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वो मामला, जिसने कभी मायावती की आंखों के तारे रहे नेता को जेल पहुंचा दिया

इस कहानी की शुरुआत एक नेता के बयान से करेंगे. इसी बयान के बाद यूपी में वो कहानी शुरू हुई, जिसके बाद बसपा के दो प्रमुख नेता, जिनमें से एक को तो एक समय मायावती का आंखों का तारा कहा जाता था, इस समय जेल में है. पहले ये बयान पढ़िए,

“जो सपना देखा था कांशीराम जी ने, उस सपने को मायावती चूर-चूर कर रही हैं. आज मायावती जी टिकटों की इस तरह से बिक्री कर रही हैं. एक *** भी अगर किसी से कॉन्ट्रैक्ट करती है तो जब तक पूरा नहीं कर लेती, उसको नहीं तोड़ती है. पर ये देश की हमारी इतनी बड़ी नेता हैं. तीन-तीन बार टिकट बदलती हैं. मायावती जी किसी को एक करोड़ रुपये पर टिकट देती हैं. एक घंटे बाद कोई 2 करोड़ रुपये देने वाला मिलता है तो उसको टिकट दे देती हैं. और शाम को 3 करोड़ दे देता है तो उसका भी (टिकट) काटकर उसको दे देती हैं. एक *** से भी बदतर चरित्र की आज मायावती जी हो गई हैं.”

बसपा की नेता मायावती पर बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए 20 जुलाई 2016 को ये बयान उस समय भाजपा के नेता और प्रदेश उपाध्यक्ष रहे दयाशंकर सिंह ने दिया था. ये यूपी की राजनीति में एक बड़ी घटना थी. मायावती के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाना एक बड़ी हलचल भी. बयान पर मायावती ने तो शुचितापूर्ण और सधी हुई प्रतिक्रिया दी. लेकिन भाजपा ने दयाशंकर सिंह को पार्टी से बाहर कर दिया 6 साल के लिए, भले ही दयाशंकर सिंह ने अपने बयान के लिए माफ़ी मांग ली थी.

 

दयाशंकर सिंह
दयाशंकर सिंह

लेकिन इस सबके बावजूद बसपा के नेता एक बड़ा विरोध करने की तैयारी में थे. ऐसा भद्दा विरोध, जिसने उन्हें दयाशंकर सिंह की श्रेणी में ही लाकर रख दिया.

दयाशंकर के परिवार के बारे में भद्दी बातें

21 जुलाई 2016. दयाशंकर की बयानबाज़ी का ठीक अगला दिन. यूपी में विधानसभा चुनाव होने में आधा साल बचा था. सबको अपनी राजनीति चमकानी थी. बसपा नेता और 2015 में विधान परिषद सदस्य चुने गए नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी अपने कुछ समर्थकों के साथ लखनऊ के हज़रतगंज चौराहे पर पहुंच गए. नसीमुद्दीन तब बसपा के राष्ट्रीय महासचिव हुआ करते थे. उनके साथ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर, राष्ट्रीय सचिव मेवालाल समेत और भी कई नेता मौजूद थे. विरोध शुरू हुआ. दयाशंकर सिंह की गिरफ़्तारी की मांग उठने लगी. भले ही सपा की सरकार थी, लेकिन दयाशंकर को गिरफ़्तार करने की मांग यूपी के प्रशासनिक हलके के लिए बड़ी थी. क्योंकि दयाशंकर पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता कल्याण सिंह के ख़ास माने जाते थे.

नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी
नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी

बहरहाल प्रदर्शन करते करते बसपाई दहलीज़ लांघ गए. आरोप है कि नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और उनके सहयोगियों ने ‘दयाशंकर सिंह की मां को पेश करो, बहन को पेश करो, बेटी को पेश करो’ जैसे नारे लगाए. दयाशंकर सिंह के बयान से बैकफ़ुट पर चली गयी भाजपा को नसीमुद्दीन और उनके समर्थकों ने मौक़ा दे दिया. बसपा के बड़े नेता घिर गए. चूंकि बीजेपी ने दयाशंकर सिंह को निष्कासित कर दिया था, लिहाज़ा मायावती से भी यही मांग की जाने लगी कि इन नेताओं को पार्टी से बाहर किया जाए.

