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नवरात्र पर उन 9 महिलाओं की कहानी जिन्होंने वास्तविक जीवन में शक्ति दिखाई

आज दुर्गा नवमी है. यानी नवरात्र का आखिरी दिन. नवरात्री में 9 दिन देवी के 9 रूपों की पूजा की जाती है. अन्याय के खिलाफ लड़ाई के प्रतीक के तौर पर देवी की शक्ति को पूजा जाता है. आज हम भारत की उन 9 महिलाओं की शक्ति की बात करेंगे, जिन्होंने ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाई है, या कड़े संघर्ष से गुजकर देश का मान-सम्मान बढ़ाया. पिछले नवरात्र से इस नवरात्र तक तक सालभर में जिन महिलाओं ने अपनी शक्ति से सुर्खियां बटोरी हैं, हम उनकी बात करेंगे.

सीमा ढाका

Seema Dhaka
दिल्ली पुलिस ने सीमा की उपलब्धि को ट्वीट करके बताया और तारीफ की थी.

दिल्ली पुलिस की हेड कॉन्स्टेबल जिन्हें पिछले साल नवंबर में आउट ऑफ टर्न प्रमोशन देकर असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर बनाया गया था. हेड कॉन्स्टेबल रहते सीमा ढाका ने सिर्फ ढाई महीने में 76 मिसिंग बच्चों को ढूंढ निकाला था. देश में हर रोज़ करीब 200 बच्चे गायब होते हैं. इनमें से ज्यादातर नहीं मिल पाते. हम जानते हैं कि पुलिस के लिए भी ये बहुत गंभीरता वाला विषय नहीं होता है. लेकिन सीमा ढाका ने इस समस्या को समझा. नौकरी के तय घंटों के बाद भी दिन रात जुटकर उन्होंने एक मिशन की तरह बच्चों को ढूंढना शुरू किया. सीमा ढाका ने एक इंटरव्यू में बताया था कि शुरू में उन्होंने 5-6 बच्चों को खोजा था. जब वे बच्चे अपने मां-बाप से मिले, उनके चेहरों पर जो खुशी देखी, वहां से प्रेरणा मिली कि जितने बच्चों को ढूंढा जा सके, ढूंढा जाना चाहिए. सीमा ने बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में दिल्ली से गायब हुए बच्चों को खोज निकाला. सीमा ढाका ने 76 बच्चों को ड्रग या देह व्यापार जैसे अपराधों की तरफ धकेले जाने से बचाया है.

फातिमा तहीलिया

Fatima

केरल के कोझिकोड से ताल्लुक रखती हैं. पेशे से वकील हैं. फातिमा केरल में मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन यानी MSF की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष थीं. MSF केरल की राजनैतिक पार्टी- इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग का छात्र संगठन है. MSF की महिला विंग, जिसका नाम है हरिता, इससे जुड़ी कुछ लड़कियों ने संगठन के पुरुषों पर उत्पीड़न और अभद्रता का आरोप लगाया था. फातिमा ने पीड़ित लड़कियों के पक्ष में आवाज़ उठाई. लेकिन पार्टी ने अनुशासनहीनता का आरोप लगाते हुए हरिता को बंद कर दिया. हालांकि फातिमा पार्टी के दबाव में चुप नहीं रही, वो ये मुद्दा उठाती रहीं. फिर महिला आयोग के निर्देशों पर पुलिस ने आरोपियों पर कार्रवाई की. गिरफ्तारी भी हुई. एक रूढ़िवादी परिवार से आने वाली फातिमा अब महिला अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रही हैं. अपने समाज के भीतर महिलाओं को बराबरी का हक दिलाने के लिए सुधारवादी विचार वो लोगों तक पहुंचा रही हैं.

मेघा राजगोपालन

Megha Rajagopalan की परवरिश अमेरिका के मैरीलैंड हुई. वे मूल तौर पर तमिलनाडु की हैं. (फोटो: ट्विटर)
Megha Rajagopalan की परवरिश अमेरिका के मैरीलैंड हुई. वे मूल तौर पर तमिलनाडु की हैं. (फोटो: ट्विटर)

उइगर मुसलमानों को नजरबंद रखने वाले चीन के डिटेंशन कैंप में जाने वाली पहली पत्रकार हैं. अपनी साहसिक रिपोर्ट्स के लिए पुलित्जर पुरस्कार जीतने वाली महिला. मेघा राजगोपालन मूल रूप से तमिलनाडु की हैं. अभी लंदन में रहती हैं. पढ़ाई उनकी अमेरिका से हुई. बज़फीड मीडिया ऑर्गेनाइजेशन के लिए रिपोर्ट करती हैं. मेघा ने चीन के शिनजियांग प्रांत के डिटेंशन कैंप में कैद, उइगर मुस्लिमों पर रिपोर्ट्स की एक सीरीज की थी. मेघा की इन रिपोर्ट्स की बहुत तारीफ हुई. जब चीन की एजेंसियों पत्रकारों को उइगर मुस्लिमों के कैंप्स तक जाने तक नहीं दे रही थीं, तब मेघा ने वहां जाकर उनकी हालत दुनिया को दिखाई. इन रिपोर्टस् के लिए ही मेघा को पुलित्जर पुरस्कार दिया गया.

