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34 साल पहले हुए इस पीएम की हत्या का केस अब जाकर सुलझा है?

ये बात 34 साल पुरानी है. 1986 की फरवरी का आख़िरी दिन, 28 तारीख़. स्वीडन में ये हफ़्ता ‘स्पोर्ट्सलोव’ का था. स्पोर्ट्सलोव माने, छुट्टी का वो सप्ताह जब लोग पहाड़ों पर जाकर स्कीइंग जैसे बर्फ़ से जुड़े खेल खेलते हैं. बाकी लोगों की तरह स्वीडन के प्रधानमंत्री ओलॉफ़ पाल्मे भी छुट्टी मनाने के मूड में थे. सुबह उन्होंने अपने दोस्त हैरी के साथ टेनिस खेला. बाज़ार गए. और फिर वहां से होते हुए वक़्त पर अपने दफ़्तर पहुंच गए. यहां पहुंचकर ओलॉफ़ ने अपने बॉडीगार्ड्स को छुट्टी दे दी. कहा- अभी जाओ, ज़रूरत पड़ी तो बुला लूंगा. बॉडीगार्ड्स को यूं छुट्टी दे देना नॉर्मल था ओलॉफ़ के लिए. वो अक़्सर ऐसा करते थे. उन्हें सड़कों पर बिना सिक्यॉरिटी के घूमना, आम लोगों के बीच आम इंसानों की तरह रहना, उनसे घुलना-मिलना बहुत अच्छा लगता था.

सर्द रात. सूनी सड़क. पैगल घर लौटता प्रधानमंत्री
दफ़्तर में भी उनका दिन सामान्य रहा. अधिकारियों, पत्रकारों से मुलाकात. ज़रूरी मीटिंग्स. सब नॉर्मल था. दोपहर का खाना. सब हुआ. फिर ओलॉफ़ ने घर फोन करके पत्नी लिस्बेथ से पूछा, फिल्म चलोगी. उधर से हां में जवाब मिला. शाम हुई, ओलॉफ़ ने दिन का काम ख़त्म किया और टहलते हुए अकेले ही अपने घर पहुंच गए. शाम के करीब साढ़े आठ बजे होंगे, जब ओलॉफ़ और लिस्बेथ तैयार होकर सिनेमा देखने निकले. उन्होंने लोकल ट्रेन पकड़ी रोदमान्सगातन स्टेशन पर उतर गए. फिर पैदल-पैदल दोनों पहुंचे ग्रैंड सिनेमा, जहां ‘द ब्रदर्स मोज़ार्ट’ नाम की फिल्म लगी थी. एकदम हाउसफुल था हॉल. वो तो अच्छा हुआ कि टिकट काउंटर वाले ने प्रधानमंत्री को पहचान लिया और उन्हें किसी तरह दो टिकटें दे दीं. यहां उन्हें अपना बेटा मार्टन और उसकी गर्लफ्रेंड भी मिल गए. रात करीब 11 बजे फिल्म ख़त्म हुई. ओलॉफ़ बाहर निकले. फरवरी की सर्द रात, ठंडी हवा, करीब माइनस सात टेम्परेचर, सुनसान सड़क और उसपर चल रहे गिने-चुने लोग. लिस्बेथ तो ट्रेन पकड़ने को कह रही थीं. मगर ओलॉफ़ को जाने क्या सूझी, कहा पैदल चलो न.

Olaf And Lisbeth Palme
स्वीडन के पूर्व पीएम ओलॉफ़ पाल्मे अपनी पत्नी लिस्बेथ के साथ (फोटो: एपी)

