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नाइजर को बर्बाद करने में इस्लामिक आतंक का क्या रोल है?

आज बात होगी एक पैटर्न की. जिसमें हमलावर बाइक पर बैठकर आते हैं. इंटरनैशनल बॉर्डर पार करते हैं. रास्ते में जो गांव मिले, वहां ख़ून की होली खेलते हैं और फिर उसी रास्ते से वापस लौट जाते हैं. किसी और मुल्क़ में ऐसी घटना हंगामा मचा देती. लेकिन जहां ऐसा हो रहा है, वहां ये सब ‘न्यू नॉर्मल’ बन चुका है. कोई ऐसा हफ़्ता नहीं जाता, जब नरसंहार की ख़बर न आए. ये हो कहां रहा है? हत्यारे कौन हैं और उनका मकसद क्या है? ये सब रोकने के लिए इंटरनैशनल कम्युनिटी क्या कर रही है? सब विस्तार से बताते हैं.

ये कहानी है नाइजर की

देश का नाम नाइजर नदी के नाम पर पड़ा है. नाइजर और नाइजीरिया, दोनों अलग-अलग देश हैं. पड़ोसी भी. आपस में कंफ्यूज न हों. याद रखने के लिए, नाइजर में फ़्रांस का उपनिवेश था जबकि नाइजीरिया ब्रिटेन की कॉलोनी थी.

नाइजर, हर तरफ से ज़मीन से घिरा है. इसकी आबादी लगभग 2.33 करोड़ है. नाइजर को दुनिया के सबसे ग़रीब और सबसे असुरक्षित देशों में गिना जाता है. इसके पड़ोसी देशों में हैं- नाइजीरिया, चाड, बुर्किना फासो, लीबिया, बेनिन, माली और अल्जीरिया. आज से पांच हज़ार साल पहले नाइजर में खूब हरियाली थी. भरा-पूरा जंगल था. भरपूर जैव विविधता थी.

Niger
नाइजर को दुनिया के सबसे ग़रीब और सबसे असुरक्षित देशों में गिना जाता है. (लाल घेरे में नाइजर, तस्वीर: गूगल मैप्स)

फिर यहां का भूगोल बदल गया. सहारा ने नाइजर के इलाकों पर कब्ज़ा जमाना शुरू किया. आज के समय में नाइजर का 80 फीसदी इलाका रेगिस्तान है.

1890 में नाइजर पर फ़्रांस का अधिकार हो गया. उन्होंने यहां से ग़ुलामों और खनिजों की तस्करी की. फ़्रांस को स्थानीय तुआरेग कबीलों का विरोध झेलना पड़ा. लेकिन उनकी सैन्य शक्ति के सामने कबीले कमज़ोर साबित हुए. दूसरे विश्व युद्ध के बाद वैश्विक राजनीति का स्वरूप बदलने लगा था. कॉलोनियां ख़ुद को आज़ाद घोषित कने लगीं थी. यही चलन अफ़्रीका में भी शुरू हुआ. 1960 में फ़्रेंच वेस्ट अफ़्रीका का विघटन हो गया. इसी के तहत नाइजर को भी आज़ादी मिल गई.

हमानी डियोरी देश के पहले राष्ट्रपति बने

डियोरी ने एकदलीय व्यवस्था रखी. विपक्ष की गुंज़ाइश ही नहीं बची. 1968 में देश में अकाल पड़ गया. जनता भूख से मरने लगी. पता चला कि डियोरी के मंत्रियों के घरों पर अनाज की बोरियां रखी हैं. इससे जनता भड़क गई. इसका फायदा उठाया मिलिट्री जनरल सेयनी काउंशे ने. उन्होंने डियोरी को कुर्सी से हटा दिया.

Hamani Diori
नाइजर के पहले राष्ट्रपति हमानी डियोरी. (तस्वीर: एएफपी)

ये नाइजर में मिलिट्री शासन की शुरुआत थी. साथ में बहुत सारी समस्याओं की भी. जनता का प्रतिनिधित्व ना के बराबर रह गया. समय के साथ-साथ आम लोग हाशिए पर धकेले जाते रहे. उनके हितों की बात न तो तब की गई, और न ही अब, जबकि देश में लोकतांत्रिक सरकार आ चुकी है. नाइजर की कहानी वहां के लोगों की बदनसीबी से गुंथी हुई है.