22 जुलाई 2016. दयाशंकर की मां तेतरा देवी ने हज़रतगंज कोतवाली में एक FIR दर्ज करायी. इस FIR में नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी, रामअचल राजभर, मेवालाल गौतम, अतर सिंह राव और नौशाद अली के अलावा बसपा प्रमुख मायावती भी नामज़द थीं. क्राइम नम्बर 458/16. FIR में IPC की 120-B, 153-A, 504, 505 और 509 जोड़ी गयीं. और यही FIR नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और रामअचल राजभर की हालिया गिरफ़्तारी की नींव है.

स्वाति सिंह का ग्राफ़ चढ़ा

बहरहाल, इस घटना ने दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह को लाइमलाइट में लाकर खड़ा कर दिया. दयाशंकर तो पार्टी से निकाल दिए गए थे. लिहाज़ा स्वाति सिंह ने बीजेपी की ओर से मोर्चा सम्हाला. राजनीतिक बयानबाज़ी का मुद्दा अब एक पर्सनल लिबर्टी और औरतों से जोड़कर देखा जा रहा था. राजस्थान पत्रिका में छपी ख़बर के मुताबिक, स्वाति सिंह ने तब मीडिया से बातचीत में कहा था,

“अगर मेरे पति ने ग़लती की है, तो ग़लती की सज़ा उन्हें क़ानून देगा. लेकिन मेरे परिवार और मेरी बेटियों को लेकर जो भद्दी टिप्पणियाँ की जा रही हैं, उनका जवाब कौन देगा?”

नरेंद्र मोदी के साथ दयाशंकर सिंह
नरेंद्र मोदी के साथ दयाशंकर सिंह

स्वाति सिंह का ग्राफ़ चढ़ने लगा. हर मोर्चे पर भाजपा उन्हें सामने रख रही थी. 7 अक्टूबर 2016 को भाजपा ने स्वाति सिंह को लेकर एक बड़ा ऐलान कर दिया. स्वाति सिंह को भाजपा की महिला प्रकोष्ठ का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया. स्वाति सिंह ने भी ख़ुद को लखनऊ में बनाए रखा. क़यास लगाए जाने लगे कि विधानसभा चुनाव में स्वाति सिंह एक बड़ी भूमिका निभाएंगी. क़यास सच साबित हुए. भाजपा ने लखनऊ की सरोजिनी नगर सीट से स्वाति सिंह को टिकट दे दिया.

स्वाति सिंह
स्वाति सिंह

कहते हैं कि अगर ये पूरा प्रकरण नहीं हुआ होता तो दयाशंकर सिंह बलिया सदर से चुनाव लड़ते. स्वाति ने भी बलिया की विधानसभा सीट मांगी थी. लेकिन समझौते के तहत ये सीट भारतीय समाज पार्टी के खाते में चली गयी. सरोजिनी नगर सीट पर स्वाति सिंह को समझौता करना पड़ा. ये बड़ा सट्टा था. बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि भाजपा ने इस सीट पर कभी जीत दर्ज नहीं की थी. 2017 के विधानसभा चुनाव हुए. स्वाति सिंह ने इस सीट पर भाजपा का खाता खोल दिया. कुछ ही महीनों बाद दयाशंकर सिंह पार्टी में वापिस ले लिए गए.

कोर्ट में नहीं आए नसीमुद्दीन

इधर, नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी की बसपा से विदाई के दिन नजदीक आने लगे थे. विधानसभा चुनाव में नसीमुद्दीन को पार्टी ने पश्चिमी यूपी की ज़िम्मेदारी दी. चुनाव में बसपा की हालत तो ख़राब हुई ही, ये बात भी उठने लगी कि पश्चिमी यूपी में प्रत्याशियों से करोड़ों रुपए पार्टी फ़ंड के नाम पर ले लिए गये हैं. आरोप लगे कि ये पैसे नसीमुद्दीन ने मायावती के नाम पर लिए थे, लेकिन पैसे मायावती तक नहीं पहुंचे. ये भी आरोप सामने आए कि टिकट के लिए पैसे लिए गए थे, प्रत्याशी की क़ाबिलियत और क्षमता को परखा नहीं गया था. कुछ कॉल रिकॉर्डिंग भी वायरल हुईं. कहा गया कि ये मायावती और नसीमुद्दीन के बीच की बातचीत है. इसके बाद मई 2017 में मायावती ने नसीमुद्दीन को पार्टी से निष्कासित कर दिया.

