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वो मामले जिनमें फांसी के बाद परिवारवालों को डेडबॉडी नहीं मिली

20 मार्च. दिल्ली सोकर उठने की तैयारी में थी. बहुत से लोग सो ही रहे थे. फिर एक ख़बर टीवी और मोबाइल स्क्रीन पर उभरी: निर्भया केस में चार दोषियों को फांसी. अक्षय, विनय, पवन और मुकेश. सात साल तक चले केस में फांसी पर लटकाए जाने से पहले निर्भया के चारों दोषियों ने अपनी कोई अंतिम इच्छा ज़ाहिर नहीं की. उनके कपड़े और सभी सामान परिवारवालों को दिए जाएंगे. लेकिन उनके शवों का क्या होगा?

तिहाड़ जेल में फांसी के बाद शव को दीन दयाल उपाध्याय उपाध्याय हॉस्पिटल भेजा गया. यहां इनका पोस्टमॉर्टम किया गया. इसके बाद जो परिवारवाले शवों पर दावा करेंगे, उनके हवाले शव कर दिए जाएंगे. फिलहाल अभी तक अक्षय का परिवार अस्पताल पहुंचा है. इसके अलावा ख़बर लिखे जाने तक दूसरे परिवारों ने दावा नहीं किया था. शव के लिए परिवारवालों को लिखित में देना होता है. इसमें ये शर्त भी होती है कि शव को लेकर कोई प्रदर्शन नहीं होगा. इसके अलावा नियम क्या हैं?

अगर दावा न हो तो क्या किया जाता है?

अगर शवों पर दावा न किया जाए तो जेल प्रशासन की ज़िम्मेदारी होती है कि वो अंतिम संस्कार करवाए. तिहाड़ जेल की तरफ से कहा गया,

मुकेश और विनय ने बीती रात डिनर किया और अक्षय ने केवल चाय ली. विनय थोड़ा रोया लेकिन चारों दोषी शांत थे. उन्हें कोर्ट ऑर्डर के बारे में लगातार अपडेट किया जा रहा था. अगर उनके परिवार शवों पर दावा करते हैं तो उन्हें सौंप दिया जाएगा वरना उनके अंतिम संस्कार की ज़िम्मेदारी हमारी है.

गाइडलाइन्स क्या कहती हैं?

फांसी देने के बाद पहले डॉक्टर शव की जांच करते हैं और मौत की पुष्टि करते हैं. शव को अटॉप्सी के लिए भेजा जाता है. तिहाड़ जेल के अधिकारी कहते हैं कि पहले ऐसा नहीं था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की 2014 की गाइडलाइन्स के बाद ये किया जाता है. जेल मैन्युअल कहता है कि शवों का उनके धर्मों के हिसाब से अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा. मैन्युअल के हिसाब से शव को अंतिम संस्कार वाली जगह तक ले जाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था भी की जाती है.

पहले भी कई दोषियों के परिवारवालों को शव नहीं मिले या परिवार की तरफ से उन पर दावा नहीं किया गया. ऐसे कुछ चर्चित नामों के बारे में आपको बताएंगे.

रंगा और बिल्ला

कुलजीत सिंह (रंगा खुस) और जसबीर सिंह (बिल्ला) ने 1978 में भाई-बहन संजय और गीता को किडनैप कर गीता के साथ रेप किया और दोनों का मर्डर कर दिया था. इस केस की बड़ी चर्चा थी. मामले में रंगा-बिल्ला को 1982 में तिहाड़ में ही फांसी हुई थी. किसी ने दोनों के शव पर दावा नहीं किया था. इसके बाद जेल प्रशासन ने अंतिम संस्कार करवाया.

26 अगस्त, 1978 को ये घटना हुई थी. गीता और संजय चोपड़ा के पिता मदन मोहन चोपड़ा नेवी में कैप्टन थे. फोटो: India Today
26 अगस्त, 1978 को ये घटना हुई थी. गीता और संजय चोपड़ा के पिता मदन मोहन चोपड़ा नेवी में कैप्टन थे. फोटो: India Today

अफज़ल गुरु

13 दिसंबर, 2001. संसद हमला. आठ सुरक्षाकर्मियों और एक कर्मचारी की मौत हो गई थी. 16 लोग घायल हुए थे. हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु को 9 फरवरी, 2013 को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई. लेकिन परिवारवालों ने शव पर दावा किया था. सरकार की तरफ से शव सौंपने से इनकार कर दिया गया था. इस पर ख़ूब बवाल मचा था.

अफज़ल गुरू के शव को तिहाड़ जेल की सीमा के अंदर ही दफनाया गया. फोटो: विकीमीडिया
अफज़ल गुरु के शव को तिहाड़ जेल की सीमा के अंदर ही दफनाया गया. फोटो: विकीमीडिया

धनंजय चटर्जी

14 अगस्त, 2004 को रेप के दोषी धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी. कोलकाता की अलीपुर जेल में. ये भारत में 21वीं सदी की पहली फांसी थी. भवानीपुर के आनंद अपार्टमेंट में रहने वाली 14 साल की लड़की हेतल पारेख के साथ रेप करने और मर्डर का दोषी पाया गया था. धनंजय को जिस तारीख को (14 अगस्त) को फांसी पर चढ़ाया गया, उसी दिन उसका 39वां जन्मदिन था. उसने ख़ुद को सिक्योरिटी गार्ड बताया था. धनंजय चटर्जी के शव के भी शव को परिवारवालों ने लेने से मना कर दिया था.

धनंजय चटर्जी आखिरी वक्त तक ख़ुद को निर्दोष बताता रहा. फोटो: YouTube
धनंजय चटर्जी आखिरी वक्त तक ख़ुद को निर्दोष बताता रहा. फोटो: YouTube

जिस अपार्टमेंट में हेतल पारेख रहती थी, उसी बिल्डिंग में धनंजय चटर्जी गार्ड था. धनंजय की फांसी के ख़िलाफ तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के पास दया याचिका भी डाली गई थी. उसे सज़ा देने के लिए अभियान चले. 4 अगस्त, 2004 को दया याचिका ख़ारिज हो गई और दस दिनों बाद 14 अगस्त, 2004 को उसे फांसी दे दी गई.


वीडियो देखें: क्या होता है ‘डेथ वारंट’, जो फांसी से पहले जारी होता है?

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