अब ओलॉफ़ और लिस्बेथ स्वीयावेगन स्ट्रीट पहुंच गए थे. सड़क पर बिछी बर्फ़ की पतली चादर पर ओलॉफ़ और लिस्बेथ चले जा रहे थे. कुछ दूरी पर आगे एक लंबा सा ओवरकोट पहने हुए एक आदमी बहुत देर से इधर-उधर देख रहा था. मानो किसी का इंतज़ार कर रहा हो. ओलॉफ़ और लिस्बेथ को अपनी दिशा में आते देखकर वो जैसे खुश हो गया. वो उनकी तरफ बढ़ा. इस वक़्त घड़ी में बजे थे रात के 11.21. ओवरकोट वाले आदमी ने पीछे की तरफ से लपककर ओलॉफ़ का कंधा पकड़ा. उसका एक हाथ ओलॉफ़ के कंधे पर था और दूसरे हाथ से उसने अपनी जेब में रखी एक पिस्तौल- पॉइंट 357 मैगनम हैंडगन निकाली. इससे पहले कि ओलॉफ़ कुछ समझ पाते, उस ओवरकोट वाले शख्स ने ओलॉफ़ की पीठ में धायं-धायं दो गोलियां दाग दीं. ओलॉफ़ ज़मीन पर गिरे. इस बीच उस आदमी ने लिस्बेथ को भी एक गोली मारी (जो कि जानलेवा साबित नहीं होने वाली थी). फिर वो कुछ सेकेंड तक वहां खड़ा रहा, मानो ओलॉफ़ के मरने की तस्दीक कर रहा हो. और फिर वो दौड़ने लगा.

किस तरफ दौड़ रहा था वो?
ये जानने के लिए आपको इस क्राइम सीन का नक्शा समझना होगा. जिस जगह पर ये हत्या हुई, वो स्वीयावेगन स्ट्रीट और टनलगाता के इंटरसेक्शन के पास थी. यहां से दाहिनी तरफ एक गली निकलती है. जो कुछ दूर आगे जाकर एक छोटे से टनल के पास पहुंचती है. यहां टनल के ठीक ऊपर बनी हैं 89 सीढ़ियां, जिसपर चढ़कर आप ऊपर की तरफ बनी ब्रंकेबर्ग रिज़ वाली सड़क पर पहुंच जाएंगे. वहां से आगे बढ़ने पर आपको पहाड़ी की ढलान वाला रास्ता मिलेगा. ओवरकोट पहने हुए वो हत्यारा पूरी रफ़्तार में इन्हीं 89 सीढ़ियों को पार करता सबकी नज़रों से गुम हो गया.

वो 89 सीढ़ियां…
28 फरवरी, 1986 की वो रात. एक रहस्यमय हत्यारा. 89 सीढ़ियां. सड़क किनारे बर्फ़ पर बिखरा ताज़ा गर्म खून और वहां पड़ी देश के प्रधानमंत्री की लाश. ये तस्वीर 20वीं सदी के सबसे मिस्टीरियस, सबसे हाई-प्रोफ़ाइल अपराधों में से एक का क्राइम सीन थी. वो क्राइम सीन, जहां हत्या की ख़बर पाते ही दर्ज़नों लोग पहुंच जाने वाले थे. उनकी मौजूदगी से इस क्राइम सीन पर मौजूद अहम सुराख़ भी मिट जाने वाले थे. ये बहुत बड़ा ब्लंडर था, जो इस केस में आगे बहुत भारी पड़ने वाला था. मगर तब शायद किसी को इसकी भनक नहीं थी. वजह शायद ये थी कि इस तरह के अपराध कल्पना स्वीडन में किसी ने नहीं की थी. न ही पुलिस और जांच एजेंसी को ऐसे केस हैंडल करने का ही कोई अनुभव था. इस अनुभवहीनता के कारण कई ग़लतियां, कई लापरवाहियां हुईं.

89 Stairs Olof Palme
89 सीढ़ियों वाला रास्ता (फोटो: मनुमय उनियाल)

क्यों मारे गए ओलॉफ़?
हत्या की जगह के आसपास मौजूद करीब 20 चश्मदीदों ने देखा था उस हत्यारे को. मगर तब भी कोई उसका चेहरा नहीं बता सका. मीडिया ने रहस्यमय हत्यारे का नाम रख दिया- फैंटम. मगर वो कौन था, किसी को नहीं पता चल रहा था? हत्या का मक़सद भी साफ नहीं था. सौ मुंह सौ बातें वाली हालत थी. कोई कहता क्या हत्या का कारण ओलॉफ़ की उदारवादी नीतियां थीं? या टैक्स की चोरी पर उनका सख़्त रवैया हत्या की वजह बना? कहीं इसके पीछे उनकी लेफ़्ट पॉलिटिक्स से नाराज़ दक्षिणपंथियों का हाथ तो नहीं? या सोवियत की आलोचना से नाराज़ KGB ने ये हत्या कराई? या कहीं इसके पीछे अमेरिका तो नहीं, जिसके वियतनाम युद्ध समेत कई अग्रेसिव नीतियों की मुखर आलोचना करते थे ओलॉफ़?

