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क्या होता है फांसी का ट्रायल, जो असली फांसी से एक दिन पहले होता है?

निर्भया के दोषियों को फांसी दे दी गई. अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा, मुकेश सिंह और पवन गुप्ता को 20 मार्च की सुबह 5.30 बजे फांसी पर लटका दिया गया. तिहाड़ में पहली बार एकसाथ चार दोषियों को फांसी दी गई है. इन चारों ने फांसी रुकवाने के लिए काफी कोशिशें की थीं. इस वजह से पहले भी तीन बार डेथ वारंट जारी किए गए, जिन पर अमल नहीं हो सका था. पहला वारंट जनवरी में जारी हुआ था. लेकिन दोषियों ने अलग-अलग कानूनी पैंतरे इस्तेमाल किए. इस तरह फांसी की तारीख आगे बढ़ती गई.

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तस्वीर में बाईं ओर से : पवन, विनय, मुकेश, अक्षय. ये निर्भया के चार दोषी हैं, जिन्हें फांसी पर लटकाया गया. दाईं ओर सबसे आखिर में निर्भया की मां आशा देवी, जो कुछ समय पहले मामले की सुनवाई के दौरान देरी होने से फफक पड़ी थीं. (तस्वीर: PTI)

पहले जारी होता है डेथ वारंट

कोर्ट फांसी के लिए डेथ वारंट जारी करता है. इसे ‘ब्लैक वारंट’ भी कहा जाता है. फांसी की तारीख से 14 दिन पहले यह जारी किया जाता है. इसके ऊपर लिखा होता है, ‘वारंट ऑफ एक्जीक्यूशन ऑफ अ सेंटेंस ऑफ डेथ’. वारंट में ये भी लिखा होता है कि कैदी को फांसी पर तब तक लटकाया जाए, जब तक उसकी मौत न हो जाए. कोर्ट से जारी डेथ वारंट सीधा जेल प्रशासन पहुंचता है. फांसी होने के बाद कैदी की मौत से जुड़े सर्टिफिकेट वापस कोर्ट में दिए जाते हैं. इसके अलावा डेथ वारंट भी वापस किया जाता है.

ऐसा दिखता है डेथ वारंट. फोटो- अरविंद कुमार ओझा.
ऐसा दिखता है डेथ वारंट. फोटो क्रेडिट- अरविंद कुमार ओझा.

डेथ वारंट जारी होने के बाद जेल प्रशासन फांसी की तैयारी शुरू करता है. इसमें जल्लाद को बुलाना, फांसी की रस्सी का ऑर्डर देना, फांसी के तख्त की जांच शामिल होती है. साथ ही जेल प्रशासन फांसी का डमी ट्रायल करता है. इस बारे में हमने बात की तिहाड़ के पूर्व जेलर और ब्लैक वॉरेंट-कन्फेशंस ऑफ अ तिहाड़ जेलर किताब के लेखक सुनील गुप्ता से. उन्होंने बताया कि ट्रायल एक तरह से फांसी का रिहर्सल होता है. यह फांसी से पहले किया जाता है. अमूमन फांसी के दिन से ठीक पहले वाली रात को. इसमें फांसी की रस्सी, रस्सी खींचने वाले लीवर की जांच की जाती है, ताकि फांसी के दौरान कोई गड़बड़ी न हो.

उन्होंने आगे कहा कि जेल मेन्युअल में कम से कम एक बार फांसी के ट्रायल का प्रावधान होता है. ट्रायल के दौरान जेल सुपरिटेंडेंट, वारंट ऑफिसर और जल्लाद मौजूद होते हैं.

फांसी से पहले जेल प्रशासन ट्रायल करके पूरी जांच-परख करता है.
फांसी से पहले जेल प्रशासन ट्रायल करके पूरी जांच-परख करता है.

बोरियों को लटकाकर होता है ट्रायल

सुनील गुप्ता ने बताया कि ट्रायल में फांसी की सजा पाने वाले कैदी के डेढ़ गुना वजन के बराबर की रेत की बोरियों को लटकाया जाता है. इसके लिए पहले फांसी पाने वाले की लंबाई, वजन, गर्दन की नाप को रिकॉर्ड कर लिया जाता है. ठीक उसी साइज और वजन की बोरियों को हिसाब से गिराया जाता है. यही वजह है कि जिस शख्स को फांसी दी जानी होती है, उसके वजन और लंबाई का रिकॉर्ड रोजाना अपडेट होता रहता है. फांसी के लिए रस्सी की लंबाई भी कैदियों के वजन के हिसाब से तय होती है.

वजन के हिसाब से होती है रस्सी की लंबाई

जिस रैंप पर फांसी दी जाती है, उस तख्ते के नीचे की गहराई 15 फीट होती है, ताकि जमीन और झूलते पैर के बीच पूरा फासला हो. फांसी के फंदे पर झूलने वाले शख्स का वजन अगर 45 किलो या उससे कम है, तो फिर तख्ते के नीचे कुएं में लटकने के लिए रस्सी की लंबाई ज्यादा रखी जाती है, जो करीब आठ फुट होती है. अगर फांसी पर चढ़ाए जाने वाले शख्स का वजन 90 किलो या उससे ज्यादा है, तो कुएं में झूलने के लिए रस्सी की लंबाई कम रखी जाती है. करीब छह फुट.

ऐसा इसलिए होता है कि वजन की वजह से रस्सी पर दबाव ज्यादा पड़ता है. रस्सी की लंबाई की नाप सिर से नहीं, बल्कि बाएं कान के नीचे जबड़े से ली जाती है, क्योंकि फांसी के फंदे की गांठ वहीं से शुरू होती है.

दिल्ली की तिहाड़ जेल.
दिल्ली की तिहाड़ जेल.

निर्भया के दोषियों के लिए आठ बार ट्रायल

‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार मुनीष कुमार ने बताया कि फांसी की तारीख से दो दिन पहले ट्रायल किया जाता है. उन्होंने बताया कि निर्भया के गुनाहगारों के मामले में तिहाड़ जेल में आठ बार फांसी का डमी ट्रायल किया गया. फांसी की तारीखों में बदलाव के चलते ऐसा हुआ. इस बार चारों कैदियों के लिए दो-दो बार डमी ट्रायल हुआ.

दो नए रैंप बनाए गए

उन्होंने बताया कि इस बार ट्रायल के दौरान पीडब्ल्यूडी का अधिकारी भी मौजूद रहा. इसकी वजह यह थी कि चार कैदियों को एक साथ फांसी देनी थी. तिहाड़ में इससे पहले एकसाथ दो कैदियों को ही फांसी दी गई थी. इसलिए फांसी के रैंप और बनाए गए. यह काम पीडब्ल्यूडी अधिकारी की देखरेख में हुआ. साथ ही पहले से बने रैंप की जांच भी कराई गई. हालांकि फांसी के दौरान पीडब्ल्यूडी का अधिकारी मौजूद नहीं होता है.

ट्रायल के दौरान वही रस्सी इस्तेमाल की जाती, जिससे बाद में फांसी देनी होती है. एक कैदी के लिए दो रस्सियां मंगाई जाती है. भारत में फांसी के लिए बिहार के बक्सर जेल में तैयार रस्सी का इस्तेमाल होता है.


Video: किताबवाला: तिहाड़ में कैदी मालिश से लेकर फांसी तक के खौफनाक सच सामने आए

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