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कभी कांग्रेस को 'मुन्नी से ज्यादा बदनाम' बताने वाले नवजोत सिंह सिद्धू ने कैसे पार्टी में अपना कद बढ़ाया?

नवजोत सिंह सिद्धू. एक शख़्स कई किरदार. क्रिकेटर रहे, कमेंटेटर बने, टीवी पर्सनैलिटी रहे. जहां भी गए सफलता हासिल की. इस दौरान अपने बोलने की शैली से लोगों का मनोरंजन करते रहे. फिर राजनीति में आ गए. शुरुआत की भारतीय जनता पार्टी (BJP) से. साल 2004 में BJP के टिकट पर चुनाव लड़ा और लोकसभा सांसद बने. लेकिन एक दशक बाद नवजोत सिंह सिद्धू “घर” लौटे. घर यानी कांग्रेस पार्टी. सिद्धू ने 2017 में कांग्रेस जॉइन कर ली. उनकी पुश्तें कांग्रेस में रही हैं. पिता भगवंत सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे और आज़ादी के बाद कांग्रेस से MLA बने. कांग्रेस जॉइन करते वक्त सिद्धू ने कहा था,

‘ये मेरी घर वापसी है. मैं पैदाइशी कांग्रेसी हूं. मेरे पिता ने कांग्रेस की 40 साल सेवा की है. मुझे परवाह नहीं कि लोग क्या कहते हैं.’

ये राजनीति में सिद्धू की दूसरी इनिंग की शुरुआत थी. पंजाब के साथ वे नेशनल लेवल की पॉलिटिक्स में इतना बड़ा नाम तो हो ही चुके थे कि कांग्रेस में उनकी एंट्री पंजाब से नहीं, सीधे दिल्ली दरबार से हुई. जानकार बताते हैं कि कांग्रेस में उनको प्रियंका गांधी और प्रशांत किशोर लाए थे.

कांग्रेस को ‘मुन्नी से ज्यादा बदनाम’ बताया था

नवजोत सिंह सिद्धू आज पंजाब कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं. हालांकि एक वक्त ऐसा भी था जब उन्होंने कांग्रेस को “मुन्नी से भी ज़्यादा बदनाम” बताया था. उस समय वे बीजेपी में थे और हर चुनाव में पार्टी के स्टार प्रचारक की भूमिका निभाते थे. लेकिन सिद्धू का सियासी सफर बताता है कि उनका कांग्रेस में आना खराब डील नहीं रही. वे ना सिर्फ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते, बल्कि पार्टी की अंदरूनी राजनीति में भी अपना सिक्का जमाते रहे.

फरवरी 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में जीत हासिल कर सिद्धू पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार में कैबिनेट मंत्री बने. पार्टी में नए होने के बावजूद सिद्धू का कद बड़ा था. शपथ ग्रहण समारोह में उन्हें तीसरे नंबर पर बुलाया गया था. जबकि कई बार मंत्री रह चुके विधायकों का नंबर बाद में आया.

पंजाब सरकार में सिद्धू को स्थानीय निकाय मंत्री बनाया गया था. लेकिन सीएम अमरिंदर सिंह से उनकी खींचतान चलती रही. सवा 2 साल बाद सिद्धू से मंत्रालय ले लिया गया. 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सिद्धू को ‘नॉन-परफॉर्मर’ बता दिया. उन्होंने सिद्धू को चुनौतीपूर्ण बिजली मंत्रालय दे दिया. लेकिन सिद्धू को कैप्टन की टिप्पणी चुभ गई. उन्होंने पलटवार करते हुए कह दिया-

‘मुझे हल्के में नहीं लिया जा सकता. मैं अपने जीवन के 40 सालों में एक परफॉर्मर रहा हूं’

इसके बाद नाराज़ सिद्धू ने राहुल गांधी को अपना इस्तीफा भेज दिया. नया मंत्रालय कभी जॉइन नहीं किया.