दयाशंकर की मां तेतरा देवी की ओर से दर्ज कराए गए मामले की पुलिस जांच चलती रही. सूबे का निज़ाम बदल गया, तो सरकारी अमलों के तेवर में परिवर्तन अपेक्षित था. इस मामले में नसीमुद्दीन और बाक़ी आरोपी ज़मानत पर बाहर थे. फिर 12 जनवरी 2018 को यूपी पुलिस ने आईपीसी की धारा 506, 509, 153ए, 34, 149 और POCSO एक्ट की धारा 11 (1) के तहत चार्जशीट दायर कर दी. एमपी-एमएलए कोर्ट में. इस चार्जशीट में मायावती का नाम नहीं था. बाकी आरोपियों के खिलाफ कोर्ट ने 13 जनवरी को समन जारी कर दिया. सभी आरोपियों को कोर्ट तलब किया गया. आरोपी कोर्ट में नहीं आए. मामले की सुनवाई नहीं हो सकी. आरोप तय नहीं किए जा सके.

पार्क बनने का सारा काम नसीमुद्दीन ही देखते थे.
मायावती से कार्यकाल में उनके पार्क बनने का सारा काम नसीमुद्दीन ही देखते थे.

कोर्ट में अगली डेट लगी. ख़बरें बताती हैं कि अगली तारीख़ को भी नसीमुद्दीन और बाक़ी आरोपी कोर्ट नहीं पहुंचे. ऐसे ही कुछ तारीखें बीत गयीं. कोर्ट का नोटिस ख़ाली जाता रहा. आरोपी कोर्ट से नदारद. हर बार कोर्ट के सामने हाज़िरी से माफ़ी की अर्ज़ी दे दी जाती थी. कोर्ट स्वीकार कर लेती थी. अगली डेट लग जाती थी.

ऐसे करते हुए समय बीतता रहा. फिर आई 22 सितम्बर 2020 की तारीख. कोर्ट ने नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और अन्य आरोपियों के खिलाफ़ गिरफ़्तारी वॉरंट जारी कर दिया. विशेष जज पवन कुमार राय ने ख़ासी नाराज़गी दिखाई. कहा कि त्रुटिवश हाज़िरी माफ़ी की अर्ज़ी स्वीकार की जाती रही. इसकी वजह से अभी तक इस वजह से आरोपियों के खिलाफ़ आरोप तय नहीं हो पाए हैं.

ख़बरें बताती हैं कि इस वॉरंट के बाद अन्य तीन आरोपी मेवालाल गौतम, अतर सिंह राव और नौशाद अली तो कोर्ट में पेश हो गए. लेकिन नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और रामअचल राजभर ने इस बार भी वही काम किया. कोर्ट में पेश नहीं हुए. हाज़िरी माफ़ी और तारीख़ आगे बढ़ाने की अर्ज़ी दे दी. फिर अगली सुनवाई में भी नहीं आने पर कोर्ट ने दोनों को भगोड़ा घोषित कर दिया. लगा कि अब तो नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी और रामअचल कोर्ट में आयेंगे. लेकिन फिर भी नहीं आए.

इसके बाद तो जो हुआ, वो सभी जानते हैं. 18 जनवरी 2021 को कोर्ट ने एक ऑर्डर पास किया. नसीमुद्दीन और रामअचल की सम्पत्ति कुर्क करने का आदेश. कुर्की का आदेश आते ही नसीमुद्दीन और रामअचल राजभर भागे-भागे 19 जनवरी को कोर्ट पहुंचे. कोर्ट पहुंचने से पहले ही दोनों ने अंतरिम ज़मानत की याचिका भी डाल रखी थी. लेकिन कोर्ट ने सख़्त रवैया अपनाया. ज़मानत याचिका पर सुनवाई टाल दी. दोनों को अरेस्ट करके जेल भेजने का आदेश जारी कर दिया.


वीडियो : BSP अध्यक्ष मायावती के बाद कौन होगा उनका सियासी वारिस, जवाब मिला पर कितना सही?

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