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लॉकडाउन में टीचरों के बनाए वॉट्सऐप ग्रुप क्यों छोड़ रहे हैं स्कूली बच्चे?

कोरोना लॉकडाउन के बीच देश के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं. लोगों की सेहत और जान की हिफाजत सबसे ऊपर है, लेकिन मुद्दे और भी हैं. एक गंभीर मुद्दा बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का है, क्योंकि ‘पढ़ेगा इंडिया, तभी तो बढ़ेगा इंडिया.’ ऐसे में ‘दी लल्लनटॉप’ ने ये जानने की कोशिश की कि लॉकडाउन में स्कूली बच्चे कैसे पढ़ रहे हैं. टीचर किस तरह बच्चों को पढ़ा रहे हैं. क्या बच्चों के अभिभावक ई-लर्निंग या वॉट्सऐप वाली पढ़ाई से संतुष्ट हैं?

चूंकि पढ़ाने का दारोमदार शिक्षकों पर है, इसलिए हमने सबसे पहले कुछ राज्यों के शिक्षकों से बात कर ऑनलाइन पढ़ाई-लिखाई का हाल-चाल जाना. हमने शिक्षकों से कुछ कॉमन सवाल पूछे.

# लॉकडाउन में स्कूली बच्चों को कैसे पढ़ा रहे हैं?

# औसतन कितने बच्चे फोन से जुड़ पाते हैं?

# पढ़ाने में क्या-क्या समस्याएं आ रही हैं?

# आपकी नजर में उन समस्याओं का कोई समाधान है?

हमने ये पाया कि ज्यादातर स्कूलों की बड़ी समस्याएं एक जैसी ही हैं. ऐसे में हम उन शिक्षकों की बात को यहां पेश कर रहे हैं, जिन्होंने किसी बड़ी समस्या या किसी अनूठे समाधान की बात की. बातचीत का सार इस तरह है.

कहीं मोबाइल में नेट नहीं, कहीं जूम की धूम

शिक्षिका का नाम: अंशु प्रकाश
स्कूल: मध्य विद्यालय, चकियाटोला, दानापुर (बिहार)
पढ़ाने का जरिया: वॉट्सऐप
औसतन कितने बच्चे जुड़ते हैं: 10%

समस्याएं क्या हैं?

बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ने-पढ़ाने में क्या दिक्कत हो रही होगी, इसकी बानगी राजधानी पटना से ठीक सटे एक ग्रामीण इलाके के स्कूल में देखी जा सकती है. अंशु प्रकाश बताती हैं कि पांचवीं क्लास के 50 बच्चों में से करीब 15 बच्चे ही वॉट्सऐप से जुड़ सके. वॉट्सऐप से जुड़ने वाले इन 15 बच्चों में से भी बमुश्किल चार बच्चे ही पढ़ाई के लिए इंटरनेट इस्तेमाल कर पाते हैं. इस समस्या के बारे में उन्होंने कहा-

ये गांव के बच्चे हैं. कई के माता-पिता अभाव में गुजर-बसर कर रहे हैं. अभिभावकों पर बहुत जोर देने के बाद कुछ बच्चों को वॉट्सऐप से जोड़ा जा सका. कुछ बच्चों के माता-पिता तो कहते हैं कि अभी उनके पास खाने तक के पैसे नहीं हैं, तो वे नेट कहां से भरवाएंगे? कुछ बच्चे हमें अपने रिश्तेदार का मोबाइल नंबर दे देते हैं. ऐसे में वे रिश्तेदार स्कूल का वॉट्सऐप ग्रुप ही छोड़ दे रहे हैं. 

अंशु प्रकाश एक बड़ी सामाजिक विसंगति की ओर भी इशारा करती हैं. उन्होंने अपने उन बच्चों के बारे में बताया, जो प्राइवेट स्कूल या कोचिंग में पढ़ रहे हैं-

मेरे घर के बच्चे डीएवी स्कूल में पढ़ते हैं. उनके स्कूल के टीचर यूट्यूब पर वीडियो बनाकर बच्चों को लिंक दे रहे हैं. बच्चे वॉट्सऐप के जरिए सवाल पूछ रहे हैं, होमवर्क भी चेक करवा रहे हैं. मेरी जो बच्ची IIT एंट्रेंस की तैयारी करती है, उसकी ऑनलाइन पढ़ाई जूम ऐप के जरिए हो रही है. ऐसे में अपने स्कूल के बच्चों की हालत देख बहुत अफसोस होता है.