करतारपुर कोरिडोर मामले से बढ़ गया कद

अमरिंदर सिंह पाकिस्तानी फौज के ‘निर्मम आलोचक’ माने जाते है. इसलिए साल 2018 में जब सिद्धू अपने दोस्त और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने पाकिस्तान पहुंचे तो नया बखेड़ा खड़ा हो गया. वहां सिद्धू ने पाकिस्तानी फौज के चीफ कमर बाजवा से मुलाकात की. बाजवा की पहल पर सिद्धू उनसे गले भी मिले. सरहद के इस पार भारत में बैठे कैप्टन अमरिंदर सिंह को ये बात चुभ गई. या कहें कि टिप्पणी करने का एक और मौका हाथ लग गया. उस वक्त तक सिद्धू कैप्टन के मंत्री हुआ करते थे. सिद्धू के बाजवा से गले मिलने पर कैप्टन ने कहा,

“ये ठीक नहीं (बाजवा को गले लगाना) था, सीमा पर हमारे जवान रोज़ मारे जा रहे हैं.” 

लेकिन सिद्धू पर इसका कोई असर नहीं पड़ा. क़रीब 10 महीने बाद जब वे दोबारा पाकिस्तान गए. इस बार माहौल कुछ और था. दूसरी बार पाकिस्तान जाने की वजह बना करतारपुर कोरिडोर. पाकिस्तान स्थित करतारपुर साहिब वो जगह है जहां सिखों के पहले गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के आखिरी 18 साल जीए. आजादी मिलने के साथ ही हुए बंटवारे के समय ये गुरद्वारा पाकिस्तान के हिस्से में आया. भारतीय सीमा से इसकी दूरी महज 5 किलोमीटर है. लेकिन वहां जाने के लिए श्रद्धालुओं को दिल्ली के चक्कर काटने पड़ते थे.

लेकिन 2018 में इमरान सरकार ने वादा किया कि वो गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व पर ये कोरिडोर खोल देंगे. ऐसा हुआ भी. 9 नवंबर 2019 को इमरान खान सरकार ने कोरिडोर खोल दिया. उद्घाटन के दिन करतारपुर साहिब पहुंचे पहले जत्थे में शामिल नवजोत सिंह सिद्धू का सीमा के दोनों ओर ज़ोरदार इस्तकबाल हुआ. पंजाबियों के लिए सिद्धू-इमरान की यारी ने 10 महीने में वो काम कर दिखाया, जिसे 72 सालों से तवज्जो नहीं दी गई थी. इस मौके ने बेशक सिद्धू का सियासी कद बढ़ा दिया.

करतारपुर साहिब में अपनी बात रखते नवजोत सिंह सिद्धु (9 नवंबर 2019).
करतारपुर साहिब में अपनी बात रखते नवजोत सिंह सिद्धू (9 नवंबर 2019).

नानक नामलेवा संगत की नज़रों में सिद्धू इस दिन के बाद से हिट हो चुके हैं. राजनैतिक तौर से ये कांग्रेस में ही संभव हो पाया. सिद्धू BJP में होते, तो शायद ही ये रिश्ता कायम कर पाते. इस किस्से के बाद कैप्टन को मन मसोसकर ही सही, सिद्धू की पीठ थपथपानी पड़ी थी.

निशाने पर पंजाब कांग्रेस मुखिया की कुर्सी

नया मंत्रालय और पद अस्वीकार करने के बाद सिद्धू ‘जित्तेगा पंजाब’ नाम से एक मुहिम चला रहे थे. कहा जाता है कि इस मुहिम का प्रत्यक्ष निशाना शिरोमणी अकाली दल और बादल परिवार था, लेकिन परोक्ष निशाना थी पंजाब कांग्रेस मुखिया की कुर्सी. क़रीब डेढ़ साल से शांत रहे सिद्धू बीते कुछ समय में पूरी तरह एक्टिव दिखे हैं. दोधारी तलवार की तरह वे बादलों पर भी वार कर रहे थे, साथ में अपनी ही पार्टी की कैप्टन सरकार को निशाना भी बना रहे थे.