ब्रिगेडियर एसवी सरस्वती

Sv Sarswati
Sv Sarswati

बतौर नर्स आर्मी में सेवा देने वाली महिला. 3000 हजार से ज्यादा लोगों की जान बचाने के ऑपरेशन्स में शामिल रहीं हैं. ब्रिगेडियर एसवी सरस्वती को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रीय फ्लोरेंस नाइटेंगल पुरस्कार से सम्मानित किया है. ये पुरस्कार नर्सिंग में बेहतरीन सेवा देने वाली नर्सों को दिया जाता है. ब्रिगेडियर सरस्वती आंध्र प्रदेश के चित्तूर ज़िले से आती हैं. वो मिलिट्री नर्सिंग सर्विसेस (MNS) में 28 दिसंबर, 1983 को कमीशन हुई थीं. 35 साल से ज़्यादा वक्त तक उन्होंने सेना में काम किया. बतौर ऑपरेशन थिएटर नर्स उन्होंने 3000 से अधिक आपातकालीन और लाइफ़-सेविंग सर्जरी में हिस्सा लिया है. उन्होंने हज़ारों रेसिडेंट्स और नर्सेस को ट्रेन किया है. बेसिक लाइफ सपोर्ट में एक हज़ार से अधिक सैनिकों और परिवारों को उन्होंने ट्रेन किया. उन्होंने रोगी शिक्षण सामग्री और कार्डियक सर्जरीके लिए इंप्रोवाइज्ड ड्रेस किट्स और घाव सीने के लिए धागे तैयार किए हैं. इसलिए उन्हें कई बार सम्मानित किया गया है.

डॉ सौम्या स्वामीनाथन

सौम्या विश्वनाथन (फोटो: रॉयटर्स)
सौम्या विश्वनाथन (फोटो: रॉयटर्स)

कोरोना शुरू होने के बाद से इनका नाम हमने खूब सुना है. भारत में हरित क्रांति के जनक कहे जाने वाले एमएस स्वामीनाथन की बेटी हैं सौम्या. अभी WHO यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन की चीफ साइंटिस्ट हैं. कोरोना से दुनिया को कैसे निपटना है, इस बारे में WHO की जो भी गाइडलाइंस आती थीं, उसमें सौम्या स्वामीनाथन की बड़ी भूमिका होती थी. जब दुनिया ने कोरोना के दौरान WHO की भूमिका पर सवाल उठाए तो सौम्या विश्वनाथन ने मजबूती से WHO का डिफेंड किया. डॉ सौम्या बाल रोग विशेषज्ञ हैं और टीबी खत्म करने के अभियान में भी उनकी बड़ी भूमिका रही है.

सिरिशा बंडला

Sirisha Bandla भारतीय मूल की तीसरी महिला हैं, जिन्होंने अंतरिक्ष यात्रा की. (फोटो: ट्विटर)
Sirisha Bandla भारतीय मूल की तीसरी महिला हैं, जिन्होंने अंतरिक्ष यात्रा की. (फोटो: ट्विटर)

कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स के बाद अंतरिक्ष यात्रा पर जाने वाली भारतीय मूल की महिलाओं में नया नाम जुड़ा सिरिशा बंडला का. उन्होंने इस साल जुलाई में अमेरिकी कारोबारी रिचर्ड ब्रैन्सन के साथ अंतरिक्ष यात्रा की. रिचर्ड ब्रैन्सन वर्जिन ग्रुप के फाउंडर हैं. रिचर्ड अपने साथ सिरिशा के अलावा चार और लोगों को अंतरिक्ष यात्रा पर ले गए थे. सिरिशा का जन्म आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में हुआ था. चार साल की उम्र में वह भारत से अमेरिका चली गईं. टेक्सस के ह्यूस्टन में उनकी परवरिश हुई. शुरुआती पढ़ाई के दौरान ही उनका रुझान अंतरिक्ष की तरफ बढ़ता गया. बाद में उन्होंने साल 2011 में परड्यू यूनिवर्सिटी से एरोनॉटिक्स एंड एस्ट्रोनॉटिक्स में बैचलर्स डिग्री हासिल की. सिरिशा जानी मानी स्पेस एजेंसी नासा का हिस्सा बनना चाहती थीं. लेकिन आंखों में दिक्कत की वजह से उनका यह सपना पूरा नहीं हुआ. साल 2015 में उन्होंने वर्जिन गैलैक्टिक कंपनी ज्वाइन की. यहां वो गवर्नमेंट अफेयर्स की वाइस प्रेजिडेंट हैं. और यहीं सिरिशा को बतौर रिसर्चर अंतरिक्ष में भेजा गया.