समाधान क्या?

# सरकार लॉकडाउन में बच्चों को फ्री डेटा मुहैया कराए.

‘उसी मोबाइल से बड़े लोग टाइमपास करते हैं’

शिक्षिका का नाम: मधुलिका चौधरी
स्कूल: प्राथमिक विद्यालय. जिला-बहराइच (यूपी)
पढ़ाई का जरिया: वॉट्सऐप
औसतन कितने बच्चे जुड़ते हैं: 10% से कम

समस्याएं क्या हैं?

मधुलिका चौधरी बताती हैं कि सबसे बड़ी समस्या तो ये है कि हर बच्चे का मोबाइल नंबर नहीं है. स्कूल के करीब 100 बच्चों में से केवल नौ के ही नंबर काम कर रहे हैं. इनमें भी सिर्फ तीन स्मार्टफोन हैं, जिन पर वॉट्सऐप चलता है. उन्होंने कहा-

अगर हमें पहले पता होता कि लॉकडाउन होने वाला है, तो हम पहले से बच्चों को कुछ सिखा देते कि मोबाइल के जरिए कैसे पढ़ना है. अब गांव के छोटे बच्चों से क्या उम्मीद की जा सकती है? कुछ बच्चों के घरवाले वैलिडिटी खत्म होने पर नया सिम ही ले लेते हैं. नतीजा, नंबर चेंज. कुछ ऐसे भी हैं, जो लॉकडाउन में उसी मोबाइल से टाइमपास कर रहे होते हैं. ऐसे में वो अपने बच्चों को फोन देना नहीं चाहते.

मधुलिका चौधरी ने एक और समस्या की ओर ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा कि अगर 100 में से पांच बच्चे फोन से सब कुछ पढ़-समझ भी गए, फिर भी पढ़ाई से वंचित रह गए उन 95 बच्चों को तो बाद में पढ़ाना ही पड़ेगा.

गुरु-शिष्य वाली आत्मीयता ऑनलाइन पढ़ाई में कहां

शिक्षक का नाम: पंकज श्रीवास्तव
स्कूल: प्राथमिक विद्यालय, मनेहरा, जिला- बहराइच (यूपी)
पढ़ाई का जरिया: वॉट्सऐप
औसतन कितने बच्चे जुड़ते हैं: 10% से कम

समस्याएं क्या हैं?

बच्चों के पास मोबाइल न होने के अलावा पंकज श्रीवास्तव ने दूसरी बड़ी कमी का जिक्र किया. उन्होंने कहा-

जब हम बच्चों को क्लासरूम में सामने बैठाकर पढ़ाते हैं, तो बच्चा आंखों से हमारे हाव-भाव गौर से देखता है. स्वर का उतार-चढ़ाव अच्छी तरह सुन पाता है. उस आत्मीयता की वजह से बच्चे ज्यादा सीख-समझ पाते हैं. लेकिन फोन से पढ़ाई में न तो बच्चे जल्दी नई बात सीख पाते हैं, न ही हमें संतुष्टि का अनुभव हो पाता है. ऐसे में हम अभी केवल पुराने पाठ ही दोहरा रहे हैं.

मोबाइल फोन और नेट पैक की बात चली, तो पंकज श्रीवास्तव ने गांव-देहात की गरीबी का एक बड़ा मार्मिक प्रसंग सुनाया. उन्होंने कहा-

गांव की एक महिला हंसिया की जगह खुरपी से धान काट रही थीं. मैंने उनसे पूछा कि हंसिया का काम खुरपी से क्यों कर रही हैं आप? महिला के जवाब से मैं एकदम सन्न रह गया. दरअसल, महिला के पास हंसिया खरीदने तक के पैसे नहीं थे. वो हंसिया, जो केवल 20 रुपए का ही आता है.

