकारी अपडेट नहीं है.

हमने इस कंपनी के बारे में और खोजा तो हमें इसके फाउंडर- अमित कुमार की प्रोफाइल मिली. वे लिंक्डइन पर एक्टिव हैं और अपनी कंपनी में नए लोगों को जॉब ऑफर कर रहे हैं. यानी ये कंपनी किसी ना किसी सूरत में काम कर रही है.

गैलेक्सी कार्ड कंपनी के फाउंडर अमित कुमार का लिंक्डइन अकाऊंट.
गैलेक्सी कार्ड कंपनी के फाउंडर अमित कुमार का लिंक्डइन अकाउंट.

इस पूरे मामले में दोनों पक्ष जानने के लिए दी लल्लनटॉप ने फोन कॉल, ईमेल और ट्विटर के ज़रिए गैलेक्सी कार्ड और इसके फाउंडर/CEO अमित कुमार से संपर्क किया. क़रीब 72 घंटे तक जवाब का इंतज़ार करने के बाद ख़बर छापी गई. ख़बर छपने के बाद कंपनी ने अपना पक्ष रखा है. CEO अमित कुमार ने हमसे बातचीत में दावा किया,

“हमारी कंपनी में पूरी पारदर्शिता के साथ काम होता है. जिस यूज़र मृत्युंजय कुमार ने आरोप लगाए हैं, उसने लंबे समय से लोन नहीं चुकाया है. मृत्युंजय ने एक बार नहीं, कई बार रिचार्ज सेवा का इस्तेमाल भी किया है. कंपनी से लोन लेते वक्त गलत जानकारियां भी दी हैं. इसलिए हम इस यूज़र के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने पर विचार कर रहे हैं.”

डेटा शेयरिंग और फोनबुक से नंबर सेव करने के बारे में भी हमने पूछा. अमित अपना पक्ष रखते हैं-

हम 3 मिनट में यूज़र्स को क्रेडिट (लोन) देते हैं. फिज़ीकल वेरिफिकेशन नहीं करते. ऐसे में हम यूज़र से रेफरेंस के लिए कॉन्टेक्ट बुक का एक्सेस मांगते हैं. यूज़र के अनुमति देने पर ही हम बतौर रेफरेंस उनकी फोनबुक में मौजूद नंबर्स को अपने पास रखते हैं. ताकि यूज़र लोन वापस ना करे तो हम उसे जानने वाले लोगों से संपर्क कर सकें. ये सब ऑटोमेटिक प्रोसेस है. अगर कोई रेफरेंस लोन लेने वाले को नहीं जानता है तो मेसेज में आए ऑप्ट-आउट यानी यूज़र से कोई संबंध ना होने पर मेसेज बंद करने का ऑप्शन भी मिलता है. यही हमारा बिज़नेस मॉडल है. हम बाकी लोगों को कम से कम मेसेज भेजना चाहते हैं, लेकिन जब दिखता है कि यूज़र लोन नहीं चुकाने वाला, उस सूरत में मेसेज भेजने जैसे कदम उठाए जाते हैं.

अमित अनजान लोगों को जा रहे मेसेजों के बारे में दावा करते हैं कि

“मेसेज सिर्फ यूज़र की फोनबुक में मौजूद लोगों को जाते हैं.”

हालांकि जब लल्लनटॉप ने मृत्युंजय के ज़रिए इस बात की तस्दीक करनी चाही तो अलग जानकारी हमारे सामने आई है. मृत्युंजय का दावा है कि उनके फोन में ऐसे लोगों के नंबर नहीं हैं, जिन्हें इस केस में मेसेज गए हैं.

अमित कुमार ने उनके पास मौजूद लाखों नंबर्स का रेफरेंस बनाने के अलावा कोई और इस्तेमाल ना करने का दावा किया है. साथ ही किसी भी तरह की डेटा ख़रीद – फरोख़्त में शामिल ना होने की बात कही है.

दी लल्लनटॉप गैलेक्सी कार्ड कंपनी या मृत्युंजय के किए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता. 

मृत्युंजय और अन्य लोगों के मामले देखकर एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि इंस्टेंट लोन देने वाली कंपनियों में काफी अनियमितताएं हैं. उनसे और अन्य लोगों से मिली जानकारी से पता चलता है कि इन कंपनियों के अधिकतर ग्राहकों की उम्र 18 से 24 साल की होती है. तुरंत लोन अप्रूव होने का लालच देकर उनसे कड़े कॉन्ट्रेक्ट्स साइन करवाए जाते हैं, और फिर इनकी आड़ में कथित रूप से मनमानी वसूली की जाती है.

