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चार साल में 6 लाख करोड़ रुपए जुटाने के लिए ये है मोदी सरकार का पूरा प्लान

देश चलाने के लिए सरकार को पैसा चाहिए. पिछले कई दशकों से सरकार जितना खर्च करती है, उतना टैक्स जमा कर नहीं पाती. अंतर की भरपाई होती है कर्ज लेकर. लेकिन कर्ज लेने की एक सीमा है, तो सरकार अपनी संपत्तियों को बेचकर पैसा जमा करती है. सादी भाषा में यही है निजीकरण. मोदी सरकार अब निजीकरण के लिए नया शब्द ले आई है – मॉनेटाइज़ेशन. सरकार का लक्ष्य है कि इस तरह चार साल में 6 लाख करोड़ रुपए इकट्ठा किए जाएं.

नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, और प्रधानमंत्री पद के लिए बीजेपी के उम्मीदवार. अप्रैल 2013 में इंडिया टुडे कॉनक्लेव में उन्होंने रेलवे पर अपना विज़न बताया था. तब मोदी रेलवे में प्राइवेटाइज़ेशन के पक्ष में तर्क दे रहे थे. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद रेलवे पर उनके बयान थोड़े बदले हुए लगे. दिसंबर 2014 में वाराणसी के कार्यक्रम में रेलवे पर उन्होंने प्राइवेटाइज़ेशन की बात को अफवाह बताया था. उसके बाद भी मोदी सरकार पर विपक्ष निजीकरण का आरोप लगाती रही, लेकिन सरकार इन आरोपों को खारिज करती रही.

सरकार का प्लान क्या है?

इन पुरानी बातों का ज़िक्र इसलिए क्योंकि मोदी सरकार ने 23 अगस्त को नई नीति लॉन्च की है. इस नीति में कहीं प्राइवेटाइज़ेशन का नाम नहीं है, लेकिन ये लगती प्राइवेटाइज़ेशन जैसी ही है. रेलवे, हाइवे, टेलिकॉम कैसे कई सेक्टर्स में निजी कंपनियों को भागीदारी देने की बात है. सरकार के मुताबिक ये असेट मोनेटाइजेशन है. इसका नाम दिया – नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन. हिंदी में इसका नाम सरकार ने क्या रखा है, ये हमें खोजने पर भी नहीं मिला. कल वाली पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस भी अंग्रेज़ी में थी. तो हम अंग्रेज़ी नाम के साथ ही चलते हैं. इसके लॉन्च के मौके पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत और कई मंत्रालयों के सचिव भी मौजूद थे.

सरकार ने मोनेटाइजेशन पाइपलाइन पर एक पूरी किताब जारी की है. इसके तहत रेलवे, हाइवे, पावर जैसे कई सेक्टर्स में सरकार के एसेट्स को मोनेटाइज़ किया जाएगा. यानी सरकार की संपत्ति निजी कंपनियों को चार साल के लिए दिए जाएंगे. किस सेक्टर में कितना हिस्सा मोनेटाइज़ होगा, इसका पूरा प्लान नीति आयोग ने तैयार किया. ये मामला प्राइवेटाइज़ेशन जैसा ना लगे इसके लिए नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा कि भले ही प्राइवेट कंपनियों को हिस्सेदारी निजी कंपनियों को दी जाए, लेकिन मालिकाना हक सरकार के पास ही रहेगा.

वित्त मंत्री ने कहा है कि सरकार के सिर्फ ब्राउनफील्ड एसेट्स ही निजी कंपनियों को दिए जाएंगे. ब्राउनफील्ड एसेट्स मानी वो सरकारी संपत्ति जिसका सरकार बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं कर रही, या क्षमता के हिसाब से पूरा इस्तेमाल नहीं कर रही. कुल मिलाकर सरकार का ज़ोर इस बात पर था कि जहां सरकार अच्छा नहीं कर रही, वहां प्राइवेट के लिए संपत्ति अनलॉक की जा रही है. और यहां से जो पैसा सरकार कमाएगी उसका इस्तेमाल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में होगा.

इस तरह सरकार को मिलेगा पैसा

अब सरकार क्या क्या मोनेटाइज़ करने जा रही है उसकी बात करते हैं. इस योजना के तहत सरकार सबसे ज्यादा पैसा सड़कों से कमाएगी. देश की 26 हज़ार 700 किलोमीटर लंबी सड़कें लीज़ पर दी जाएंगी. प्राइवेट कंपनियों इनका मैनेजमेंट करेंगी. क्या इससे टोल की रेट बढ़ सकती है, इस पर सरकार ने टोल का फॉर्मूला बनाने की बात कही. सरकार की कमाई में दूसरे नंबर होगा. रेलवे. बड़े स्तर पर रेलवे में मोनेटाइजेशन हो रहा है.