ये सिद्धू ही थे जो ट्वीट दर ट्वीट कैप्टन अमरिंदर की कड़ी आलोचना करते गए. पार्टी का कोई और नेता होता तो अनुशासनहीनता का नोटिस थमा बाहर बिठा दिया जाता. सवाल किया जाने लगा कि सिद्धू को इतनी हिम्मत मिलती कहां से है?

जानकारों का कहना है कि सिद्धू को खुलेआम कैप्टन की आलोचना करने की हिम्मत गांधी परिवार से मिलती है. वे बताते हैं कि गांधी परिवार तक ऐसी रिपोर्ट्स गई हैं कि कैप्टन सरकार ने अपने वादे नहीं निभाए. इन जानकारों की मानें तो कैप्टन के वफादार रहे कुछ कैबिनेट मंत्री दिल्ली दरबार में खुद ये रिपोर्ट्स देकर आए हैं. उनको भी लगता है कि साफ चेहरे के साथ जाने पर पंजाब में कांग्रेस की जीत तय हो जाएगी.

क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह को रिप्लेस कर पाएंगे सिद्धू?

पंजाब में जितने मुफीद हालात कांग्रेस के लिए इस वक्त हैं, शायद ही 1984 के बाद से कभी रहे होंगे. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से चल रही किसानों की नाराज़गी का सीधा फायदा भी कांग्रेस को मिलेगा. कहा जा रहा है कि ऐसे में नए चेहरे और नए वादों के साथ कांग्रेस चुनाव मैदान में जा सकती है. अब सवाल ये है कि क्या नवजोत सिंह सिद्धू ही वो चेहरा हैं?

पंजाब प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद सिद्धु पूरे प्रदेश के MLA और जिला प्रधानों से मिल रहे हैं. ये तस्वीर चंडीगढ़ की है. 19 जुलाई 2021
पंजाब प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद सिद्धू पूरे प्रदेश के MLA और जिला प्रधानों से मिल रहे हैं. ये तस्वीर चंडीगढ़ की है. 19 जुलाई 2021/PTI

सिद्धू की हालिया सियासी गतिविधियों के चलते पंजाब कांग्रेस में मची उथल-पुथल के परिणाम साफ दिखाई देते हैं. 2 साल पहले कांग्रेस के जो बड़े नेता सिद्धू को नसीहतें दे रहे थे, वे आज उन्हीं के खेमे में खुद को खड़ा करना चाह रहे हैं. कई कैबिनेट मंत्री, पूर्व प्रधान, युवा कांग्रेसी नेता, सभी सिद्धू के साथ अपनी तस्वीरें साझा कर रहे हैं. ऐसे में अटकलें लगना शुरू हो चुकी हैं.

7 महीने बाद पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं. उससे पहले सिद्धू, अमरिंदर सिंह और उनके खेमे को अंगूठा दिखाते हुए पंजाब कांग्रेस के मुखिया बन चुके हैं. मौजूदा हालात के मद्देनजर ये अनुमान लगाने वालों की कमी नहीं होगी कि कांग्रेस के जीतने की स्थिति में सिद्धू मुख्यमंत्री भी हो सकते हैं.

लेकिन फिर कैप्टन का क्या होगा? क्या कांग्रेस का G23 बढ़कर G24 हो जाएगा? या अमरिंदर सिंह को कम आंकना बड़ी भूल साबित होगी? फिलहाल कोई दावा करना जल्दबाजी ही होगी. अभी तो यही कहा जा सकता है कि आने वाले महीनों में पंजाब की सियासत और दिलचस्प होने वाली है.


वीडियो: सिद्धू और CM अमरिंदर सिंह के बीच चल रही तनातनी का कांग्रेस पर क्या असर होगा?

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