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वो मुस्लिम लड़का जो कभी नास्तिक था और अपने से दुगुनी उम्र के लड़कों को पढ़ाता था

पूरा नाम अबुल कलाम मुहिउद्दीन अहमद आज़ाद था. कांग्रेस के बड़े नेता थे. 1992 में उन्हें भारत रत्न मिला. उर्दू में शायरी लिखते थे. जर्नलिस्ट थे. उनका अखबार था अल-हिलाल.अंग्रेजों के खिलाफ जमकर लिखते थे. गांधी जी से प्रभावित थे. खिलाफत आन्दोलन के नेता रहे. 35 साल के थे तब कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए. 1935 में. पहले शिक्षा मंत्री थे. आज का दिन नेशनल एजुकेशन डे के रूप में मनाया जाता है.

छोटे में विद्रोही थे. पिता से खूब सवाल पूछते थे. सर सैयद के फैन थे और उनके अब्बा उनसे चिढ़ते थे. सितार बजाते थे लेकिन उनके अब्बा इससे भी कुढ़े रहते थे. धीरे-धीरे आज़ाद नास्तिक भी हो गए थे. भौतिकवादी थे. हर चीज पर शक करते थे.

बड़े हुए तो इस्लाम की ओर लौट आए. कहते थे धर्म में, साहित्य में, राजनीति में या दर्शन की तरफ, कहीं भी जाऊंगा तो अपने मन से जाऊंगा और अकेले जाऊंगा. आस्था के लिए भी रीजनिंग यानी इज्तिहाद की बात करते थे.

गांधी, पटेल और आज़ाद

उनकी लिखी चिट्ठियों के कलेक्शन का नाम गुबार-ए-खातिर है. जब अहमदनगर जेल में कैद थे तब उन्होंने ये चिट्ठियां लिखी थीं. इसमें उन्होंने कुछ दिलचस्प चीजों के बारे में बात की है. जैसे चाय उनकी कमजोरी थी. उन्हें चाइनीज जैस्मिन टी बहुत पसंद थी. लेकिन कहते थे इसका स्वाद मेरे अलावा कोई बर्दाश्त नहीं कर सकता. कहते थे कि दूध, चीनी वाली जिस चाय की आदत अंग्रेजों ने लगा दी है वो असल में चाय ही नहीं है. नेहरु भी जो चाय पीते हैं उसे काली चाय कहा जा सकता है लेकिन चाय नहीं. टेनिस का रेफरी बनने में उन्हें मजा आता था.

चिट्ठियों में एक जगह लिखते हैं कि सबसे बुद्धिमान आदमी कौन है. सबसे बुद्धिमान वो है जो सबसे ज्यादा खुश है.

आज़ाद कई भाषाओं के ज्ञाता थे. जब बारह साल के थे तभी एक लाइब्रेरी खोली थी. डिबेट करने के लिए एक सोसाइटी भी बनाई. मैगजीन में इनके आर्टिकल तभी छपते थे. अपनी खुद की एक मैगजीन शुरू की थी. लिसान-उस-सिदक. एक कविताओं का जर्नल निकाला था. नैरंग-ए -आलम. चौदह साल की उम्र में अपने से दुगुनी उम्र के छात्रों को पढ़ाते थे. तेरह साल की उम्र में जुलेखा से निकाह हुआ.

एजुकेशन सिस्टम की खूब बात की उन्होंने. जब शिक्षा मंत्री थे तब शिक्षा व्यवस्था को ठीक करने में आगे रहे. नेहरु के ख़ास सलाहकार थे. आज के बहुत से कॉलेज, यूनिवर्सिटी उन्हीं के समय की देन हैं. मदरसा व्यवस्था के बारे में कड़ा रुख रखते थे. कहते थे ये व्यवस्था वक्त से पीछे चल रही है. विभाजन के बाद हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काफी लड़ाई लड़ी. जब दंगों में देश सुलग रहा था तब वो घूम-घूम कर शान्ति की बात कर रहे थे.

मौलाना आज़ाद की आवाज़ यहां सुनें-


ये स्टोरी निशान्त ने की है.


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