स्वीडन का कलेक्टिव ऑब्सेशन
जितने सवाल थे, उससे ज़्यादा कहानियां थीं. स्वीडन की जनता के जीवन का हिस्सा बन गया ये केस. स्वीडिश भाषा में एक शब्द है- सजुकदोम. इसका मतलब होता है, बीमारी. ओलॉफ़ की हत्या स्वीडिश जनता के बीच ऐसा ऑब्सेशन बन गई कि शब्द चल निकला- पाल्मस्सजुकदोम. यानी, पाल्मे मर्डर केस सुलझाने की बीमारी. ज़ाहिर है, इस केस को सुलझाने में तो स्वीडन ने अपनी सारी ताकत झोंक दी होगी? कुछ दिन या महीने या साल बाद हत्यारे को पकड़ भी लिया होगा?

संख्याएं. डेटा. आंकड़े.
यही सोच रहे हैं न आप. अगर हां, तो रुक जाइए और कुछ आंकड़े सुनिए. शुरुआती जांच में 40 हज़ार लोगों का नाम. पुलिस विभाग द्वारा 10 हज़ार लोगों का इंटरव्यू. एक-एक आदमी से कई-कई बार पूछताछ. चार हज़ार से ज़्यादा गाड़ियों की तफ़्तीश. एक-के-बाद एक न जाने कितने जांच अधिकारी. पुलिस से इतर इस पहेली को सुलझाने में लगे दर्ज़नों प्राइवेट जासूस, पत्रकार और इस केस को सुलझाने के लिए पुलिस की नौकरी छोड़कर दिन-रात क्लू की तलाश में जान भिड़ाते लोग. और इन सबसे ऊपर वो 134 लोग, जिन्होंने हत्या करने की बात कबूली. इनमें से 29 तो ऐसे थे, जिन्होंने ख़ुद पुलिस के पास आकर कहा कि हमने की है हत्या. ये अलग बात है कि उनमें से कोई भी असली हत्यारा नहीं था. साल-दर-साल जांच चलती रही. स्वीडन के अंदर, स्वीडन के बाहर. जांचकर्ता घूमते रहे- देश परदेस. इतनी लंबी और विस्तृत जांच हुई कि इससे जुड़ी फाइलें जिन दराजों में रखी हैं, उनका इलाका करीब 250 मीटर, यानी एक किलोमीटर के चौथाई हिस्से को घेरता है.

इतनी लंबी जांच का ये नतीजा!
जांच के इन आंकड़ों के एक तरफ है 28 फरवरी, 1986 की वो रात. और दूसरी तरफ है 34 साल और सवा तीन महीने बाद आया 10 जून, 2020 का दिन. क्या हुआ इस दिन? इस दिन स्वीडन के चीफ प्रॉसिक्यूटर क्रिस्टर पीटरसन ने प्रधानमंत्री ओलॉफ़ पाल्मे की हत्या का केस बंद करने का ऐलान कर दिया. क्यों? क्योंकि जांच एजेंसी जिस स्टिग इन्गस्ट्रोम नाम के आदमी को हत्यारा मान रही है, वो मर चुके हैं. उन्होंने साल 2000 में आत्महत्या कर ली थी. स्वीडिश प्रॉसिक्यूशन अथॉरिटी के मुताबिक, इन्गस्ट्रोम को हत्यारा मानने की मुख्य वजहें ये हैं-

चश्मदीदों ने हत्यारे से जुड़े ब्योरे दिए, वो इन्गस्ट्रोम की कदकाठी से मेल खाते हैं.
हत्या के समय इन्गस्ट्रोम वारदात वाले इलाके में मौजूद था.
हत्या वाले दिन वो कहां था, इससे जुड़े जो ब्योरे उसने दिए वो बाकी डिटेल्स से मेल नहीं खाते.
इन्गस्ट्रोम हथियारों का इस्तेमाल जानते थे और वो ओलॉफ़ की नीतियों के विरोधी भी थे.

