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CAG, वह संवैधानिक पद जिसके बारे में कोई नहीं जानता कि इसको चुनता कौन है?

“भारत का नियंत्रक और महालेखा परीक्षक संभवतः भारत के संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी है. वह ऐसा व्यक्ति है जो यह देखता है कि संसद द्वारा मान्य खर्चों की सीमा से अधिक धन खर्च न होने पाए. या संसद द्वारा विनियोग अधिनियम में तय मदों पर ही धन खर्च किया जाए.” – डॉ. भीम राव अम्बेडकर

आपको 2जी घोटाला याद है. वही 2जी घोटाला जो यूपीए 2 की सरकार पर सबसे बड़ा धब्बा बना था. इस घोटाले को ही 2014 में यूपीए की हार का सबसे बड़ा कारण माना गया. इसे 20 लाख करोड़ रुपए का घोटाला कहा गया. इस घोटाले को सामने लाने का काम किया था तत्कालीन सीएजी यानी कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल विनोद राय ने. अब आप समझ सकते हैं कि यह पद कितना महत्वपूर्ण है. जम्मू-कश्मीर के पूर्व एलजी गिरीश चंद्र मुर्मू को भारत का नया सीएजी या हिंदी में कहें तो नियंत्रक व महालेखा परीक्षक नियुक्त किया गया है. ये वही जी.सी. मुर्मू हैं, जिन्हें सरकार ने धारा 370 हटाने के बाद जम्मू-कश्मीर का एलजी बनाया गया था. आइए जानते हैं सीएजी के पद और प्रतिष्ठा के बारे में. और सुलझाने की कोशिश करते हैं इस पहेली को कि आखिर सीएजी को चुनता कौन है, आसान भाषा में:

पहले जानें कि इनकी नियुक्ति करता कौन है?

भारत में कुछ ऐसे पद हैं, जिनके बारे में संविधान में लिखा गया है. इनमें से एक पद है भारत का कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG). इसे कुछ लोग सामान्य भाषा में कैग भी कहते हैं. इनकी नियुक्ति और कामकाज के बारे में संविधान के अनुच्छेद 149 से लेकर अनुच्छेद 151 में वर्णन किया गया है. इसके अनुसार:

# CAG को राष्ट्रपति की सील और वारंट द्वारा नियुक्त किया जाता है और इसका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है ( दोनों में से जो भी पहले हो).

# CAG को राष्ट्रपति द्वारा केवल संविधान में दर्ज प्रक्रिया के अनुसार हटाया जा सकता है जो कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के तरीके जैसी है. यह प्रक्रिया बहुत जटिल है. इसके लिए संसद को दोनों सदनों में अलग-अलग दो तिहाई बहुमत से हटाने का प्रस्ताव पास करवाना होता है. आज तक कभी ऐसी नौबत नहीं आई है.

# एक बार CAG के पद से रिटायर होने/इस्तीफा देने के बाद वह भारत सरकार या किसी भी राज्य सरकार के अधीन किसी भी कार्यालय का पदभार नहीं ले सकते. ऐसा इसलिए किया जाता है कि कोई भी उन्हें बाद में बड़ा पद देने का लालच न दे सके. हालांकि सांसद, विधायक बनने पर कोई रोक नहीं है.

# CAG का वेतन और अन्य सेवा शर्तें नियुक्ति के बाद बदली (कम) नहीं जा सकतीं. ऐसा इसलिए किया जाता है जिससे सरकार वेतन कम करने का दबाव बनाकर मनमुताबिक काम न करवा सके.

# CAG के ऑफिस का खर्च, जिसमें सभी वेतन, भत्ते और पेंशन शामिल हैं, भारत की संचित निधि पर भारित होते हैं जिन पर संसद में मतदान नहीं हो सकता. मतलब जो तय हो गया, सो हो गया. नियमों के अनुसार, जिन संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों का वेतन भारत की एक खास संचित निधि से दिया जाता है. इस पर टैक्स नहीं लगता. मतलब हमारी तरह इन्हें सैलरी पर टैक्स नहीं भरना पड़ता. फिलहाल सीएजी को तकरीबन 2.5 लाख रुपए प्रति माह वेतन मिलता है.

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सीएजी करता क्या है

सीएजी का काम देश की संसद और विधानसभाओं से पारित खर्चों के हो जाने के बाद उनकी पड़ताल करना है. कुल मिलाकर हर खर्च को खुर्दबीन से देखकर यह पता लगाना है कि कहीं गड़बड़ी तो नहीं. यह काम जितना जटिल है, उतना ही भारी-भरकम भी है. ऐसे में आपको बताते हैं मोटा-मोटी कैग करता क्या है:
# केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के किसी भी विभाग के सभी ट्रेडिंग, विनिर्माण, लाभ- हानि खातों, बैलेंस शीट और अन्य अतिरिक्त खातों का ऑडिट करता है.

