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निर्भया केस: फांसी की रस्सी की लंबाई तय होने के पीछे का साइंस क्या है?

निर्भया गैंगरेप-मर्डर केस. 20 मार्च की सुबह 5:30 बजे चारों दोषियों- अक्षय, पवन, मुकेश, विनय को फांसी हुई. तिहाड़ जेल में. तीन बार फांसी की तारीख आगे बढ़ने के बाद आखिरकार सज़ा मिली.

फांसी का दूसरा नाम है सज़ा-ए-मौत. लेकिन फांसी से मौत एग्ज़ैक्टली कैसे होती है? क्या ये मौत सांस रुक जाने के कारण होती है? या सिर धड़ से अलग हो जाता है? या फिर गर्दन की कोई हड्डी टूटने से मौत होती है? मौत किसी भी तरीके से हो सकती है. डिपेंड करता है कि किस तरीके से फांसी दी गई है.

इस आर्टिकल में हम आपको फांसी के तरीके बताएंगे. और बताएंगे कि किस तरीके से कैसी मौत होती है. साथ में समझेंगे फांसी की फिज़िक्स और बायोलॉजी.

फांसी देने के चार मेथड होते हैं –

1. शॉर्ट ड्रॉप मेथड
2. पोल मेथड
3. स्टैंडर्ड ड्रॉप मेथड
4. लॉन्ग ड्रॉप मेथड

इन मेथड्स को एक दूसरे से अलग बनाता है ड्रॉप. ड्रॉप मतलब मुजरिम को प्लेटफॉर्म से कितने नीचे तक गिराया जाएगा. मुजरिम कितने नीचे जाकर लटकता है, इसी से तय होता है कि मौत कैसे होगी.

ओल्ड स्कूल फांसी

शुरुआत करते हैं पुराने मेथड्स से – शॉर्ट ड्रॉप और पोल मेथड.

शॉर्ट ड्रॉप मतलब छोटा सा ड्रॉप. जैसे कि स्टूल पर खड़े होकर कूदना. जिसमें आदमी प्लैटफॉर्म से ज़रा सा नीचे जाता है. ज़रा सा नीचे मतलब कुछ इंच या एकाध फुट. सुसाइड करने वाले लोग जिस तरीके से फांसी पर लटकते हैं, वो शॉर्ट ड्रॉप मेथड ही है.

1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों द्वारा भारतीयों को दी गई फांसी. शॉर्ट ड्रॉप मैथड ही है. (सोर्स - विकिमीडिया)
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों द्वारा भारतीयों को दी गई फांसी. शॉर्ट ड्रॉप मेथड ही है. (सोर्स – विकिमीडिया)

आस्ट्रिया-हंगरी में फांसी के लिए पोल मेथड खूब चली. पोल मेथड का ड्रॉप भी लगभग शॉर्ट ड्रॉप जैसा ही होता है. बस इसमें आदमी को एक पोल यानी खंबे से लटकाया जाता है.

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पोल मेथड में कम सेटअप की ज़रूरत होती है. इसलिए मास में लोगों को मारने के लिए इसका इस्तेमाल होता था. (सोर्स – विकिमीडिया)

शॉर्ट ड्रॉप और पोल मेथड में एक ही तरीके से मौत होती है. दम घुटने से. जैसे ही फांसी का फंदा गले में कसता है गले की नसें ब्लॉक होने लगती हैं. वो नसें जो दिमाग में ऑक्सीजन पहुंचाती हैं. जब दिमाग में ऑक्सीजन नहीं पहुंचती, तो आदमी तड़पता है. उसी तरह जैसे चीता हिरण को तड़पाता है. और कुछ देर बाद उसकी मौत हो जाती है.

मेडिकल टर्मिनोलॉजी में गला घुटने के स्ट्रैंग्युलेशन कहते हैं. और स्ट्रैंग्युलेशन में यही दिक्कत है कि आदमी अपने आखिरी वक्त में तड़पता बहुत है.