जानकार क्या बताते हैं?

ऐसे केसों को लेकर हमने एडवोकेट पंकज सिंह से बात की. वे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में साइबर क्राइम पीड़ितों का केस लड़ रहे हैं. पंकज चाइनीज़ इन्वेस्टमेंट के ज़रिए भारत में काम कर रही फाइनैंस कंपनियों और कॉल सेंटर्स के नेक्सेस की बारीक जानकारी रखते हैं. गैलेक्सी कार्ड का मामला भी ऐप और फाइनैंस से जुड़ा है. पंकज से हमने ऐसी कंपनियों के तौर-तरीके के बारे में जाना. उन्होंने बताया-

“ऐसी कंपनियां अपने जाल में फंसाने के कई तरीके अपनाती हैं. इनका निशाना खासतौर पर युवा होते हैं. कंपनी पहले मनमाने कॉन्ट्रेक्ट्स बनाती है. लोन लेने के लिए आपको उनकी शर्तें माननी ही पड़ती हैं. पहले कुछ सौ रुपये का लोन दिया जाता है. जब यूज़र उसे चुका देते हैं तो लोन की सीमा बढ़ा दी जाती है. और कई बार लोन इतना हो जाता है कि यूज़र समय पर चुका नहीं पाता. फिर ब्याज़ के मकड़जाल में फंस जाता है. उन्हें ऑनलाइन गेमिंग से पैसा कमाने और लोन चुकाने का ऑप्शन दिया जाता है. ऐसे कई तरीके अपनाए जाते हैं.”

हमने पंकज से जानना चाहा कि किस तरह से आम लोगों के नंबरों पर ये जानकारी पहुंचाई जाती है. चाहे लोन लेने वाले का कोई उनसे संबंध ही ना हो. जैसे मृत्युंजय के केस में हुआ. तमाम लोगों के पास मेसेज आया कि मृत्युंजय ने उनका नंबर रेफरेंस के तौर पर दिया है. जबकि मृत्युंजय इससे साफ इनकार करते हैं. इस बारे में पंकज बताते हैं-

“ये कंपनियां एकसाथ बड़ा डेटा खरीदती हैं. आपके ध्यान में होगा कि जब आप मॉल जाते हैं या किसी मेट्रो स्टेशन पर खड़े होते हैं, वहां क्रेडिट कार्ड इशू करने का दावा करते कुछ सेल्सपर्सन मौजूद होते हैं. यहां डेटा इकट्ठा होता है. फिर आगे बेच दिया जाता है. ये एक तरीका है. ऐसे बहुत से तरीके होते हैं. दुखद है कि भारत में डेटा कानून मजबूत नहीं हैं और ऐसे मामलों में मुश्किल ही कोई कार्रवाई हो पाती है.”

कानून अपने तरीके से काम करेगा. लेकिन दिनभर फोन घनघनाने से हो रही मानसिक प्रताड़ना का मृत्युंजय या उनके जैसे पीड़ित क्या करें? इस सवाल पर पंकज बताते हैं कि ऐसी कंपनियों का दरअसल यही तरीका है-

“ये कंपनियां कॉल सेंटर्स के साथ काम करती हैं. लोन लेने वाले को मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है. इसका एक भावुक पहलू भी है. लोन लेने वाले अक्सर पढ़ाई करने वाले नौजवान होते हैं. उनके पास ज़्यादा पैसा नहीं रहता. वसूली करने वाले धमकी देते हैं कि उनके परिवार और दोस्तों को बताएंगे. यानी पब्लिक शेमिंग की बात कही जाती है. कुछ मामलों में वाकई परिवार तक बात पहुंच जाती है. डर के मारे लोन के चंगुल में फंसे नौजवान किसी तरह से पैसा देते हैं.”

परिजनों के नंबर कैसे कंपनियों तक पहुंचते हैं, ये अपने आप में एक और बड़ा सवाल है. क्या ये कंपनियां अपने ऐप के ज़रिए फोनबुक में सेंध लगाती हैं? पंकज ऐसी आशंकाओं से इनकार नहीं करते. हो सकता है कि ऐसी कंपनियां यूज़र के फोन में तांकझांक करती हों.