मंदिर-मस्जिद के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल पढ़ाई में हो

शिक्षिका का नाम: मृदुला शुक्ला
स्कूल: शादीपुर छिड़ौली प्राथमिक विद्यालय, जिला- गौतमबुद्ध नगर (यूपी)
पढ़ाई का जरिया: वॉट्सऐप
औसतन कितने बच्चे जुड़ते हैं: 10% से कम

प्रधानाध्यापिका मृदुला शुक्ला ने बातचीत करते वक्त एक अलग समस्या की ओर ध्यान दिलाया. उन्होंने कहा-

ग्रामीण इलाके का स्कूल है. कटनी का सीजन चल रहा है, इसलिए अभी स्कूल के ज्यादातर बच्चे खेत-खलिहान के काम में जुटे हैं. मोबाइल और डेटा कनेक्शन के अभाव में ऐसे बच्चों को जोड़ना और भी मुश्किल हो जाता है.

हालांकि समाधान के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने एक अनूठा सुझाव दिया-

मेरे स्कूल के ज्यादातर बच्चे एक किलोमीटर के दायरे में ही रहते हैं. गांव में ही एक मस्जिद है. ऐसे में मेरा सुझाव ये है कि मस्जिद के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई के लिए हो सकता है. अगर बड़े पैमाने पर सहमति बने, तो लॉकडाउन के दौरान मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या किसी भी सामुदायिक-सांस्कृतिक केंद्र के लाउडस्पीकर का इस्तेमाल पढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए. टीचर नियत समय पर, बारी-बारी से वहां जाकर एकसाथ ही कई बच्चों को पढ़ा सकते हैं.

लेकिन वॉट्सऐप से पढ़ाने को किसने कहा?

सारे टीचर कह रहे हैं कि बच्चों को वॉट्सऐप से कैसे जोड़ें, तो हमने ये भी पता लगाया कि क्या किसी सरकारी आदेश में सचमुच वॉट्सऐप से पढ़ाए जाने का निर्देश दिया गया है या हर कोई बेकार में इसके पीछे परेशान हो रहा है.

बिहार के शिक्षा विभाग का एक लेटर है, जिसमें पढ़ाई के माध्यम को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं.

जिला शिक्षा पदाधिकारी, पटना के ऑफिस से जारी किया गया लेटर
जिला शिक्षा पदाधिकारी, पटना के ऑफिस से जारी किया गया लेटर

जिला शिक्षा पदाधिकारी, पटना की ओर से 11 अप्रैल, 2020 को लेटर जारी किया गया है. इसमें पढ़ाई के लिए क्रम से चार तरीके बताए गए हैं-

1. उन्नयन ऐप
2. दीक्षा ऐप
3. जूम क्लाउड मीटिंग
4. वॉट्सऐप लाइव

यहां ये साफ कर देना जरूरी है कि जूम ऐप के बारे में शिकायतें मिलने के बाद विभाग की ओर से एक और लेटर निकाला गया. उस लेटर में पढ़ाई के लिए जूम का इस्तेमाल बंद करने का निर्देश जारी किया जा चुका है.

सरकार के पास कोई बेहतर विकल्प है?

ऐसा नहीं है कि लॉकडाउन में सरकारों का ध्यान ऊपर बताई गई समस्याओं की ओर नहीं गया है. केंद्र सरकार पहले ही गाइडलाइंस जारी कर चुकी है. कुछ राज्यों में रेडियो और दूरदर्शन के जरिए भी पढ़ाई कराई जा रही है.

बिहार सरकार ने भी हर विषय के एक्सपर्ट टीचरों का पैनल बनाया है. इन विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई अध्ययन सामग्री और वीडियो का इस्तेमाल दूरदर्शन पर किया जा रहा है. बिहार शिक्षा परियोजना के तहत चलाए जा रहे इस प्रोग्राम को नाम दिया गया है, ‘मेरा दूरदर्शन, मेरा विद्यालय’.