अवनि लेखरा

Avni Gold
अवनि लखेरा ने भारत को शूटिंग में दिलाया पहला पैरालंपिक्स गोल्ड मेडल (ट्वीटर फ़ोटो)

पैरालिम्पिक्स में भारत के लिए पहला गोल्ड लाने वाली 19 साल की निशानेबाज़. अवनि चल फिर नहीं सकती. 9 साल से व्हीलचेयर पर है. व्हीलचेयर पर ही प्रैक्टिस की. और टोक्यो में व्हीलचेयर से ही गोल्ड पर निशाना लगाकर पूरे भारत को गर्व करने का मौका दिया है. टोक्यो पैरालिम्पिक्स में अवनि ने कुल दो मेडल जीते. 2012 में जयपुर में एक कार हादसे में अवनि बुरी तरह जख्मी हो गई थीं. जान तो बच गई लेकिन रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी. और इस वजह से कमर के नीचे वाला हिस्सा सुन्न हो गया था. पैरों ने काम करना बंद कर दिया. डॉक्टर्स ने कह दिया कि अब ये कभी अपने पैरों पर खड़ी होकर चल-फिर नहीं पाएगी. अवनि को अब पूरी ज़िंदगी व्हीलचेयर पर गुज़ारनी थी. एक्सिडेंट के बाद अवनि पूरी तरह से टूट चुकी थी. चुप रहने लगी थी, डिप्रेशन में चली गई थी. इतनी कमज़ोर हो गई थी कि कुछ नहीं कर पाती थी. इस हालत से बाहर निकालने के लिए अवनि के पिता चाहते थे कि वो किसी स्पोर्ट्स में इंवॉल्व हो, ताकि उसका कहीं तो मन लगे. तीरंदाज़ी के लिए अवनि को लेकर गए, लेकिन वो प्रत्यंचा भी नहीं खींच पाती थी. और फिर 2015 में पिता अवनि को शूटिंग रेंज लेकर गए. ये अवनि को जम गया. और ये सफर फिर 2021 में टोक्यो पैरालिम्पिक्स में पॉडियम पर खड़े होकर राष्ट्रगान बजवाने तक पहुंचा.

रानी रामपाल

तस्वीर: PTI
भारतीय हॉकी टीम की कप्तान. तस्वीर: PTI

भारतीय हॉकी टीम की कप्तान हैं रानी रामपाल. जिस तरह के पृष्ठभूमि से निकलकर रानी ने हॉकी में अपनी पहचान बनाई है, वो मिसाल दिए जाने लायक है. रानी कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद में जन्मीं. पिता रामपाल तांगा चालक थे. परिवार की हालत इतनी खराब थी कि रानी को दूसरों के घरों में काम करना पड़ता था. अपने घर के पास की अकेडमी में बच्चों को खेलते देख रानी का मन भी हॉकी खेलने का होता, लेकिन उनके घरवालों की इतनी हैसियत नहीं थी कि उन्हें हॉकी का साजो-सामान दिला पाएं. उसने टूटी हॉकी स्टिक से खेलना शुरू किया. एक दिन अकेडमी के कोच की नज़र रानी पर पड़ गई. कोच ने रानी के टैलेंट को प्लेटफॉर्म दिया. और उसके बाद जो सफर शुरू हुआ, उसने भारतीय हॉकी टीम को नई बुलंदी पर पहुंचाया है

आशा कंडारा

Asha Kandara ने साल 2016 में RAS की तैयारी करना शुरू किया था. उनका कहना है कि मेहनत करने वाले सफल जरूर होते हैं. (फोटो: इंडिया टुडे)
Asha Kandara ने साल 2016 में RAS की तैयारी करना शुरू किया था. उनका कहना है कि मेहनत करने वाले सफल जरूर होते हैं. (फोटो: इंडिया टुडे)

आखिर में हम उस महिला की बात करना चाहते हैं, जिसकी उपलब्धि शायद आपको ज्यादा बड़ी ना लगे, लेकिन उसकी कहानी प्रेरणादायी है. आशा कंडारा. जुलाई 2021 से पहले इनका नाम हमने नहीं सुना था. राजस्थान के जोधपुर नगर निगम में एक सफाई कर्मचारी थीं. पति ने 8 साल पहले छोड़ दिया था. दो बच्चों को पालना था, इसलिए पैसे कमाने के लिए जो रोज़गार मिला, किया. लेकिन वो ये साबित करना चाहती थीं कि पति के बिना भी एक महिला का वजूद है, उसकी स्वतंत्र पहचान है. पति के ज़ुल्म सहने के बजाय वो अपना अलग रास्ता खुद भी बना सकती हैं. आशा कंडारा ने राजस्थान प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी की. और 40 साल की उम्र में इस बार कामयाब रहीं. अभी वो डिप्टी कलेक्टर हैं.

ऐसी कई और कहानियां हमारे बीच हैं. ये महिलाएं भी अन्याय के खिलाफ लड़ रही हैं, संघर्ष कर रही हैं, किसी रूप में देवी भी हैं. मूर्तियों वाली देवी पूजने के साथ साथ हमें महिलाओं की भी उतनी ही कद्र और सम्मान करना चाहिए. महिलाएं किसी मायने में पुरुषों से कम नहीं हैं.


दी लल्लनटॉप शो: नवरात्र पर उन 9 महिलाओं की कहानी जिन्होंने वास्तविक जीवन में शक्ति दिखाई

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