Stig Engstrom
संदिग्ध स्टिग इन्गस्ट्रोम (फोटो: एपी)

मर्डर वेपन कहां है?
इन आरोपों और संदेहों से इतर जांच एजेंसी के पास इन्गस्ट्रोम के खिलाफ क्या सबूत हैं? जवाब है- कुछ भी नहीं. पुलिस आज तक हत्या में इस्तेमाल हुई पिस्तौल नहीं खोज सकी. फिर ये भी सवाल है कि क्या राजनैतिक विरोध के कारण एक आदमी इस तरह प्लानिंग करके प्रधानमंत्री की हत्या कर देगा? अगर प्लानिंग की भी, तो उसे कैसे पता था कि उस रात ओलॉफ़ पाल्मे उस सड़क से होकर गुजरने वाले हैं? हत्या करके उसे हासिल क्या होने वाला था? जांच एजेंसी कह रही है कि इन्गस्ट्रोम ने अकेले ही सारी प्लानिंग की. मगर लोगों को ये बात भी हजम नहीं हो रही है.

पहले भी आया था इन्गस्ट्रोम का नाम
ऐसा भी नहीं कि इन्गस्ट्रोम का नाम पहली बार सामने आया हो. जब वो ज़िंदा थे, तब कई बार पूछताछ हुई उनसे. मगर सबूत नहीं मिले, तो उन्हें छोड़ दिया गया. अब उसी जांच सिस्टम ने बिना किसी नई जानकारी के उन्हीं पुराने सबूतों के आधार पर इन्गस्ट्रोम को दोषी बताकर केस बंद कर दिया है. प्रॉसिक्यूशन का निष्कर्ष कितना खोखला है, इसका अंदाज़ा आप 10 जून को चीफ प्रॉसिक्यूटर द्वारा दिए गए बयान की ये पंक्ति सुनकर लगा लीजिए. ये लाइन कुछ इस तरह है-

मेरे विचार से स्टिग इन्गस्ट्रोम मुख्य संदिग्ध है.

मतलब इन्गस्ट्रोम अब भी केवल संदिग्ध ही हैं. उनके ऊपर संदेह पैदा करने के कारण सरकमस्टैनशल, यानी परिस्थितिजन्य हैं.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

नंबर वन-
स्वीडन में भी लोग बड़े ज़ोर से इन कमियों को पॉइंट कर रहे हैं. लोग क्या कह रहे हैं, इसका आइडिया देने के लिए हम आपको स्वीडन की कुछ बड़ी हस्तियों की राय बताते हैं. वहां की एक बड़ी पत्रकार हैं- लेना मेलिन. उन्होंने प्रॉसिक्यूशन एजेंसी की आलोचना करते हुए अपने कॉलम में लिखा है-

पिछली सदी के सबसे अहम हत्याकांड की जांच जिस मूर्खता से की गई, वो ख़ौफनाक है. इस मर्डर केस की जांच और इससे जुड़ी संदिग्धता ने स्वीडन की छवि पर खरोंच लगाई है. पुलिस की जांच में जितनी ग़लतियां की जा सकती थीं, उतनी ग़लतियां की गईं.

नंबर टू-
स्वीडन से आई दूसरी प्रमुख राय है वहां के मशहूर क्रिमिनोलॉजिस्ट और प्रफेसर लीफ पेरसन की. लीफ काफी समय से ओलॉफ़ मर्डर केस को फॉलो कर रहे हैं. इस केस में वो एक अथॉरिटी माने जाते हैं. स्वीडन के TV4 चैनल पर एक लाइव ब्रॉडकास्ट के दौरान लीफ पेरसन ने इस मामले में अपनी राय कुछ इस तरह दी-

चीफ प्रॉसिक्यूटर ने जो बताया, वो ओलॉफ़ मर्डर केस का समाधान नहीं देता. ये बहुत निराशा की स्थिति है. जांच एजेंसी कुछ भी ठोस पेश नहीं कर पाई. वो बस क्या हुआ होगा, इससे जुड़ा अपना नज़रिया बता रहे हैं हमें. चीफ प्रोसिक्यूटर की प्रेस कॉन्फ्रेंस बहुत निराश करने वाली थी. इन्गस्ट्रोम ने मर्डर किया होगा, इस आशंका को खारिज़ नहीं कर सकते हम. मगर उसी ने मर्डर किया है, ये भी पुख़्ता तरीके से नहीं कहा जा सकता है.

