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क्या है नेशनल पुलिस मेमोरियल, जिसके उद्घाटन में पीएम मोदी भावुक हो गए थे

आजादी के बाद से अब तक हमारी-आपकी सुरक्षा करते हुए केंद्र और राज्य के कुल 34,844 पुलिस के जवान शहीद हुए हैं. इन जवानों ने कश्मीर, पंजाब, असम, नगालैंड, मणिपुर और मिजोरम जैसे क्षेत्रों के अलावा नक्सलवाद और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में शहादत दी है. इन शहीदों की शहादत को सम्मान देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 अक्टूबर को राजधानी दिल्ली में नेशनल पुलिस मेमोरियल का उद्धाटन किया. 21 अक्टूबर को राष्ट्रीय पुलिस दिवस मनाया जाता है, इसलिए शहीदों के सम्मान के लिए इस दिन को चुना गया था.

क्या है नेशनल पुलिस मेमोरियल?

नेशनल पुलिस मेमोरियल देश के शहीद पुलिसवालों की निशानी है.

देश की राजधानी दिल्ली के चाणक्यपुरी में शांतिपथ के उत्तरी छोर पर 6.12 एकड़ जमीन पर केंद्र सरकार और राज्य सरकार के शहीद हुए पुलिसवालों की याद में एक मेमोरियल बना है. इसे नेशनल पुलिस मेमोरियल नाम दिया गया है. नेशनल पुलिस मेमोरियल 30 फीट ऊंचा ग्रेनाइट का एक खंभा है, जिसका वजन 238 टन है. इसका आधार 60 फीट लंबा है. इस खंभे पर अब तक शहीद हुए पुलिस और अर्धसैनिक बलों के कुल 34,844 जवानों के नाम लिखे हुए हैं. इसके अलावा यहां पर एक म्यूजियम भी बनाया गया है.

क्या-क्या है म्यूजियम में?

नेशनल पुलिस मेमोरियल में शहीद पुलिसवालों की जांबाजी के किस्से हैं. इसके लिए एक म्यूजियम भी बनाया गया है.
नेशनल पुलिस मेमोरियल में शहीद पुलिसवालों की जांबाजी के किस्से हैं. इसके लिए एक म्यूजियम भी बनाया गया है.

नेशनल पुलिस मेमोरियल में 1600 वर्गमीटर में म्यूजियम बना है. इस म्यूजियम में पांच गैलरी हैं, जिसमें देश की पुलिसिंग का इतिहास दर्ज है. 310 ईसा पूर्व कौटिल्य के जमाने से लेकर अब तक सुरक्षा कैसे होती आई है, इसे म्यूजियम में अलग-अलग स्ट्रक्चर के जरिए समझाया गया है. म्यूजियम में सबसे पहले पुलिस की रैंकिंग बताई गई है कि पुलिस में सबसे छोटा सिपाही होता है, उसके बाद हेड कॉन्सटेबल होता है, एसआई और इन्सपेक्टर होते हुए सबसे ऊंचा पद डायरेक्टर जनरल का होता है. इसी तरह म्यूजियम में केंद्रीय पुलिस बल और राज्य के पुलिसबलों के बारे में बताया गया है. राइफल, रिवाल्वर और कार्बाइन जैसे हथियार भी म्यूजियम में रखे गए हैं. पुलिस के बैंड और पुलिसबलों पर जारी डाक टिकट भी म्यूजियम में रखे गए हैं. 1600 वर्गमीटर में बने इस म्यूजियम में पुलिस के जवानों के अलावा जानवरों के भी स्क्वॉड को दिखाया गया है, जिनमें डॉग स्क्वॉड और कैमल स्क्वॉड शामिल हैं. इसके अलावा इस म्यूजियम में पुलिसबलों की शहादत को दिखाती हुई 9 कहानियां भी हैं.

कौन-कौन सी हैं वो 9 कहानियां जो पुलिसबलों की वीरता दिखाती हैं?

केंद्र और राज्य के पुलिसवालों की शहादत को दिखाते हुए इस म्यूजियम में फिलहाल 9 कहानियां दर्ज हैं.

1. 1959 में लद्दाख के हॉट स्प्रिंग में शहीद हुए 10 पुलिसवालों की कहानी

2.2002 में अक्षरधाम हमले में शहीद हुए पुलिसवालों की कहानी, जिसे ऑपरेशन वज्र शक्ति कहा जाता है.

3. 2010 में दंतेवाड़ा में हुए माओवादी हमले में शहीद हुए जवान

4. 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ के दौरान शहीद हुए पुलिसबलों के जवान

संसद पर हुए हमले की कहानी भी म्यूजियम का हिस्सा है.
संसद पर हुए हमले की कहानी भी म्यूजियम का हिस्सा है.