एक और फ़ैक्ट याद रख लीजिए. जब अमेरिका और ब्रिटेन, इराक़ पर हमला करने का बहाना खोज रहे थे. तब कहा गया कि इराक़ी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन वेस्ट अफ़्रीका के एक देश से यूरेनियम खरीद रहे हैं. ताकि वो अपने देश में परमाणु हथियार विकसित कर सकें. वेपन्स ऑफ़ मास डिस्ट्रक्शन. वेस्ट अफ़्रीका का वो देश नाइजर ही था.

Seyni Kountche
नाइजर मिलिट्री जनरल सेयनी काउंशे. (तस्वीर: एएफपी)

आज हम नाइजर की चर्चा क्यों कर रहे हैं?

वजह है, एक और हमला. एक और नरसंहार. सोमवार, 22 मार्च की सुबह एक बार फिर वही पैटर्न दोहराया गया. हमलावर मोटरसाइकिलों पर सवार होकर आए. उन्होंने बंदूकें चढ़ा रखीं थी. गांव में घुसते ही उन्होंने गोलियां चलानी शुरू कर दीं. जो भी चीज़ हरक़त करती दिखी, उसे गोली मार दी गई. ये तांडव तीन घंटे तक चला. इस हमले में कुल 137 लोग मारे गए. नाइजर सरकार ने तीन दिनों के ‘राष्ट्रीय शोक’ का ऐलान किया है.

ये वीभत्स हमला नाइज़र की शीर्ष अदालत के उस फ़ैसले के ठीक एक दिन बाद आया है, जिसमें मोहम्मद बज़ूम की जीत को वैध ठहराया गया. दरअसल, फ़रवरी 2021 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में मोहम्मद बज़ूम की पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला था. विपक्ष ने इस नतीजे को मानने से मना कर दिया. राजधानी नायामी में हिंसक प्रदर्शन हुए. इसमें दो लोगों की मौत भी हो गई.

Mohamed Bazoum
मोहम्मद बज़ूम 02 अप्रैल को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे. (तस्वीर: एएफपी)

चुनावी नतीजों के ख़िलाफ़ विपक्षी पार्टियां अदालत चली गईं. उन्होंने बज़ूम पर धांधली के आरोप लगाए. कहा कि बज़ूम ने चुनाव जीतने के लिए अवैध तरीकों का इस्तेमाल किया. अदालत ने सुनवाई के बाद इन आरोपों को खारिज कर दिया. और, बज़ूम के राष्ट्रपति बनने पर मुहर लगा दी. मोहम्मद बज़ूम 02 अप्रैल को राष्ट्रपति पद की शपथ लेंगे. वो मोहम्मदु इसुफ़ु की जगह लेंगे. जो दो कार्यकाल के बाद पद खाली करने वाले हैं. संविधान में व्यवस्था है कि एक व्यक्ति लगातार दो बार से अधिक राष्ट्रपति नहीं रह सकता है. नाइज़र में पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन हुआ है.

मोहम्मद बज़ूम पिछली सरकार में आंतरिक मामलों के मंत्री थे. उन्होंने नाइजर की समस्या को करीब से देखा है. उनसे उम्मीद लगाई जा रही है कि वो आतंकवाद और सुरक्षा के मुद्दे को प्राथमिकता देंगे. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो बज़ूम की जीत उसी उम्मीद का नतीजा है. लेकिन बज़ूम की राह इतनी भी आसान नहीं होगी. 22 मार्च को हुआ हमला इस चुनौती का एक उदाहरण है.

Mahamadou Issoufou
नाइजर के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मदु इसुफ़ु. (तस्वीर: एएफपी)

एक नज़र डालते हैं हालिया समय की कुछ बड़ी घटनाओं पर-

16 मार्च 2021

माली बॉर्डर के पास का टिलाबेरी प्रांत. लोग पास के बाज़ार से खरीदारी कर अपने गांव वापस लौट रहे थे. रास्ते में उनकी गाड़ियों को रोका गया. फिर उनके ऊपर गोलियां बरसाई गईं. इस हमले में 58 बेकसूर लोग मारे गए. मरनेवालों में छह बच्चे भी थे.

