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नॉर्थ कोरिया हथियारों का जख़ीरा जमा करने में क्यों जुटा हुआ है?

एक देश है, जिसकी अपनी दुनिया है. नाम नॉर्थ कोरिया. वहां से अमूमन दो तरह की ख़बरें बाहर आती हैं. पहली, सुप्रीम लीडर की सेहत से जुड़ी होती है. और दूसरी, अत्याधुनिक हथियारों के परीक्षण से. हालिया वाकया हायपरसॉनिक मिसाइल के परीक्षण से जुड़ा है. नॉर्थ कोरिया ने पिछले एक महीने में तीन बड़े हथियारों की टेस्टिंग को अंज़ाम दिया है. हायपरसॉनिक मिसाइल होती क्या हैं? हथियारों की नुमाइश के पीछे नॉर्थ कोरिया का असली मकसद क्या होता है? और, इससे इलाके की जियो-पॉलिटिक्स पर क्या असर पड़ेगा?

नॉर्थ कोरिया से दूर होने के बावजूद जिसकी उससे करारी वाली दुश्मनी है, वो है अमेरिका. वहां क्या चल रहा है? 28 सितंबर को अमेरिकी संसद के ऊपरी सदन सेनेट की आर्म्ड सर्विसेज़ कमिटी की सुनवाई हुई. अफ़ग़ानिस्तान से निकलने के मसले पर टॉप मिलिटरी लीडर्स से कई घंटों तक सवाल पूछे गए. इस सुनवाई से पता चला कि बाइडन प्रशासन ने अफ़ग़ानिस्तान में आख़िर चूक कहां की? क्या अमेरिका वापस अफ़ग़ानिस्तान में एंट्री करेगा? अमेरिका को अल-क़ायदा के हमले का डर क्यों सता रहा है? और, इस सुनवाई का बाइडन सरकार पर क्या असर होगा? दोनों बिंदुओं पर विस्तार से बात करेंगे.

मशहूर ब्रिटिश उपन्यासकार मार्टिन एमिस की एक पंक्ति है-

Weapons are like money; no one knows the meaning of enough.

हथियार, पैसे की तरह होते हैं; किसी को इनकी हद पता नहीं चलती.

हथियारों की दौड़ कुछ-कुछ ऐसी है. कोई भी देश इस रेस में पीछे नहीं छूटना चाहता. पीछे छूटने का मतलब है, अपनी सुरक्षा को ख़तरे में डाल देना. क्योंकि आपको अपनी नीयत पर भरोसा हो सकता है, लेकिन सामने वाले की नहीं. अगर इस आकलन को धरातल पर साक्षात देखना हो तो हमें कोरियन प्रायद्वीप पर नज़र डालनी होगी. कोरियन या कोरिया, इस शब्द का संबंध है कोरयो नाम के एक प्राचीन साम्राज्य से. कोरिया का शाब्दिक अर्थ पूछें, तो मतलब होगा- ऊंचे पहाड़ों और साफ़-चमकदार पानी के स्त्रोतों वाली ज़मीन. कहीं ऊंची पहाड़ की चोटियां. कहीं बर्फ़ीली घाटियां.

जुलाई 1945 की एक बैठक

कोरियन प्रायद्वीप सदियों तक एक इकाई थी. 1910 में कोरिया पर जापान ने क़ब्ज़ा कर लिया. दूसरे विश्व युद्ध में जापान को हारकर बाहर जाना पड़ा. जुलाई 1945 में सेकंड वर्ल्ड वॉर के तीन सबसे बड़े खिलाड़ियों का जुटान जर्मनी के पोट्सडैम शहर में हुआ. वे युद्ध के बाद की स्थिति पर विचार करने के लिए आए थे. इनमें से एक मुद्दा जीते हुए इलाकों के भविष्य से भी जुड़ा था.

कोरिया में मित्र सेनाओं ने जापान को परास्त कर दिया था. पोट्सडैम में अमेरिका और सोवियत संघ ने मिलकर कोरिया के बीच में एक रेखा खींचने का फ़ैसला किया. तय हुआ कि नॉर्थ हिस्से में जापानी सैनिकों का सरेंडर सोवियत संघ स्वीकार करेगा, जबकि साउथ में ये काम अमेरिका करेगा. ऐसा ही हुआ भी. सोवियत संघ और अमेरिका वर्ल्ड वॉर में साथ लड़े. लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद अपनी विचारधारा फैलाने के काम में जुट गए. इसके चक्कर में दोनों महाशक्तियों के बीच कोल्ड वॉर शुरू हुआ. इसका असर कोरियाई प्रायद्वीप पर भी पड़ा. 1948 में ये दो हिस्सों में बंट गया. नॉर्थ कोरिया और साउथ कोरिया. नॉर्थ कोरिया पर सोवियत संघ की कम्युनिस्ट सरकार का प्रभाव था. जबकि साउथ कोरिया पर अमेरिकी पूंजीवाद का. नॉर्थ कोरिया और साउथ कोरिया सहोदर थे. मगर बंटवारे के बाद जन्मजात दुश्मन बन गए. 25 जून 1950 को सोवियत परस्त नॉर्थ कोरियाई शासक किम इल-संग ने साउथ कोरिया पर हमला कर दिया. इरादा, साउथ वाले हिस्से को जीतकर एकीकृत कम्युनिस्ट देश बनाना.