5. संसद पर हुए हमले के दौरान शहीद हुए जवानों की कहानियां और उनपर फिल्म

6. 1989 में शहीद हुई पहली महिला आईपीएस वंदना मलिक की कहानी

7. 2013 का ऑपरेशन पुत्तुर, जिसमें दो आतंकी एक मकान से पकड़े गए थे

8.2003 का नूरबाग एनकाउंटर, जिसमें जैश-ए-मुहम्मद का मुखिया गाजी बाबा मारा गया था

9. डकैत वीरप्पन के एनकाउंटर की कहानी

21 अक्टूबर को ही क्यों हुआ नेशनल पुलिस मेमोरियल का उद्धाटन?

नेशनल पुलिस मेमोरियल का स्तंभ.

21 अक्टूबर 1959 को चीन से लगी सीमा की सुरक्षा करते हुए 10 पुलिसवाले शहीद हो गए थे. उन्हीं की याद में हर साल 21 अक्टूबर को नेशनल पुलिस डे मनाया जाता है. इसी वजह से पीएम मोदी ने नेशनल पुलिस मेमोरियल का उद्धाटन करने के लिए 21 अक्टूबर का दिन चुना था.

क्या हुआ था 21 अक्टूबर 1959 को?

21 अक्टूबर 1959 को केंद्रीय पुलिस बल के 10 जवान बॉर्डर की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे.
21 अक्टूबर 1959 को केंद्रीय पुलिस बल के 10 जवान बॉर्डर की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे.

भारत और तिब्बत के बीच करीब 2500 मील लंबी सीमा रेखा है. पहले इस सीमा रेखा की सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्रीय पुलिस बलों की थी. 20 अक्टूबर 1959 को उत्तर पूर्वी लद्दाख में हॉट स्प्रिंग जगह पर केंद्रीय पुलिस बलों की तीन टुकड़ियों को सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था. गश्त करती हुई दो टुकड़ियां तो 20 अक्टूबर की दोपहर तक लौट आईं, लेकिन तीसरी टुकड़ी में शामिल दो पुलिस कॉन्सटेबल और एक पोर्टर नहीं लौटे. इसके बाद उन तीनों की तलाश के लिए एक नई टुकड़ी बनाई गई. 21 अक्टूबर को ये टुकड़ी उनकी तलाश में निकल गई, जिसमें 20 लोग शामिल थे. इसका नेतृत्व कर रहे थे डीसीआईओ करम सिंह. करम सिंह घोड़े पर सवार थे और पुलिसवाले पैदल थे. 21 अक्टूबर की दोपहर होते-होते चीन के सैनिकों ने इस टुकड़ी पर हमला कर दिया. इस हमले में पुलिस के 10 जवान शहीद हो गए, जबकि सात जवान गंभीर रूप से घायल हो गए.

1960 में तय किया गया था कि हर साल 21 अक्टूबर को नेशनल पुलिस डे मनाया जाएगा.

शहीद हुए जवानों के शव भी चीनी सैनिक अपने साथ लेकर चले गए. 13 नवंबर 1959 को शहीद जवानों के शव को चीनी सैनिकों ने भारत को लौटा दिया. इसके बाद उन शहीद सैनिकों के शवों का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार कर दिया गया. जनवरी 1960 में जब पूरे देश के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिरीक्षकों का सम्मेलन हुआ तो उस वक्त तय किया गया कि हर साल 21 अक्टूबर को नेशनल पुलिस डे मनाया जाएगा. इस दौरान ये भी तय हुआ था कि देश के अलग-अलग हिस्सों से पुलिस के जवान हॉट स्प्रिंग्स की यात्रा करेंगे और शहीदों को श्रद्धांजलि देंगे. 2012 से चाणक्यपुरी में पुलिस स्मृति दिवस पर परेड का आयोजन होने लगा था.

शहादत 1959 में, 60 साल बाद क्यों बना मेमोरियल?

इस मेमोरियल को बनाने की शुरुआत 2002 में हो गई थी. लेकिन काम बंद हो गया. 2018 में ये बनकर तैयार हुआ है.
इस मेमोरियल को बनाने की शुरुआत 2002 में हो गई थी. लेकिन काम बंद हो गया. 2018 में ये बनकर तैयार हुआ है.

1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी थी, तो 2002 में एक प्रस्ताव पास हुआ. ये तय किया गया कि दिल्ली में देश के पुलिसवालों की शहादत का सम्मान करने के लिए एक पुलिस मेमोरियल बनाया जाएगा. 2002 में ही तब के गृहमंत्री रहे लालकृष्ण आडवाणी ने इसकी आधारशिला भी रख दी. लेकिन उसके बाद इस प्रोजेक्ट का काम रुक गया. 16 साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे देश को समर्पित किया.


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