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नील नदी पर डैम को लेकर लड़ने को तैयार हैं इथियोपिया, मिस्र और सूडान?

छुटपन में पढ़ी जाने वाली जनरल नॉलेज की क़िताबों में कुछ नाम स्थायी थे. उनमें से एक थी, दुनिया की सबसे लंबी नदी- नील. हमने पढ़ा था, ये मिस्र की जीवनरेखा है. यही नदी है, जिसकी घाटी में वहां एक महान सभ्यता जन्मी. उस सभ्यता के राजा, जिन्हें मिस्र में फ़ेरो कहते थे, इस नदी को पूजते थे. जिस इलाके में बारिश की एक बूंद न गिरती हो, वहां इसी नील की लाई बाढ़ मिट्टी को नमी देती थी. इसी के किनारे इंसानों ने पहली बार खेती का गुर सीखा. इस देश के साथ ये नदी यूं जुड़ी है कि लोग कहते हैं, नील नहीं तो मिस्र नहीं.

लेकिन नील केवल मिस्र की धरोहर नहीं है.

कई और देशों का मुस्तकबिल भी इस नदी से जुड़ा है. उनमें से ही एक देश इस नदी को बांधने पर अड़ा है. उसकी ये कोशिश बाकियों के लिए अस्तित्व का सवाल बन गई है. इस बात पर इतना मनमुटाव है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला, तो जंग छिड़ सकती है. ये क्या मामला है, विस्तार से बताते हैं आपको.

इस कहानी की सेंट्रल किरदार है नील नदी. जिसे अंग्रेज़ी वाले नाइल पुकारते हैं. ये नाम हिब्रू भाषा के एक शब्द ‘नहल’ से निकला है. इसका मतलब होता है, नदी घाटी. करीब 6,650 किलोमीटर लंबी ये नदी शुरू होती है युगांडा और तंजानिया स्थित सबसे बड़ी अफ्रीकी झील ‘लेक विक्टोरिया’ से. वहां से उत्तर की ओर बहते हुए ये भूमध्यसागर में आकर मिल जाती है. अपनी इस हज़ारों किलोमीटर लंबी यात्रा के दौरान ये नदी 10 देशों से गुज़रती है. इनके नाम हैं- मिस्र, इथियोपिया, बुरुंडी, तंजानिया, रवांडा, कॉन्गो, केन्या, युगांडा, सूडान और साउथ सूडान.

Nile River Map
नील नदी 10 देशों से गुजरती है. (फोटो: गूगल मैप्स)

आपने नदी का रास्ता समझ लिया. अब आते हैं इसके पानी में.

नील के रिवर बेसिन में दो हिस्से हैं. पहला, इथियोपिन हाइलैंड. दूसरा, ग्रेट इक्वाटोरियल लेक्स. अब ये रिवर बेसिन क्या होता है? आसान भाषा में इसको समझिए वो इलाका, जहां से नदी को उसका पानी मिलता है. नील नदी के इन दो रिवर बेसिन्स में सबसे अहम है इथियोपिन हाइलैंड्स. नील नदी में जितना पानी है, उसका 85 फीसदी हिस्सा इसी इलाके से आता है.

जैसा कि नाम से ज़ाहिर है, इथियोपिन हाइलैंड्स के इस इलाके में मुख्य हिस्सेदारी है इथियोपिया की. उसने सोचा, जब नदी का 85 फीसदी पानी हमारे यहां से निकलता है तो क्यों न हम इसका फ़ायदा उठाएं. अब नदी का फ़ायदा कैसे लेंगे आप. एक तो आप इसके पानी से इंसानों, खेतों और कारखानों की प्यास बुझाएंगे. दूसरी बड़ी उपयोगिता है पनबिजली. इथियोपिया में वैसे भी आधी आबादी अंधेरे में रहती है. ऐसे में उसने सोचा कि अगर हम अपने हिस्से की नदी पर एक विशाल पनबिजली परियोजना शुरू करें, तो अपने घर का अंधेरा मिटेगा. साथ-साथ, पड़ोसी देशों को बिजली बेचकर पैसे भी आएंगे. इसी इरादे से उसने शुरू किया- ग्रैंड इथियोपिन रेनेसॉन्स डैम प्रॉजेक्ट. शॉर्ट में इसका नाम है, GERD.

Nile River Basin
नील नदी के बेसिन (फोटो: वर्ल्ड बैंक)

2011 में इस GERD पर काम शुरू हुआ

अब तक इसका 74 फीसद काम पूरा हो चुका है. काम पूरा होने के बाद ये पूरे अफ्रीका का सबसे बड़ा हाइड्रोइलेक्ट्रिक डैम होगा. मालूम है, इसके जलाशय का साइज़ कितना बड़ा होगा? लंदन है न, उससे भी बड़ा. करीब 1,874 किलोमीटर स्क्वैयर में फैले इसके जलाशय में 74 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी जमा हो सकेगा. इस प्रॉजेक्ट से कितनी बिजली बनेगी? करीब 6,000 मेगावॉट बिजली.