Leif G. W. Persson Lena Mellin
क्रिमिनोलॉजिस्ट लीफ पेरसन और पत्रकार लेना मेलिन (फोटो: ट्विटर)

जो मर गया, उसको मर्डरर कैसे कह सकते हैं?
प्रफेसर लीफ पेरसन ने एक और ज़रूरी बात कही. उन्होंने कहा कि इन्गस्ट्रोम अब इस दुनिया में नहीं हैं. ऐसे में बिना पुख़्ता सबूतों, बिना किसी अदालती प्रक्रिया के इन्गस्ट्रोम को हत्यारा कहना ग़लत है. न प्रॉसिक्यूशन अदालत में उनपर आरोप सिद्ध कर सकता है. न इन्गस्ट्रोम अपना बचाव कर सकते हैं. ऐसे में जांच एजेंसी द्वारा दिया गया अधूरा निष्कर्ष एक मर चुके इंसान का नाम, उसके परिवार की छवि ख़राब कर सकता है.

ओलॉफ़ के परिवार ने क्या कहा?
ओलॉफ़ की पत्नी लिस्बेथ अब इस दुनिया में नहीं हैं. उन्हें क्रिस्टर पैत्रसॉन नाम के एक आदमी पर शक़ था. पैत्रसॉन को जानने वाले कुछ लोगों ने भी कहा था कि पैत्रसॉन हत्या करने में सक्षम है. पुलिस ने दिसंबर 1988 में उसे कस्टडी में भी लिया. मगर पैत्रसॉन से जुड़ा कोई मोटिव नहीं मिल सका पुलिस को. बावजूद इसके लिस्बेथ के बयान के आधार पर पैत्रसॉन का ट्रायल चला, उसे सज़ा मिली और उम्रकैद भी मिली. मगर फिर पैत्रसॉन के वकीलों ने सज़ा के खिलाफ अपील की. वकीलों का कहना था कि लिस्बेथ से पैत्रसॉन की पहचान करवाने के पहले ही पुलिस ने लिस्बेथ से कह दिया था कि संदिग्ध शराबी है. वकीलों का तर्क था कि पुलिस द्वारा पहले से दी गई जानकारी के कारण लिस्बेथ के हाथों हुई पैत्रसॉन की आइडेंटिफिकेशन का कोई मतलब नहीं रह जाता. अदालत ने वकीलों का तर्क माना और पैत्रसॉन को बरी कर दिया. इतना ही नहीं, उसे मुआवज़ा भी मिला. मगर आज भी कई लोग पैत्रसॉन को संदिग्ध समझते हैं. मगर ये चैप्टर अब कभी आगे नहीं बढ़ सकता. इसलिए कि पैत्रसॉन की भी मौत हो चुकी है. ओलॉफ़ के बेटे मॉरतेन आज भी इस थिअरी को दोहराते हैं. ज़्यादातर लोगों की तरह वो भी इन्गस्ट्रोम को असली हत्यारा नहीं मान पा रहे हैं.

अब शायद बहुत देर हो गई है…
ओलॉफ़ मर्डर केस की जांच प्रक्रिया इतनी ज़्यादा खिंच गई है कि जिन सवालों के जवाब अब तक नहीं मिले, वो शायद आगे भी कभी न मिलें. किसी ठोस निष्कर्ष के अभाव से उपजे वैक्यूम को शायद लोग हमेशा ही अलग-अलग कन्सपिरेसी थिअरीज़ से भरते रहेंगे. और एक बर्फीली सर्द रात में मारे गए प्रधानमंत्री, जो PM होकर भी बिल्कुल आम सी ज़िंदगी बसर करना चाहते थे, उनके मर्डर केस का फाइनल चैप्टर शायद कभी नहीं लिखा जा सकेगा. बिना शक़ ये स्वीडन जैसे प्रगतिशील और लोकतांत्रिक देश के न्यायिक सिस्टम की बड़ी हार होगी.

इस ख़बर के लिए हम स्वीडन में रहने वाले लल्लनटॉप के दोस्त और स्वतंत्र मीडिया कंसल्टेंट मनुमय उनियाल को शुक्रिया कहना चाहेंगे. उन्होंने इस मामले से जुड़े कई ब्योरे दिए हमें. और ओलॉफ़ पाल्मे की हत्या और इस केस से जुड़ी कुछ और जगहों के विडियो भी बनाकर भेजे हमें. अब आगे बढ़ते हैं और सुर्खियां देख लेते हैं.


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