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निर्मला सीतारमण ने जिन 'मिलेनियल्स' को मंदी का कारण बताया है, वो असल में हैं कौन?

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‘कारों की बिक्री इसलिए कम हो गई है क्योंकि शहर के लोग ओला-उबर इस्तेमाल कर रहे हैं.

ट्रकों की बिक्री इसलिए कम हो गई है क्योंकि ट्रक ड्राइवर अपनी नौकरी छोड़ कर ओला-उबर ड्राइवर बन रहे हैं.

ट्रैक्टरों की बिक्री इसलिए कम हो गई है क्योंकि किसान शहरों की ओर बढ़ रहे हैं ताकि ट्रक ड्राइवरों द्वारा चलाई जा रही ओला-उबर का मजा ले सकें.’

ये ट्वीट ऐसी तैसी डेमोक्रेसी नाम के ट्विटर हैंडल से किया गया है.

# कारों की बिक्री, मंदी और मिलेनियल्स का क्या लेना देना है?

ऑटो सेक्टर में मंदी की जो खबरें चल रही हैं, उनको लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बयान दिया है. अगस्त में बिक्री में रिकॉर्ड गिरावट हुई है. आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2019 में गाड़ियों के  18, 21, 490 यूनिट ही बिके हैं. पिछले साल के मुकाबले 23.55 फीसद की गिरावट आई है बिक्री में. ये डेटा जो है, वो SIAM (सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स) ने दिया है.

इतनी गिरावट है तो लोगों को चिंता भी होगी. क्या गड़बड़ है भई. तो निर्मला सीतारमण ने बताया क्या गड़बड़ है:

कुछ स्टडीज़ हमें बताती हैं कि मिलेनियल्स का माइंडसेट ऐसा है कि वो गाड़ी खरीदकर उसकी ईएमआई देने के बजाए ओला,उबर या मेट्रो लेना पसंद करते हैं. ऑटोमोबाइल सेक्टर को प्रभावित करने वाले बहुत से कारक हैं. हम उनकी समस्या सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं.

बस. सीतारमण ने ये कहा और ट्विटर पर आग की तरह बात फ़ैल गई. जोक पर जोक बनने लगे. दो हैशटैग निकल कर आए. #SayItLikeNirmalaTai और #BoycottMillennials . बॉयकॉट मिलेनियल्स पर तो उल्टा इतने व्यंग्य खींचे गए कि इस पर बने जोक ज्यादा ट्रेंड करने लगे. ओला और उबर दो पॉपुलर टैक्सी कम्पनियां हैं जिनमें आप मोबाइल ऐप के ज़रिए किराए पर कैब,ऑटो, बाइक वगैरह बुक कर सकते हैं. वित्त मंत्री के कहने का मतलब ये था कि मिलेनियल गाड़ी खरीदने के बजाए अपनी सुविधा के हिसाब से किराए की ये टैक्सियां बुक कर लेते हैं. गाड़ियां बिक नहीं रहीं, तो मंदी आ रही है. ट्विटर ने इस बात पे खूब चुटकी ली.  इस ट्वीट को ही ले लें. जिसमें कहा जा रहा है कि मैं तो मिलेनियल हूं, मेरे पास IIM की डिग्री है, लेकिन मैं पकौड़े बेचना पसंद करता हूं. ना इनकम टैक्स है, न घर है, ना गाड़ी है यानी कोई EMI नहीं, कोई हेल्थ इंश्योरेंस नहीं.

इन ट्वीट्स  में ये कहा जा रहा है कि एविएशन इंडस्ट्री इसलिए क्राइसिस में है क्योंकि मिलेनियल PUBG वाले प्लेन में उड़ना पसंद करते हैं. या BHEL 15 सालों में अपने सबसे निचले स्तर पर इसलिए है क्योंकि मिलेनियल्स को ‘पानी पूरी’ ज्यादा पसंद है.

# ये मिलेनियल हैं क्या बला?

सीधी-सीधी बात. 1981 से लेकर 1996 तक के बीच जन्म लेने वाले लोग मिलेनियल कहलाते हैं. यानी अगर इस वक़्त आपकी उम्र 23 से 38 साल के बीच है, तो आप मिलेनियल हैं. लेखक विलियम स्ट्रॉस और नील हाव को क्रेडिट दिया जाता है इस शब्द को इस तरीके से इस्तेमाल करने का. 1987 में उन्होंने ये टर्म इस्तेमाल किया. मीडिया के हिसाब से भी इस पीढ़ी के जो बच्चे थे, वो 2000 या उसके बाद ग्रेजुएट हो रहे थे. वो नया मिलेनियम था. इसको जेनेरेशन वाई भी कहा गया. कुछ जगहों पर ये डिविजन 1980 से 1994 तक का भी बताया जाता है.

# मिलेनियल के साथ साथ बाकी पीढ़ियों के नाम भी रखे गए. वो क्या थे?

लॉस्ट जेनेरेशन: ये वो लोग थे जिनका जन्म 1883 से 1900 के बीच हुआ. इनको लॉस्ट जेनेरेशन इसलिए कहा गया क्योंकि इन्होने पहला विश्व युद्ध और उससे उपजने वाली विरक्ति देखी थी. इस पीढ़ी का कोई व्यक्ति अभी तक जिंदा हो, ऐसी खबर नहीं है.

