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लखनऊ के ड्रामा में ऐक्टिंग देखकर RAW ने पाकिस्तानी सेना में अफसर बनवा दिया

सुशांत सिंह राजपूत की नई फिल्म ‘रोमियो, अकबर, वॉल्टर’ का पोस्टर जारी हुआ है. पोस्टर में इन तीनों नामों को मिलाकर एक नाम बन रहा है RAW. भारत की सबसे चर्चित खुफिया एजेंसी का नाम. पोस्टर में बहुत छोटा सा 1971 भी लिखा हुआ है और ये भी कि फिल्म असली घटनाओं से प्रेरित है. पोस्टर में दो अलग-अलग बैकग्राउंड्स में तिरंगा और पाकिस्तान के झंडे जैसा दिख रहा है. सुशांत की फिल्म के पोस्टर में जिस तरह से लिखा है “Our hero?, their spy??” इससे लगता है कि ये कहानी ‘रॉ’ के 70 के दशक के इन दो सबसे चर्चित मिशन में से एक पर आधारित हो सकती है.

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ऑपरेशन ब्लैक टाइगर

1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर लाहौर जा रहे थे, तो पाकिस्तान में मुल्तान जेल में बंद एक हिंदुस्तानी कैदी बेचैनी से खबरों का इंतज़ार कर रहा था. कुछ कैदियों को सद्भावना के तौर पर रिहा किया जाना था. 47 साल के इस आदमी को अपनी रिहाई की उम्मीद थी. मगर ये उम्मीद कभी पूरी नहीं हुई. 2001 में रवींद्र कौशिक नाम के इस कैदी की दिल के दौरे से मौत हो गई.

कॉलेज टाइम में थिएटर आर्टिस्ट रहे रवींद्र कौशिक को लखनऊ में रॉ ने एक ड्रामा करते देखा. रॉ ने उन्हें रिक्रूट कर लिया. 1975 में रवींद्र, ‘नबी अहमद शाकिर’ के नाम से पाकिस्तान आर्मी के अकाउंट डिपार्टमेंट में शामिल हो गए. वहां सेना के एक टेलर की लड़की अमानत से निकाह भी किया और लंबे समय तक पाकिस्तान में रह कर हिंदुस्तानी सेना की मदद करते रहे. बताया जाता है कि ‘ब्लैक टाइगर’ के कोडनेम वाले रवींद्र के इनपुट से कम से कम 20,000 भारतीय सैनिकों की जान बची. 1983 में आईबी ने एक नया एजेंट इनायत मसीह पाकिस्तान भेजा. इस नए एजेंट के डिप्लॉयमेंट में कुछ लापरवाही हुई. इसका खामियाजा कौशिक को भुगतना पड़ा. उन्हें पकड़ कर दो साल टॉर्चर किया गया, फिर फांसी की सज़ा सुना दी गई. बाद में इस सज़ा को घटाकर उम्र कैद में बदल दिया गया.

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रवींद्र कौशिक

पकड़े जाने के बाद भारत सरकार ने कभी भी कौशिक को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया. मगर रवींद्र के घरवाले दावा करते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते रवींद्र की मां को खत लिख कर कहा था कि अगर रवींद्र एक्सपोज़ नहीं होते, तो पाकिस्तानी सेना में बड़े स्तर के अधिकारी होते.

गंगा प्लेन हाइजैक

1968 में स्थापित रॉ ने पाकिस्तान पर रणनीतिक दबाव बनाने के लिए 1971 में एक मिशन लॉन्च किया. पाक अधिकृत कश्मीर में अल-फतह नाम का एक आतंकवादी संगठन था. इसके 36 मेंबर बीएसएफ ने गिरफ्तार कर लिए. रॉ ने अपने एक एजेंट को ‘अल-फतह’ में भर्ती करवा दिया. पाकिस्तान की आईएसआई ने इस एजेंट को आतंकवादी समझ कर ट्रेन किया. उसे पाकिस्तानी सेना ने प्लेन उड़ाने और हाइजैक करने की ट्रेनिंग दी. कुछ कहानियां बताती हैं कि पाकिस्तान की योजना भारत के किसी हवाई जहाज को हाइजैक करवाने की थी.

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खुफिया मिशन की कहानियों में कई बार किस्सों और तथ्यों में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. इसके बाद की कहानी के कई वर्ज़न हैं. कुछ दावे बताते हैं कि रॉ के इस एजेंट ने डबल क्रॉस करने की कोशिश की थी मगर पता चल गया था. कुछ में बताया जाता है कि अलगाववादी मकबूल बट के साथी हाशिम कुरैशी ही वो एजेंट थे, जिनसे ज़ोर-जबरदस्ती करके इस खुफिया मिशन को अंजाम दिलवाया गया.

बहरहाल, एयर इंडिया का एक पुराना रिटायर हो चुका विमान ‘गंगा’ हाइजैक हुआ. विमान को लाहौर ले जाया गया. वहां जुल्फिकार अली भुट्टो ने हाइजैकर्स का स्वागत किया. उन्हें संरक्षण और हीरो जैसा दर्जा दिया गया. अल-फहत के 36 आतंकियों को रिहा करने की मांग हुई, जो पूरी नहीं हुई.

इसके बाद के घटनाक्रम में कुछ ऐसे बिंदु हैं जो इस पूरे प्रकरण में रॉ के शामिल होने की थ्योरी को हवा देते हैं. इस हाइजैक ने पाकिस्तान को रणनीतिक तौर पर बहुत नुकसान पहुंचाया था. हाईजैकिंग होते ही भारत ने पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों को मदद देने की बात दुनिया के सामने रखी. इसी आधार पर भारत के हवाई क्षेत्र से पाकिस्तान की फ्लाइट्स का निकलना बैन हो गया. इस बैन के चलते ही पाकिस्तानी सेना का बांग्लादेश पहुंचना काफी धीमा हो गया जिसका सीधा फायदा सेना को 1971 के युद्ध में मिला.

इसके बाद के घटना क्रम में कई रोचक बातें हैं

# शुरुआत में हाशिम कुरैशी को ISI ने हीरो बनाया, कुछ समय बाद ही हाशिम को पाकिस्तान में गिरफ्तार कर लिया गया.

#  हाईजैकर्स की कोई भी मांग नहीं मानी गई.

# अल फतह के कई एजेंट इसके बाद पकड़ लिए गए.

# गंगा के सारे यात्री पैदल रास्ते से लाहौर से अमृतसर आ गए. भारत ने गंगा को वापस लेने की कोई कोशिश नहीं की और पाकिस्तानी सेना ने उसको जला दिया.

# रॉ के कुछ पूर्व अधिकारियों का दावा है कि हाइजैकर बने हाशिम कुरैशी के पास महज खिलौना बंदूक और नकली ग्रेनेड था.  

 

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एमएल सिन्हा जैसे कई पूर्व इंटेलिजेंस अफसर और पाकिस्तान सरकार भी इस मिशन में भारत सरकार के शामिल होने की बात कह चुके हैं. मगर अलगाववादी कश्मीरी नेता के रूप में पहचान बना चुके हाशिम अभी भी इसे खारिज करते हैं. इन सभी मिशन का पूरा सच क्या होता है, जनता को कभी पता नहीं चल पाता है. फिल्म में भी कई घटनाओं को कल्पना के साथ मिलाकर एक फैंटेसी बुन दी जाती है. इस फिल्म में भी ऐसा होगा. मगर इस बहाने ही सही, गुमनाम रहकर देश के लिए काम करने वाले इन लोगों की कहानी के कुछ हिस्से सबके सामने आ जाते हैं.


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