चीता सबसे पहले गर्दन पर ही हमला करता है. (सोर्स - विकिमीडिया)
चीता सबसे पहले गर्दन पर ही हमला करता है. (सोर्स – विकिमीडिया)

रहम वाली फांसी

इस तड़प को देखते हुए फांसी के ‘ह्यूमेन’ तरीके तलाशे जाने लगे. ह्यूमेन मतलब मानवता भरे तरीके. थोड़े दयालु तरीके. और ये दयालु तरीका था झटके से गर्दन का टूटना.

1866 में सैमुअल हॉग्टन नाम के एक डॉक्टर ने स्टैंडर्ड ड्रॉप मेथड इजाद की. स्टैंडर्ड ड्रॉप से लटकाने वाले को प्लैटफॉर्म से एक फिक्स दूरी तक नीचे गिराया जाता है. ये दूरी लगभग 5 फुट थी. अलग-अलग जगह ये 4 से 6 फुट के बीच होती है.

लीवर खींचने से ये किवाड़ खुलता है. और आदमी नीचे चला जाता है. लेफ्ट वाली तस्वीर नीचे की है.(सोर्स - विकिमीडिया)
लीवर खींचने से ये किवाड़ खुलता है. और आदमी नीचे चला जाता है. लेफ्ट वाली तस्वीर प्लेटफॉर्म से नीचे की है.(सोर्स – विकिमीडिया)

इस मेथड से गले में फंदा कसते समय रस्सी लगभग 5 फुट ढीली छोड़ी जाती है. जब लीवर खींचा जाता है और कैदी के पैरों के नीचे से ज़मीन गायब हो जाती है. कैदी 5 फुट तक नीचे गिरता है. और 5 फुट के बाद फंदे से उसकी गर्दन में झटका लगता है. इस झटके से उसकी गर्दन टूट जाती है. गर्दन टूटने से वो तुरंत बेहोश हो जाता है. और कुछ देर बाद मौत हो जाती है.

बायोलॉजी

लेकिन गर्दन में ऐसा क्या टूट जाता है कि कैदी तुरंत शांत हो जाता है? यहां देखनी होगी थोड़ी सी बायोलॉजी. और इस बायोलॉजी में होगी हमारी रीढ़ की हड्डी.

हम जिसे स्पाइन या रीढ़ की हड्डी कहते हैं वो कोई एक हड्डी नहीं है. वो 33 हड्डियों से बना एक ढांचा है. दिमाग से कूल्हों तक फैला ढांचा. इस ढांचे के अंदर हमारे शरीर की सबसे ज़रूरी पाइपलाइन डली हुई है. पाइपलाइन का नाम है स्पाइनल कॉर्ड (मेरूरज्जु). स्पाइनल कॉर्ड के ज़रिए दिमाग शरीर के सबसे मेन हिस्सों को कंट्रोल करता है. स्पाइन की 33 हड्डियां स्पाइनल कॉर्ड को बचाकर रखती हैं. क्योंकि अगर स्पाइनल कॉर्ड में कुछ भी हुआ तो खेला खतम.

रीड की हड्डी लेफ्ट से राइट में ज़ूम होते होते जा रही है.(सोर्स - विकिमीडिया)
रीढ़ की हड्डी लेफ्ट से राइट में ज़ूम होते होते जा रही है.(सोर्स – विकिमीडिया)

फांसी का फंदा स्पाइन की दूसरे नंबर की हड्डी के पास लगा होता है. इस हड्डी का नाम है C2 या एक्सिस. फांसी का झटका एक्सिस को फ्रैक्चर कर देता है. एक्सिस के फ्रैक्चर होने से स्पाइनल कॉर्ड डैमेज हो जाती है. इस फ्रैक्चर का मेडिकल नाम पड़ा है हैंगमैन्स फ्रैक्चर (हैंगमैन मतलब जल्लाद). बहुत बार कार एक्सीडेंट्स में हैंगमैन फ्रैक्चर होने से ही जान जाती है.