21 फ़रवरी 2021

दक्षिण-पश्चिम का डारगोल गांव. यहां राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी चल रही थी. इलेक्शन कमीशन की एक गाड़ी बैलेट बॉक्स और पोलिंग अधिकारियों को पहुंचाने जा रही थी. गाड़ी अचानक से लैंडमाइन पर चढ़ गई. धमाके में सात लोगों की मौत हो गई.

02 जनवरी 2021

टिलाबेरी प्रांत में दो गांवों को निशाना बनाया गया. इस बार हमलावर 100 से ज़्यादा मोटरसाइकिलों पर आए थे. गांव में घुसते ही उन्होंने गोलीबारी शुरू कर दी. हमले में लगभग सौ लोग मारे गए. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हमलावर अपने दो साथियों की हत्या का बदला लेने आए थे. दरअसल, हमलावरों का गुट गांव में उगाही करता था. लोग इससे परेशान हो गए थे. 15 दिसंबर 2020 को गांववालों ने मिलकर दो बदमाशों की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी.

09 अगस्त 2020

राजधानी नायामी के पास एक जिराफ़ रिजर्व पार्क. फ़्रांस के छह ऐड वर्कर्स यहां घूमने आए थे. उनके साथ एक स्थानीय गाइड और ड्राइवर भी था. हमलावरों ने उन्हें पार्क में ही घेरकर मार डाला. फिर उनकी गाड़ी में आग लगा दी. बाद में इस्लामिक स्टेट ऑफ़ ग्रेटर सहारा (ISGS) नामक आतंकी गुट ने इस कुकृत्य की ज़िम्मेदारी ली.

04 अक्टूबर 2017

अमेरिकी सैनिकों का एक दस्ता ‘टोंगा टोंगा’ कस्बे से बाहर निकला. उनके साथ नाइजर सैनिक भी थे. ये लोग स्थानीय नेताओं से मुलाक़ात करने आए थे. कस्बे से बाहर निकलने के कुछ ही मिनटों बाद धमाके की आवाज़ आई. 50 से ज्यादा हमलावरों ने बंदूकों और हैंड ग्रेनेड से उनपर हमला किया था. कई घंटों तक मुठभेड़ चली. इस हमले में चार अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई. एक सैनिक की लाश दो दिनों तक नहीं मिली.

ये तो हुई हालिया समय में हुए कुछ बड़े हमलों की बात. छोटे-मोटे हमलों की गिनती आपका सिर घुमा सकती है.

लेकिन इस अस्थिरता की वजह क्या है?

पहली वजह है इसका लोकेशन. नाइजर ‘साहेल’ क्षेत्र का हिस्सा है. सहारा मरुस्थल और सवाना ग्रासलैंड के बीच का इलाका. इसमें सूडान, चाड, बुर्किना फ़ासो, नाइजीरिया, माली, सेनेगल, मौरितेनिया जैसे देश आते हैं. इन देशों में ग़रीबी, भूखमरी और पलायन की समस्या चरम पर है. अधिकतर आबादी विदेशी सहायता पर निर्भर है. नाइजर भी इससे अछूता नहीं है. यहां की 40 फीसदी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे है. नाइज़र दुनिया के सबसे ग़रीब देशों में से एक है.

Niger People
नाइजर की 40 फीसदी आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे है. (तस्वीर: एएफपी)

दूसरी वजह है इस्लामिक आतंकवाद. नाइजर के पड़ोस में इस्लामिक आतंकवाद की समस्या लगातार बढ़ी है. नाइजीरिया में बोको हराम की क्रूरता दिल दहलाने वाली हैं. नाइजीरिया दावा करता है कि उसने बोको हराम को काबू कर लिया है. लेकिन ऐसा हुआ नहीं है. बोको हराम अब नाइजीरिया की सीमा से बाहर निकलकर हमला करने लगा है. अल-क़ायदा और इस्लामिक स्टेट की शाखाएं भी मज़बूत हुई हैं. इराक़, सीरिया और लीबिया में परास्त हुए आतंकी गुटों के लिए अफ़्रीका ‘सुरक्षित पनाहगाह’ बनकर उभरा है.