लगभग 50 लाख मौतों और बेहिसाब बर्बादी के बाद 1953 में युद्ध रुक गया. युद्ध रुका तो ज़रूर लेकिन खत्म नहीं हुआ था. क्योंकि, साउथ कोरिया ने संधि पर दस्तख़त नहीं किए. इस वजह से दोनों देशों में आज भी युद्ध चल रहा है. वे एक-दूसरे पर हमला तो नहीं कर रहे, लेकिन टेक्निकली वे लड़ाई में हैं. दोनों देशों की सीमा पर सैनिक हमेशा अलर्ट पर रहते हैं. साउथ और नॉर्थ कोरिया की सीमा दुनिया के सबसे मिलिटराइज़्ड ज़ोन्स में से एक है.

Korean War
कोरियन वॉर

आज ये चर्चा क्यों?

दरअसल, नॉर्थ कोरिया ने इस बार हायपरसोनिक मिसाइल ह्वासोंग-8 का परीक्षण किया है. पिछले तीन महीने में उसका ये तीसरा मिसाइल परीक्षण कार्यक्रम है. कोरियन सेंट्रल न्यूज़ एजेंसी (KCNA) नॉर्थ कोरिया का सरकारी मीडिया है. उसने जानकारी दी है कि इस परीक्षण से नॉर्थ कोरिया का वेपन सिस्टम और उन्नत हो गया है. हालांकि, इस लॉन्च के दौरान सुप्रीम लीडर मौज़ूद नहीं थे. जानकारों का कहना है ये मिसाइल अत्याधुनिक है. दुनिया के बहुत कम देशों के पास इस किस्म के हथियार हैं.

नॉर्थ कोरिया के इस परीक्षण से चिंता की वजह क्या है? चिंता के तीन मुख्य कारण हैं.

पहला, हायपरसॉनिक मिसाइलें बेहद तेज़ होती हैं. ये ध्वनि की रफ़्तार से पांच गुणा तेज़ी से उड़ान भर सकतीं है. वो दुश्मन के रडार पर आसानी से पकड़ में नहीं आएगी. ऐसे में उसे हवा में नष्ट करने या उससे बचने या भागने का समय नहीं होगा. किसी दुश्मन मिसाइल से बचने का एक ही तरीका है. आप उसे अपने रडार पर देख पाएं, ट्रैक कर पाएं. फिर जवाबी कार्रवाई कर पाएं. हायपरसॉनिक मिसाइल रडार कवर को ही भेद सकती है. इसलिए वो आपकी सारी अर्जित तकनीक और तैयारी को धता बता देगी. अगर हायपरसॉनिक मिसाइल पर न्युक्लियर वॉरहेड लगा दिया जाए तो ये बेहद ख़तरनाक हो जाएगी. अगर ये अपने निशाने को भेदने में कामयाब न भी हो तो आस-पास के इलाके में भयंकर तबाही मचा सकती है.

दूसरी बात, हायपरसॉनिक मिसाइलों की गति ही उनका हथियार है. उनपर कोई वॉरहेड न भी लगा हो, सिर्फ एक प्रोजेक्टाइल हो – जैसी गोली होती है. अब ये बम की तरह न फटे, बस अपनी रफ्तार से किसी जहाज़ या मिसाइल से टकरा जाए तो उसे नष्ट कर देगा. इसीलिए हायपरसॉनिक मिसाइल टेक्नीकली महज़ एक तेज़ मिसाइल होकर भी एक आविष्कार की तरह देखी जाती है.

तीसरी वजह सुप्रीम लीडर किम जोंग-उन की सनक से जुड़ी है. नॉर्थ कोरिया बंद पिंजड़े की तरह है. वो देश अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों में बहुत भरोसा नहीं रखता. किम जोंग-उन की छवि ईश्वरीय है. जनता को इस भरम में रखा गया है कि ‘सुप्रीम लीडर इज़ ऑलवेज राइट’. वो जो करेंगे, भला करेंगे. भले ही लोग भूखे मर जाएं, लेकिन सुप्रीम लीडर की शान में गुस्ताख़ी नहीं होनी चाहिए.