गूगल प्लेस्टोर में मौजूद गैलेक्सी कार्ड ऐप भी 17 तरह की परमिशन मांगती है. जिसमें कॉन्टैक्ट्स (पूरी फोनबुक) और लोकेशन जैसी बेहद संवेदनशील जानकारियां भी शामिल हैं.

गैलेक्सी कार्ड आपकी फोनबुक में मौजूद कॉन्टेक्ट्स रीड करने की परमीशन मांगती है. हालांकि इससे ये साबित नहीं होता कि कंपनी इस परमीशन का गलत इस्तेमाल कर फोन नंबर्स को स्टोर कर रही है. लेकिन एक संभावना तो रहती ही है.
गैलेक्सी कार्ड आपकी फोनबुक में मौजूद कॉन्टेक्ट्स रीड करने की परमीशन मांगती है. हालांकि इससे ये साबित नहीं होता कि कंपनी इस परमीशन का गलत इस्तेमाल कर फोन नंबर्स को स्टोर कर रही है. लेकिन एक संभावना तो रहती ही है.

हमने पंकज से उनके अनुभव के आधार पर जानना चाहा कि पुलिस, जांच एजेंसियों और कोर्ट का रवैया इन मामलों में कैसा रहता है. वे बताते हैं-

“कई मामलों में ये देखा गया है कि पुलिस इन कंपनियों की शिकायत के आधार पर लोन लेने वालों को गिरफ़्तार करती है. ये लोन ज़्यादा नहीं होता, मात्र सौ रुपये से लेकर कुछ हज़ार रुपये तक का. यानी लोन लेने वाला पहले कंपनियों की मनमानी शर्तें झेलता है और फिर पुलिस की कार्रवाई. लोअर ज्युडिशिरी में ऐसे मामलों का निपटारा ना के बराबर होता है. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ऐसे मामले जाते हैं. लेकिन ये महंगी प्रक्रिया है. फाइनैंस कंपनियों पर कड़े कानून ना होने की सूरत में ये सब चल रहा है और नौजवान इसका शिकार बन रहे हैं.”

पंकज आगे कहते हैं,

“पब्लिक शेमिंग और परिवार का डर भी बड़ा कारण है कि लोन स्कैम में फंसने वाले नौजवान फ्रॉड कंपनियों के आगे सरेंडर कर देते हैं. उनकी हिम्मत नहीं होती खुलकर विरोध करने की या फिर पुलिस तक जाने की. ऐसे नौजवानों को डरने की बजाय जांच ऐजेंसियों की मदद लेनी चाहिए. अगर पुलिस थाने में सुनवाई नहीं होती तो SP रैंक के अधिकारियों तक बात पहुंचाएं. अगर स्कैम संगठित तौर पर हो रहा है तो पुलिस के इकनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW) में शिकायत दर्ज कराएं. डरने की बजाए परिवार से पूरी बात शेयर करें. कंपनियों को ऐसे हालात का फायदा ना लेने दें. खुलकर सामने आएं और अपने नाम से FIR दर्ज कराएं, ताकि जब कार्रवाई करने की बारी आए तो अनाम बताकर मामला खारिज ना कर दिया जाए.”

सरकार और पुलिस की ओर से भी इस तरफ प्रयास बढ़ाए गए हैं. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने साइबर क्राइम की एक अलग डेडिकेटिड वेबसाइट बनाई है- cybercrime.gov.in

यहां आप साइबर क्राइम रिपोर्ट कर सकते हैं. वेबसाइट पर क्राइम के तरीके भी दिए गए हैं ताकि आम लोग जागरूक हो सकें.

साइबर क्राइम का देशव्यापी हेल्पलाइन नंबर है- 155260

कोई फ्रॉड होने पर आप इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा @CyberDost नाम से एक सरकारी ट्विटर हैंडल भी काम करता है. ताजा अपडेट्स के लिए इससे जुड़ सकते हैं.

मृत्युंजय कुमार की कहानी कोई अपवाद नहीं है. रोज़ाना ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं. इसलिए चौकन्ना रहें और सोच-समझकर ही किसी लिंक पर क्लिक करें. अगर आपको किसी बात के फर्ज़ी होने का अंदेशा होता है तो उसे बार-बार चेक करने के बाद ही मानें.

दी लल्लनटॉप लगातार ऐसे मामलों को उठा रहा है. अगर आपके साथ भी ऐसा कोई फ्रॉड हुआ है तो हमें Padtaal@lallantop.com पर मेल कर जानकारी शेयर कर सकते हैं.


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