(पंडित जवाहरलाल नेहरू इसी जेनेरेशन के थे.)

ग्रेटेस्ट जेनेरेशन: ये वो लोग थे जिनका जन्म 1901 से 1927 के बीच माना गया. इस पीढ़ी में पैदा हुए लोगों ने बड़े होते हुए दूसरा विश्व युद्ध देखा. रेडिओ और टेलीफोन जैसी सुविधाएं देखीं. इनको G. I. Generation भी कहा गया.

(बेगम अख्तर और मोहम्मद रफ़ी इसी पीढ़ी के थे.)

साइलेंट जेनेरेशन: इनके जन्म का साल 1928 से 1945 माना गया. कुछ जगहों पर ये टाइम पीरियड 1925 से 1942 तक का माना जाता है.द्वितीय विश्व युद्ध और कई जगहों पर मंदी की वजह से परिवार पालना मुश्किल था. इन कुछ वजहों से लोगों ने बच्चे कम पैदा किए. लेकिन जब ये बड़े हुए तो इन्होंने 50 और 60 के दशक में बेहतर परिस्थितियां देखीं. अमेरिका में इस पीढ़ी ने सिविल राइट्स के लिए काफी काम किया.

(आर डी बर्मन, जगजीत सिंह, लता मंगेशकर इसी पीढ़ी में आते हैं.)

बेबी बूमर्स: ये वो लोग थे जो 1946 से लेकर 1964 के बीच पैदा हुए. इनको बेबी बूमर इसलिए कहा गया क्योंकि पिछली पीढ़ी के मुकाबले इनके बच्चे ज्यादा हुए. यानी अभी के मिलेनियल्स के नाना-नानी/दादा-दादी की उम्र के आस-पास के लोग.

(इस जेनेरेशन के लोग पंडित भीमसेन जोशी, एम एस सुब्बुलक्ष्मी के गाने सुनते हुए बड़े हुए. इसी पीढ़ी में डॉनल्ड ट्रंप और बिल क्लिंटन का जन्म हुआ.)

जेनेरेशन एक्स: ये वो पीढ़ी हुई जिसका जन्म 1965 से लेकर 1980 के बीच माना गया. इसमें थोड़ा सा ध्यान देने की ज़रूरत है. क्योंकि इस पीढ़ी के लिए भी जो साल तय किए गए हैं, उनमें कहीं-कहीं फर्क बताया जाता है. कुछ जगहों पर साल 1961 से ही इनकी गिनती शुरू हो जाती है और साल 1984 तक जाती है.

(जेनेरेशन एक्स वो हुए वो जो कुमार सानू के गाने सुनकर अपने कमरों में रोए. शोले पिक्चर हिट करवाई. राहुल रॉय को नेशनल क्रश बना दिया.)

मिलेनियल्स: इनके बारे में हमने आपको ऊपर बता ही दिया. इनको जेनेरेशन वाई भी कहा गया. फेसबुक, यूट्यूब,और स्नैपचैट को इन्हीं लोगों ने रफ़्तार दी.

(इस पीढ़ी वाले लोग अरिजीत सिंह के गानों पर छुप-छुप कर आंसू पोंछते नज़र आए. ये वही लोग हैं जो इंटरनेट पर ‘Only 90s Kids Will Remember This’वाले मीम्स उछल-उछल कर शेयर करते नज़र आते हैं.)

जेनेरेशन ज़ेड या ज़ी: ये वो बच्चे हैं जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी गोल डायल वाला लैंडलाइन फोन इस्तेमाल नहीं किया. टचस्क्रीन वाले फोन और तेज इन्टरनेट इन्हें शुरू से उपलब्ध रहे. इनके लिए कुछ और नाम जो इस्तेमाल होते हैं, वो हैं:

# आईजेनेरेशन (iGeneration/i Gen)

# डेल्टा

# पोस्ट मिलेनियल.

इनके जन्म के साल कमोबेश माने जाते हैं 1997 से लेकर 2012 के बीच. आखिर के सालों में थोड़ा -बहुत फर्क कहीं-कहीं पढ़ने को मिलता है, लेकिन मोटा-मोटी 2012 को ही अंत का साल माना गया है कई स्टडीज में.

(इस पीढ़ी के अधिकतर बच्चे आपको टिकटॉक चलाते हुए मिल जाएंगे.)

सालों का लेखा-जोखा इसी तरह चलता है. आप जिस साल में पैदा हुए हैं, उसी हिसाब से आपकी पीढ़ी निश्चित होगी. उसमें कोई बदलाव नहीं होगा. इस वक़्त आप मिलेनियल हैं, तो आज से बीस साल बाद भी आप मिलेनियल ही रहेंगे. हां तब तक भले ही तीन-चार नई पीढ़ियों के नाम भले आ जाएं. सोचना शुरू करिए, क्या पता अगली पीढ़ी के लिए आप ही कोई नया नाम सोच लें.


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