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इंडिया का वो बॉलर जिसने अपना पहला विकेट करियर की पहली गेंद पर लिया

इंडिया वर्सेज़ श्री लंका. अगस्त 1997. ये मैच कोलम्बो में खेला जा रहा था. इंडिया ने बैटिंग करनी शुरू की और 3 बल्लेबाजों ने सेंचुरी मारी. नवजोत सिंह सिद्धू, सचिन तेंदुलकर और मोहम्मद अज़हरुद्दीन. सचिन तेंदुलकर के लिए ये इनिंग्स खास थी क्यूंकि कहा जाता है कि कप्तानी के कारण सचिन की बल्लेबाजी गड़बड़ हो रही थी. सचिन ने बतौर कप्तान 143 रन बनाए. इस बीच राहुल द्रविड़ ने भी काम लायक 69 रन बनाए. इंडिया की पहली इनिंग्स का स्कोर था 537 रन. सचिन ने इनिंग्स डिक्लेयर की और श्रीलंका ने बल्लेबाजी शुरू की.

श्री लंका की हालत उस वक़्त ऐसी नहीं थी जैसी आज वो बांग्लादेश से हारती हुई दिखाई पड़ती है और उसे हर तीसरे हफ़्ते इंडिया से मैच नहीं खेलना पड़ता था. ये वो समय था जब श्री लंका की टीम में सनथ जयसूर्या और अरविन्द डिसिल्वा खेलते थे. ये दोनों ही तूफ़ान खड़ा करने के लिए काफ़ी थे. बाकी की टीम इन्हें बेहतरीन तरीके से सपोर्ट करती थी.

sanath jayasuriya arvind desilva

ये खेल 90 के दशक के अंत में खेला जा रहा था. इस वक़्त श्री लंका में स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. देश में राजनीतिक खलबली मची हुई थी. टीम इंडिया एक बेहद खूबसूरत ताज समुद्र होटल में रुकी हुई थी जिसके आस पास का इलाका छावनी में तब्दील किया जा चुका था. टीम इंडिया होटल में पूरी तरह सेफ थी. लेकिन उसे असली खतरा मैदान के बीचों-बीच था. जयसूर्या ने 340 रन बनाए. श्री लंका ने कुल 956 रन पीटे. इंडियन टीम बुरी तरह पिट रही थी.

इस पिटाई से ठीक एक दिन पहले कप्तान सचिन तेंदुलकर के नेतृत्व में टीम मीटिंग हुई. ये मीटिंग बंद कमरे में नहीं बल्कि होटल के उस फ़्लोर के गलियारे में हुई जिस फ़्लोर पर टीम रुकी हुई थी. वहां स्नैक्स रखे हुए थे और सनथ जयसूर्या को रोके जाने के लिए प्लान बनाए जा रहे थे. ऐसा सोचा गया कि वेंकटेश प्रसाद ही सनथ जयसूर्या को रोकेंगे और इसके लिए वो अपनी लेंथ में कुछ हल्का सा बदलाव करेंगे. सभी इस बात पर पूरी तरह से सहमत थे और ऐसा मालूम दे रहा था कि जयसूर्या का तोड़ निकाल लिया गया था.

अगली सुबह जब वेंकटेश ने प्लान के मुताबिक़ गेंद डाली, जयसूर्या ने गेंद को हल्के हाथों से फ्लिक किया और गेंद स्क्वायर लेग के ऊपर 6 रनों के लिए चली गई. ये शॉट अपने आप में इतना बेमन से मारा गया लग रहा था कि मैदान में खड़े सभी इंडियन प्लेयर्स एक दूसरे को देखकर हंस रहे थे. उन्हें समझ आ गया था कि पिछले दिन की की गई माथापच्ची का कोई फल नहीं मिलने वाला था. इसके बाद जयसूर्या को तब तक खेलते देखा गया जब तक 340 रनों पर सौरव गांगुली ने उनका कैच नहीं ले लिया.

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इस पिटाई और उस मीटिंग के ठीक पहले की एक और बात. श्री लंका को दिन का खेल ख़त्म होते-होते बैटिंग मिली थी. ये महेला जयवर्धने का पहला टेस्ट मैच था. इस मैच में इंडियन टीम में भी एक प्लेयर अपना डेब्यू कर रहा था. 6 फ़ुट 4 इन्च का ये लेफ़्ट आर्म स्पिनर सौरव गांगुली का रूम पार्टनर था. नीलेश कुलकर्णी. पहला और अब तक का एकमात्र भारतीय खिलाड़ी जिसने अपने टेस्ट करियर की पहली ही गेंद पर विकेट लिया. उसका शिकार था मर्वन अटापट्टू.

इंडिया के 550 से ज़्यादा के स्कोर के बाद पहली ही गेंद पर विकेट पाने वाले नीलेश ख़ुशी में कूद रहे थे. वो सोच चुके थे कि अगले दिन इंडियन बॉलिंग श्री लंका की बैटिंग को तोड़ कर रख देगी. लेकिन अगले रोज़ उन्हें एक भी विकेट नहीं मिला. पहली गेंद पर विकेट मिलने के बाद उन्होंने कुल 419 लीगल बॉल्स फ़ेंकी और उन्हें एक भी विकेट नहीं मिला. उनका फाइनल फिगर था – 70 ओवर 195 रन और 1 विकेट. सौरव गांगुली ने उस मैच में उनसे बेहतर बॉलिंग की. गांगुली ने 9 ओवर में 53 रन दिए और 2 विकेट लिए. इस मैच में बॉलर्स की धुलाई का आलम ये था कि अनिल कुंबले ने 1 इनिंग्स में 223 रन दिए और रांची के ऑफ़ ब्रेक बॉलर राजेश चौहान ने 276 रन दिए.

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नीलेश कुलकर्णी ने इसके बाद एक और टेस्ट मैच में खेला जो कि श्री लंका के ही खिलाफ़ था. लेकिन इस बार वो भारतीय पिच पर था. उन्हें 2001 में ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ के लिए एक बार फिर बुलाया गया जो कि उनका आख़िरी टेस्ट मैच था. उन्होंने कुछ वन-डे मैचों में भी खेला लेकिन बदकिस्मती का आलम ये था कि वो नेशनल टीम में रहते हुए कोई बहुत बड़ा इम्पैक्ट नहीं डाल सके. टेस्ट करियर की पहली ही गेंद पर विकेट लेने का रिकॉर्ड भी उन्हें कोई बहुत बड़ी पहचान नहीं दिला सका.

हालांकि उन्होंने डोमेस्टिक सर्किट में कुछ बेहतरीन परफॉरमेंस दीं. 1994 में मुंबई के लिए अपने डेब्यू के बाद टीम के मुख्य गेंदबाज़ों में से एक रहे. बड़ौदा के ख़िलाफ़ उन्होंने 124 रन देकर 10 विकेट्स लिए. तीन अप्रैल 1973 को पैदा हुए नीलेश ने 2010 में लगातार टीम से अंदर और बाहर होते रहने के बाद रिटायरमेंट ले लिया.


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