पश्चिमी देशों की सेनाएं पिछले एक दशक से इन्हें हराने की कोशिश में लगी हैं. अमेरिका साल 2000 से नाइज़र आर्मी को ट्रेनिंग दे रहा है. फ़्रांस, बेल्जियम, इटली, जर्मनी, कनाडा की आर्मी भी साहेल क्षेत्र में आतंकवाद से निपटने में जुटी है. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला है.

Niger Security Forces
दुनिया के कई देश नाइजार आर्मी को आतंकवाद से लड़ने में मदद कर रही है. (तस्वीर: एएफपी)

तीसरी वजह है, अधर में लटकी सरकारें. नाइज़र को अगस्त 1960 में फ़्रांस से आज़ादी मिल गई थी. लेकिन पहली बार फ़्री एंड फ़ेयर इलेक्शन हुए 1993 में. इस बीच कई बार तख़्तापलट हुआ. नाइजर में मिलिट्री शासन का लंबा इतिहास रहा है. जैसे ही चुनी हुई सरकार कमजोर पड़ती, मिलिट्री कुर्सी खींच लेती थी. सेना और सरकार के बीच तालमेल की कमी से स्थिति और बिगड़ी.

अभी वाले राष्ट्रपति मोहम्मदु इसुफ़ु मिलिट्री हुंटा को हटाकर ही सत्ता में आए थे. 2015 में कुछ आर्मी जनरलों ने मिलकर उनकी हत्या की साज़िश रच डाली थी. ये साज़िश कामयाब होती, उससे पहले ही इसुफ़ु को पता चल गया. उन्होंने जनरलों को जेल भिजवा दिया और अपनी कुर्सी बचा ली.

ये चुनौती मोहम्मद बज़ूम के सामने भी होगी. बज़ूम, युसुफ़ु के राइट-हैंड कहे माने जाते हैं. अपने गुरू से उन्होंने कितना सीखा और इस सीख को कितना अमल में ला पाएंगे, ये तो आनेवाला वक़्त ही बताएगा.

फिलहाल, नाइजर के लोगों के सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं. पहली है- बुनियादी ज़रूरतों की पूर्ति और दूसरी सुरक्षा.

Mahamane Ousmane
नाइजर के विपक्षी नेता मोहम्मने उस्मानी. (तस्वीर: एएफपी)

06 फ़रवरी को एक चुनावी रैली हुई. नाइजर के सबसे हिंसाग्रस्त इलाके टिलाबेरी में. विपक्षी उम्मीदवार मोहम्मने उस्मानी ने सवाल किया-

हम अपने मवेशियों को कैसे चराएं, मछलियां कैसे पकड़ें, अपने बच्चों को स्कूल कैसे भेजें, व्यापार कैसे करें, डॉक्टर के पास कैसे जाएं, अगर हमारी सुरक्षा की कोई गारंटी ही नहीं है?

इस सवाल का जवाब दो दिन बाद एक दूसरी चुनावी रैली में मिला. एक वादे की शक्ल में. सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद बज़ूम ने कहा-

नाइजर को सुरक्षित बनाने के लिए मैं अपनी जान लगा दूंगा.

बज़ूम का वादा बहुत हद तक विदेशी मदद पर टिका है. वो विदेशी सेनाओं के भरोसे नाइजर को सुरक्षित बनाना चाहते हैं. जानकार बताते हैं कि जब तक बाहरी मदद में स्वार्थ का पुट बना रहेगा, नाइजर की हालत सुधरने वाली नहीं है.

खैर, जनता ने बज़ूम के वादे पर भरोसा कर लिया है. वो सत्ता में आ गए हैं. वो अपने वादे और विदेशी प्रभाव को कितना साध पाते हैं, नाइजर का भविष्य उसी अनुपात पर निर्भर करेगा.


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