बिहार शिक्षा परियोजना के तहत एक्सपर्ट शिक्षकों का पैनल बनाया गया है, जो दूरदर्शन के लिए कंटेट तैयार कर रहा है. (फोटो: The Lallantop)
बिहार शिक्षा परियोजना के तहत एक्सपर्ट शिक्षकों का पैनल बनाया गया है, जो दूरदर्शन के लिए कंटेट तैयार कर रहा है. (फोटो: The Lallantop)

क्या कहते हैं एक्सपर्ट टीचर

दूरदर्शन पर पढ़ाई के लिए बनाए गए पैनल के विशेषज्ञ शिक्षक मधुरेंद्र कुमार ‘मधुप’ ने इस प्रोग्राम के बारे में जानकारी दी. उन्होंने कहा-

मोबाइल और इंटरनेट की सुविधा भले ही हर बच्चे के पास न हो, पर टीवी का दायरा बहुत बड़ा है. इलाका चाहे शहरी हो या ग्रामीण, टीवी तो मोबाइल से कहीं पहले से ही घर-घर पहुंच चुका है. दूरदर्शन के लिए ऐसे ही कंटेंट तैयार किए जा रहे हैं, जिन्हें देखकर कोई भी स्टूडेंट घर बैठे आसानी से पढ़ाई कर सकता है. 

सुझाव के बारे में पूछे जाने पर ‘मधुप’ ने कहा कि दूरदर्शन पर पढ़ाई की अवधि बढ़ाने पर विचार होना चाहिए. अभी 55 मिनट के स्लॉट में किसी एक विषय की तीन-तीन कक्षाओं की पढ़ाई होती है, जो कि नाकाफी मालूम पड़ती है.

अभिभावकों का क्या कहना है

हालांकि शिक्षकों ने जिन समस्याओं का जिक्र किया है, वो सीधे तौर पर स्कूली बच्चों और उनके माता-पिता से ही जुड़ी हुई हैं. इसके बावजूद हमने कुछ अभिभावकों से भी उनकी राय ली. कुछ की समस्याएं कॉमन हैं, तो कुछ थोड़ी अलग. कहीं-कहीं लोग ऑनलाइन पढ़ाई से संतुष्ट भी हैं.

अभिभावक का नाम: भारती शर्मा (45 साल)
जगह: रायपुर, मध्य प्रदेश

भारती शर्मा की बेटी सातवीं में पढ़ती है. उन्होंने जो परेशानी बताई, वो कई अभिभावकों की है. वे कहती हैं,

मेरी बेटी को पढ़ाई के कंटेंट वॉट्सऐप के जरिए भेजे जा रहे हैं. उस कंटेंट को न तो बच्ची ठीक से समझ पा रही है, न ही उन्हें देखकर हम अपनी बच्ची को कुछ पढ़ा पा रहे हैं. बच्चे ठीक से पढ़-लिख सकें, इसीलिए तो हम उन्हें स्कूल और ट्यूशन भेजते थे. स्कूल की इस वॉट्सऐप वाली पढ़ाई का क्या मतलब रह जाता है?

ऑनलाइन पढ़ाई से हर कोई परेशान है, ऐसा भी नहीं कह सकते. कुछ ऐसे अभिभावकों से भी बात हुई, जो स्कूल की पढ़ाई के तरीके से संतुष्ट हैं. ये खुश भी हैं कि लॉकडाउन के दौरान बच्चे कम से कम हाइटेक तो हो ही गए हैं. ऐसा ही एक उदाहरण गुजरात का देख सकते हैं.

अभिभावक का नाम: मनीष गौतम (36 साल)
जगह: वडोदरा, गुजरात

मनीष गौतम की बेटी पहली कक्षा में पढ़ती है, एक प्राइवेट स्कूल में. जूम के जरिए ऑनलाइन क्लास चल रही है. मनीष बताते हैं कि बच्ची तय वक्त पर स्कूल यूनिफॉर्म पहनकर लैपटॉप संभाल लेती है. पूरी तल्लीनता से होमवर्क करती है. स्कूल के कल्चरल प्रोग्राम आदि भी ऑनलाइन हो रहे हैं. ऐसे में बच्ची भी खुश, परिवार भी खुश.

कुल मिलाकर, ज्यादातर अभिभावकों का मानना है कि लॉकडाउन में ई-लर्निंग के बहाने बच्चे कुछ तो सीख ही रहे हैं. कुछ भी न होने से कुछ होना तो बेहतर ही है.

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