हैंगमैन्स फ्रैक्चर होते ही ब्लड प्रेशर ज़ीरो हो जाता है. आदमी होश खो बैठता है. और बिना तड़प के कुछ मिनटों में ही उसकी मौत हो जाती है. कम दर्दनाक मौत.

स्टैंडर्ड ड्रॉप पहले से कम दर्दनाक तो है लेकिन इसमें एक दिक्कत है. ये मेथड हर किसी को बराबर दूरी तक नीचे गिराती है. और इससे हर किसी के झटके में फर्क होता है. हल्के आदमी को हल्का झटका और भारी आदमी को ज़ोर का झटका.

1872 में इंग्लैंड के विलियम मारवुड ने लॉन्ग ड्रॉप मेथड सामने रखी. इस मेथड में वज़न के हिसाब से ड्रॉप डिसाइड किया जाता है. ऐसा क्यों करते हैं? इसके पीछे फिज़िक्स है.

लेफ्ट में सैमुअल हॉग्टन. राइट में विलियम मारवुड.(सोर्स - विकिमीडिया)
लेफ्ट में सैमुअल हॉग्टन. राइट में विलियम मारवुड.(सोर्स – विकिमीडिया)

फिज़िक्स 

आप एक प्लास्टिक बॉल को 5 फीट की ऊंचाई से गिराइए. और एक कॉर्क बॉल को उतनी ही हाईट से गिराइए. कोई नीचे खड़ा होगा तो प्लास्टिक बॉल से सिर पर हल्की चोट आएगी. लेकिन कॉर्क बॉल से सिर फट जाएगा. दोनों को बराबर ऊंचाई से गिराया. टकराते वक्त दोनों गेंदों की स्पीड बराबर थी. फिर कॉर्क बॉल से सिर क्यों फट रहा है? क्योंकि कॉर्क बॉल का वज़न ज़्यादा है.

प्लास्टिक की बॉल और कॉर्क की बॉल. (सोर्स - विकिमीडिया)
प्लास्टिक की बॉल और कॉर्क की बॉल. (सोर्स – विकिमीडिया)

ये तो कॉमन सेंस वाली बात हुई लेकिन फिज़िक्स का हिसाब क्या है –

Momentum = Mass x Velocity( मोमेंटम = द्रव्यमान x वेग)
Force = Change in Momentum( बल = मोमेंटम में बदलाव)

तो कुल मिलाकर बात ये कि टक्कर के वक्त भी ज़्यादा भारी चीज़ को ज़्यादा बड़ा झटका लगता है.

वापस फांसी पर लौटते हैं. सबकी गर्दन पर लगभग बराबर झटका लगे इसलिए अंग्रेज़ लॉन्ग ड्रॉप मेथड फॉलो करने लगे. और जिन देशों पर अंग्रेज़ों का प्रभाव था वो भी यही मेथड फॉलो करते हैं. जैसे कि इंडिया. इंडिया के जेल मैनुअल्स में वज़न और ड्रॉप की एक टेबल होती है. इसी हिसाब से रस्सी को ढील दी जाती है. क्यूरिअस प्राणियों के लिए वो टेबल ये रही –

दिल्ली के जेल मैनुअल से निकाली तालिका.
दिल्ली के जेल मैनुअल से निकाली तालिका.

इस टेबल में वज़न पाउंड(lbs) में लिखा है. इसे किलो में तौल लेते हैं –

45.3 किलो से कम वज़न वाले – 7 फिट का ड्रॉप
54.4 किलो से कम वज़न वाले – 6 फिट का ड्रॉप
63.5 किलो से कम वज़न वाले – 5.5 फिट का ड्रॉप
72.5 किलो से कम वज़न वाले – 5 फिट का ड्रॉप

देखा जा सकता है कि हल्के लोगों को ज़्यादा ड्रॉप दिया जाता है. और भारी लोगों को कम ड्रॉप दिया जाता है.

बताइए, फांसी देने के हिसाब में भी इतनी फिज़िक्स और बायोलॉजी होती है.


वीडियो – क्या है भारत में मौत की सज़ा मिलने के बाद फांसी देने की प्रक्रिया?

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