इस GERD प्रॉजेक्ट को लेकर 22 जुलाई को एक बड़ा अपडेट आया. इस दिन इथियोपिया ने बताया कि GERD में पानी भरने की प्रक्रिया का पहला चरण पूरा हो गया. अब 2023 तक ये बांध अपनी पूरी क्षमता में बिजली उत्पादन करने लगेगा. इस ऐलान से इथियोपिया के लोग कई दिन तक त्योहार मनाते रहे. हज़ारों-हज़ार लोग हाथ में इथियोपियन झंडा लिए लोग सड़कों पर निकलकर नाच रहे थे. इथियोपिन जनता इतनी ख़ुश इसलिए है कि उन्हें लग रहा है, ये बांध उनका मसीहा बनेगा. उनकी गरीबी ख़त्म कर देगा.

Ethiopia Nile Dam Celebration
22 जुलाई को इथियोपिया के लोग हाथ में इथियोपियन झंडा लिए लोग सड़कों पर निकलकर नाच रहे थे. (फोटो: एपी)

एक तरफ इथियोपिया में जलसा मन रहा था. दूसरी तरफ उसके पड़ोसी सूडान और मिस्र में गहरी उदासी थी. क्यों? क्योंकि उन्हें लगता है, ये बांध उनकी बर्बादी लाएगा. इस चिंता का क्या कारण है? कारण है अस्तित्व का संकट. मिस्र की 95 फीसदी आबादी नील के किनारे या फिर इसके डेल्टा वाले एरिया में रहती है. अपने पानी की ज़रूरतों के लिए वो पूरी तरह नील पर निर्भर हैं.

1959 का जल समझौता

ये निर्भरता आज से नहीं, हमेशा से है. इसीलिए मिस्र ने सदियों से इस नदी पर एकाधिकार बनाए रखा. आधुनिक दौर में भी उसने अपनी भौगोलिक अहमियत के सहारे नील पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा. अपने पड़ोसियों पर एकतरफ़ा समझौते लादे. मसलन, 1959 में किया गया जल समझौता. ये ट्रीटी हुई मिस्र और सूडान के बीच. इसके तहत नील का कमोबेश समूचा पानी मिस्र और सूडान के बीच बंट गया. इतना ही नहीं, इस समझौते में मिस्र ने ख़ुद को एक वीटो पावर भी दिया. कहा कि भविष्य में नील नदी पर कोई भी परियोजना उसकी मंज़ूरी के बिना नहीं बनेगी. अपनी इस पावर की मदद से मिस्र ने अपने किसी पड़ोसी को नील की सहायक नदी पर भी कोई बड़ी परियोजना नहीं बनाने दी. हां, लेकिन जब अपनी बारी आई तो 1960 के दशक में उसने नील पर असवान नाम का एक बांध बना लिया. इस असवान डैम ने नील के मौसमी बहाव का इस्तेमाल किया और मिस्र की खेती का चेहरा बदल दिया.

Aswan High Dam 1960
मिस्र ने 1960 के दशक में नील पर असवान नाम का एक बांध बना लिया था. (फोटो: एएफपी)

इथियोपिया को मिस्र की इस दादागिरी से दिक्कत थी. उसने कहा, दिस इज़ नॉट फेयर ब्रो. हमारे यहां से बहकर पानी जाता है और हमको ही हिस्सा नहीं दे रहे हो. पक्षपात की शिकायतों के कारण इथियोपिया ने 1959 के समझौते को मानने से इनकार कर दिया. फिर जब मिस्र ने असवान डैम बनाया, तो 1978 में इथियोपिया ने भी एक बांध बनाने की बात कही. मगर मिस्र ने अपने दबदबे के सहारे उसे ये बांध बनाने नहीं दिया. ऐसे में इथियोपियन्स के लिए ये बहुत भावुक मसला बन गया.

इथियोपिया के अलावा नील के किनारे बसे कुछ और देश भी मिस्र और सूडान की मनमानी से नाराज़ थे. इनमें से छह मुल्कों ने साल 2010 में एक अलग संधि कर ली. ये छह देश थे- इथियोपिया, युगांडा, केन्या, रवांडा, तंजानिया और बुरुंडी. इन देशों ने नदी से जुड़ी सिंचाई परियोजनाओं और बांध निर्माण पर आपसी सहमति भी बना ली. चूंकि ये समझौता मिस्र और सूडान के प्रभुत्व को ख़त्म करता था, ऐसे में इन दोनों देशों ने इसका बहिष्कार किया. इनके बहिष्कार के बावजूद इथियोपिया जो आधार चाहता था, वो उसे इस समझौते से मिल गया.