किम जोंग की धमकियां

किम जोंग-उन अपने दुश्मनों को परमाणु हमलों की धमकी देते रहते हैं. उनके तीन इमीडिएट दुश्मन साउथ कोरिया, जापान और अमेरिका हैं. नॉर्थ कोरिया के ऐलान के बाद साउथ कोरिया ने भी सबमरीन लॉन्च का ऐलान किया. इससे पहले, 15 सितंबर को दोनों देशों ने एक साथ बैलिस्टिक मिसाइलें लॉन्च की थीं. मतलब ये कि साउथ कोरिया उसी की भाषा में जवाब देने में जुटा है. जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा ने बताया कि उनके देश ने अपनी सीमाओं पर निगरानी बढ़ा दी है.

इस घटना पर अमेरिका ने क्या कहा है? उसने कहा है कि ये प्रतिबंधों का उल्लंघन है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए ख़तरे की तरह है. 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्थ कोरिया के साथ बातचीत की पहल की थी. उस समय नॉर्थ कोरिया के पास मौजूूद परमाणु हथियारों को नष्ट करने पर भी बात हुई थी. लेकिन बात आगे बढ़ती, उससे पहले दोनों देशों के सर्वोच्च नेताओं के बीच ज़ुबानी जंग शुरू हो गई. इसके बाद से बातचीत वाली मेज़ पर धूल जमी हुई है. और, नॉर्थ कोरिया वापस हथियारों की प्रदर्शनी में जुट गया है.

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, नॉर्थ कोरिया ने पिछले 40 सालों में 150 से ज़्यादा मिसाइलों का परीक्षण किया है. आपके मन में ये सवाल उठता होगा कि नॉर्थ कोरिया को हथियारों से इतनी मुहब्बत क्यों है? वो शांति या दूसरे देशों के साथ अच्छे रिश्तों पर बात क्यों नहीं करता?

पहले ऑफ़िशल बयान सुन लीजिए. यूनाइटेड नेशंस में नॉर्थ कोरिया के प्रतिनिधि ने कि हमारे ख़िलाफ़ जो नीतियां बन रहीं हैं, उसके मद्देनज़र मिसाइलों का परीक्षण ज़रूरी हो जाता है. नॉर्थ कोरिया का कहना है कि साउथ में अमेरिका के तीस हज़ार सैनिक अभी भी मौजूद हैं. सत्तर साल पुराना कोरियन युद्ध की समाप्ति की औपचारिक घोषणा अभी तक नहीं हुई है. ऐसे में हमें अपनी सुरक्षा का ध्यान रखना होता है. इसके लिए हथियारों का परीक्षण करना पड़ता है.

और क्या-क्या वजहें हो सकतीं है?

एक वजह कोरियाई प्रायद्वीप पर अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी से जुड़ी है. साउथ कोरिया के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, लेकिन उसके सहयोगी अमेरिका के पास इसकी बहुतायत है. साउथ कोरिया में मौजूद अमेरिकी सैनिक लगातार अत्याधुनिक हथियारों के साथ युद्ध अभ्यास करते रहते हैं. उनसे कदमताल करने के लिए नॉर्थ कोरिया को भी अपने हथियारों को उन्नत बनाना पड़ता है. जानकारों की मानें तो अमेरिकी मौजूदगी के डर वाली बात में दम है.

दूसरी वजह है, छलावा. किम जोंग-उन एक तानाशाह हैं. उन्हें कुर्सी पर बने रहने के लिए अपने लोगों की जी-हुजूरी चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि सरकार लोगों को गर्व करने की कोई चीज मुहैया कराती रहे. अलग-अलग मौकों पर राजधानी में हथियारों की भव्य परेड इसी छलावे का हिस्सा होती हैं. ताकि जनता इस भरम में रहे कि सुप्रीम लीडर ने हमें रोजगार और रोटी नहीं दी तो क्या हुआ, वे दुश्मन देश को धूल तो चटा ही देंगे.

कोरोना महामारी के दौरान नॉर्थ कोरिया ने अपनी सीमाओं को पूरी तरह से बंद कर लिया था. इससे चीन से आने वाली सप्लाई पर भी असर पड़ा. इसके अलावा, प्राकृतिक आपदाओं ने भी ग्रामीण इलाकों को भारी नुकसान पहुंचाया. नॉर्थ कोरिया की अर्थव्यवस्था चौपट है. मगर राजधानी में सब चंगा दिखे, इसके लिए असली मुद्दे से भटकाव ज़रूरी है.

तीसरी वजह अंतरराष्ट्रीय मंच पर माहौल बनाने से जुड़ी है. अगर नॉर्थ कोरिया किसी बातचीत में शामिल हुआ तो उसे मज़बूत नज़र आना ज़रूरी है. इससे सामने वाली पार्टी उसे हल्के में लेने की भूल नहीं करेगी. मिसाइल टेस्ट से उसकी बारगेनिंग की क्षमता बढ़ती है. जानकारों का दावा है कि नॉर्थ कोरिया यहीं पर नहीं रुकने वाला. आने वाले दिनों में और भी मिसाइल टेस्टिंग देखने को मिल सकती है.


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