# अगर सरकार ने किसी खास काम के लिए कोई पैसा निर्धारित किया तो क्या वह पैसा उस काम पर ही खर्च हुआ कि नहीं, ये चेक करता है.

# जो अधिकारी, उस खर्च को करने के लिए जिम्मेदार था, उसने नियम कायदे से यह खर्च किया कि नहीं, ये जांचता है.

# इस खर्चे में किसी भी तरह की गड़बड़ी तो नहीं हुई. क्या काम किया गया.

# उसने जो रायशुमारी की थी, उस पर एक्शन हो रहा है या नहीं.

# सीएजी पूरी रिपोर्ट राष्ट्रपति को देता है जिसे संसद में पेश किया जाता है.

दूसरे शब्दों में, कानून के जानकार कहते हैं कि सरकारी खर्चे हो जाने के बाद उनका पोस्टमार्टम करने का काम सीएजी करता है.

 

अब आते हैं सबसे बड़ी पहेली पर

कोई नहीं जानता कि इनका चयन होता कैसे है. सीएजी जैसे संवैधानिक पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया का वर्णन संविधान में है. लेकिन यह कहीं नहीं लिखा गया कि इसका चुनाव कैसे होगा. वह सुपात्र कौन होगा, जो इस पद पर बैठाया जाएगा. पूर्व डिप्टी सीएजी अनुपम कुलश्रेष्ठ बताते हैं:

“संविधान में इस बात की तरफ कोई इशारा नहीं है कि कौन सीएजी बनने के पात्र नहीं हैं. इसमें सिर्फ राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की बात कही गई है. किसी भी तरह की कमेटी बनाकर सुपात्र व्यक्ति चुनने का सिस्टम सीएजी को लेकर नहीं है.”

कानून के जानकार कहते हैं कि यह पद काफी महत्वपूर्ण है लेकिन अब तक इस पर बैठे लोगों का चयन मनमुताबिक तरीके से होता आया है. केंद्रीय सतर्कता आयुक्त जैसे पद के लिए भी एक कमेटी बनाई गई है. जिसकी अनुशंसा पर ही किसी की नियुक्ति होती है. सुप्रीम कोर्ट और जजों की नियुक्ति के लिए भी एक कोलेजियम है. जिसके द्वारा सुपात्र का चुनाव होता है. लेकिन सीएजी के लिए ऐसी कोई व्यवस्था न होने से यह पद संवैधानिक होते हुए भी राजनैतिक पद बनकर रह गया है.

 

सरकार के पास भी नहीं है नियुक्ति की प्रक्रिया का जवाब

सरकार ने इस बाबत कई बार डाली गईं आरटीआई पर कोई जवाब नहीं दिया है. 2013 में नवभारत टाइम्स में छपी एक खबर के मुतबिक, सीएजी की नियुक्ति के तरीके के बारे में एक आरटीआई दाखिल की गई. वित्त मंत्रालय के इकनॉमिक अफेयर्स डिपार्टमेंट ने तब बताया कि इस बारे में सही जानकारी कैबिनेट सचिवालय ही दे सकता है. उधर, कैबिनेट सचिवालय का कहना है कि नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है और चयन किस तरह से होता है, यह जानकारी वित्त मंत्रालय का इकनॉमिक अफेयर्स डिपार्टमेंट ही दे सकता है.

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दूसरी बार 2017 में यूपी की आरटीआई एक्टिविस्ट नूतन ठाकुर ने इस प्रक्रिया के बारे में सरकार से जवाब मांगा. सरकार ने गोपनीयता की बात करते हुए इस तरह की जानकारी देने से मना कर दिया. नूतन ठाकुर ने लल्लनटॉप को बताया:

“सरकार आरटीआई के जिस सेक्शन 81(i) के तहत यह जानकारी उपलब्ध न कराने की बात कर रही है. वह सरासर गलत बयानी है. मुझे आज तक अपनी आरटीआई का जवाब नहीं मिला है.”

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिस अधिकारी के चयन की प्रक्रिया इतने पर्दे में हो, क्या सरकार के खर्चों की उसकी पड़ताल सवालों से बची रह पाएगी?

 

वीडियो – राफेल पर CAG की रिपोर्ट: मोदी झूठे या राहुल के इल्ज़ाम?

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