1959 Egypt Sudan Agreement
मिस्र और सूडान के बीच 1959 में हुआ था समझौता.

संधि के अगले बरस साल इथियोपिया ने शुरू किया GERD प्रॉजेक्ट

इस परियोजना पर मिस्र और सूडान ने आपत्ति उठाई. उनका कहना था कि इस बांध के कारण उनका पानी घट जाएगा. कितना पानी? मिस्र के मुताबिक, बांध का जलाशय भरने के कारण उनकी जल आपूर्ति 36 फीसद घट जाएगी. सूडान को पानी में कमी की आशंका के अलावा एक और डर है. ये GERD उसकी पूर्वी सीमा से करीब 20 किलोमीटर दूर है. इधर की ही तरफ सूडान का रोज़रीज़ डैम है. उसको डर है कि इथियोपिन बांध के कारण उसके अपने बांध को पानी नहीं मिलेगा.

इन्हीं आपत्तियों के तहत सूडान और मिस्र ने इथियोपिया ने इस GERD प्रॉजेक्ट को रुकवाने की बहुत कोशिश की. बहुत दौर की वार्ताएं हुईं, मगर इथियोपिया नहीं माना. तनाव इतना बढ़ा कि मिस्र ने सैन्य ताकत के इस्तेमाल की भी धमकी दी. बात होने लगी कि मिस्र हवाई बमबारी से इस अंडर कन्स्ट्रक्शन बांध को तोड़ सकता है. इंटरनैशनल मीडिया में ख़बरें छपने लगीं कि अगर ऐसा हुआ, तो मिस्र अपने कौन से विमान इस्तेमाल करेगा. मगर तमाम धमकियों के बावजूद बांध बनना जारी रहा.

Ethiopia Dam
इथियोपिया ने 2011 में नील पर डैम पर शुरू किया और इसे 2023 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा हुआ है. (फोटो: एपी)

अब फिर लौटते हैं मौजूदा स्थिति पर. हमने आपको बताया कि GERD 74 फीसदी बन चुका है. मिस्र और सूडान इसे बनने से तो नहीं रोक सके. ऐसे में अब उन्होंने अपनी रणनीति बदल ली है. वो इस बांध के जलाशय को भरे जाने के टाइमटेबल पर समझौता करना चाहते हैं. दोनों देश ये आश्वासन भी चाहते हैं कि सूखे की स्थिति में इथियोपिया GERD के जलाशय से ज़रूरी पानी छोड़े.

कहां पहुंचा है नया समझौता?

अफ्रीकन यूनियन जैसी संस्थाओं के बीचबचाव के कारण तीनों देशों के बीच सूखे की परिभाषा तय हो गई है. तीनों ने मान लिया है कि जब इस बांध में नील का सालाना बहाव 35 से 40 बिलियन क्यूबिक मीटर से नीचे चला जाएगा, तो समझेंगे कि सूखे की हालत है. सूडान और मिस्र चाहते हैं कि सुखाड़ की स्थिति में इथियोपिया कितना पानी छोड़ेगा, ये तय हो. जबकि इथियोपिया कह रहा है कि जैसे हालात होंगे, उसके हिसाब से वो ख़ुद ही फैसला करेगा.

इस मतभेद के बीच ही इथियोपिया ने अपने पड़ोसियों की आपत्ति के बावजूद जलाशय के भरने का पहला स्टेज पूरा किया. इससे चिढ़कर 4 अगस्त को मिस्र ने बातचीत रोक दी. सूडान ने भी वार्ता से हटने की धमकी दी. इनका कहना है कि इथियोपिया बांध से जुड़े समझौते में ब्लू नील के पानी का बंटवारा भी शामिल करना चाहता है. ब्लू नील, नील नदी की सबसे प्रमुख सहायक नदी है. सूडान और मिस्र के मुताबिक, 1959 के जल समझौते में इस मसले का फाइनल सेटलमेंट हो चुका है. अब इसपर दोबारा बात नहीं होगी. दिक्कत ये है कि जिस 1959 समझौते का ये दोनों देश वास्ता दे रहे हैं, उसको इथियोपिया ने तो कभी माना ही नहीं था.

Nile River Dam
जिस 1959 समझौते की बात मिस्र और सूडान कर रहे हैं, इथियोपिया ने तो कभी माना ही नहीं. (फोटो: एपी)

जावेद अख़्तर ने कितनी सरलता से लिख दिया था- पंछी नदिया पवन के झोंके, कोई सरहद न इन्हें रोके. मगर इस मामले में सभी पक्ष नदी को अपनी-अपनी बपौती समझ रहे हैं. मिस्र को लगता है, नील उसका जन्मसिद्ध अधिकार है. वहीं इथियोपिया को लगता है, नदी तो उसकी भी है. फिर वो क्यों न इसके सहारे अपनी गरीबी मिटाए. अगर दोनों पक्ष एक-दूसरे की चिंताओं को समझते हुए किसी कॉमन ग्राउंड को पकड़ें, तो मसला सुलझा सकता है. इस परियोजना के सहारे पूरे पूर्वी अफ्रीका को सस्ती बिजली मिल सकती है. वरना फिर पूरे इलाके में तनाव बढ़ेगा और इसकी वजह से जंग की भी नौबत आ सकती है.


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