नई दिल्ली, मुंबई, नागपुर, अमृतसर, तिरुपति, साबरमती, नेल्लोर, पुदुचेरी, देहरादून, ग्वालियर ऐसे कई स्टेशनों का संचालन अब प्राइवेट कंपनियों को जा सकता है. इसके ज़रिए सरकार चार साल में एक लाख 52 हजार 496 करोड़ रुपये कमाएगी.

एविएशन सेक्टर की बात करते हैं. आप जानते ही होंगे कि अभी देश के ज्यादातर एयरपोर्ट्स का संचालन एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया यानी AAI करता है. ये नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधीन आता है. यानी केंद्र सरकार एयरपोर्ट्स को मैनेज करती है. और अभी पूरे देश में 125 एयरपोर्ट्स AAI के तहत आते हैं. अब नई नीति के तहत AAI की देश में कुल संपत्ति के लगभग 18 फीसदी संपत्ति का मोनेटाइजेशन हो जाएगा.

देश के 25 एयरपोर्ट्स के संचालन में प्राइवेट कंपनियों को हिस्सेदारी मिलेगी. वाराणसी, अहमदाबाद, चेन्नई, नागपुर, भुवनेश्वर, पटना, रांची, उदयपुर ऐसे 25 एयरपोर्ट्स सरकार की इस लिस्ट में शामिल हैं. दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरू के एयरपोर्ट्स अभी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल पर चलाए जा रहे हैं. यानी इनमें AAI के अलावा प्राइवेट सेक्टर की भी हिस्सेदारी है. इनमें भी प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी और बढ़ाई जाएगी. कुल मिलाकर एयरपोर्ट्स सेक्टर से सरकार 4 साल में 20 हजार 782 रुपये कमाने का लक्ष्य रखा है.

इस बार जब संसद के मॉनसून सत्र में शोर शराबे के बीच सरकार बिना चर्चा के धड़ाधड़ बिल पास करवा रही थी, तो एक बिल एयरपोर्ट्स को लेकर भी था. एयरपोर्ट इकनॉमिक रेग्यूलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (संशोधन) विधेयक पास करवाया था. इसके ज़रिए एयरपोर्ट अथॉरिटी के नियमों में कुछ बदलाव किया था, ताकि छोटे और बड़े एयरपोर्ट्स को पेयर करके निजीकरण के लिए दिया जा सके. अब सरकार इस कानून का फायदा उठा रही है.

टेलिकॉम सेक्टर से सरकार ने 35 हजार करोड़ रुपये कमाने का लक्ष्य रखा है. बीएसएनएल के बिछाए ऑप्टिकल फाइबर्स को सरकार निजी कंपनियों को दे सकती है. इसी तरह बिजली बनाने वाले सेक्टर से 40 हज़ार करोड़, बिजली सप्लाई वाले सेक्टर से 45 हजार करोड़ रुपये जुटाएगी.

देश के कुछ स्टेडियम्स का संचालन भी निजी कंपनियों को दिया जाएगा. स्टेडियम के निजीकरण पर सवाल पूछा गया था तो नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा कि स्टेडियम में सरकार के बजाय निजी कंपनियां के तहत बेहतर सुविधाएं होंगी. इसके ज़रिए सरकार 11 हज़ार 450 करोड़ रुपये कमाएगी.

इस तरह से FCI के गोदामों का भी निजीकरण होगा. सरकार की तरफ से बताया गया कि जो FCI के गोदाम 50-60 साल पुराने हैं उनमें निजी कंपनियों को हिस्सेदारी दी जाएगी, ताकि उनको ठीक करके इस्तेमाल किया जा सके. यहां कृषि कानून भी सरकार के काम आएंगे. आवश्यक वस्तु कानून में संशोधन से अब भंडारण को लेकर निजी कंपनियों को पूरी छूट होगी.

तो इस तरह से सरकार ने मोटी कमाई का पूरा प्लान जारी किया है. इसकी आलोचना भी शुरू हो गई है. आरएसएस से जुड़ी ट्रेड यूनियन भारतीय मज़दूर संघ कि तरफ से कहा गया है कि ये घर का गहना बेचने जैसा है. आज कांग्रेस की तरफ से भी प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई. राहुल गांधी ने कहा कि वो निजीकरण के खिलाफ नहीं हैं. लेकिन डिफेंस, रेलवे जैसे स्ट्रैटजिक एसेट्स के निजीकरण के खिलाफ हैं.

सरकार की नीति पर कई और खेमों से भी सवाल पूछे जा रहे हैं. सवाल कि अगर ये मोनेटाइजेशन चार साल के लिए ही है तो निजी कंपनियां इतने कम समय के लिए करोड़ों में खर्च क्यों करेंगी. सवाल ये भी कि क्या रेलवे जैसा सेक्टर, जो देश में सबसे ज्यादा सरकारी नौकरियां देता है, उसमें प्राइवेट कंपनियों को हिस्सेदारी देनी चाहिए? सवाल ये भी क्या सरकार को इतने बड़े फैसले से पहले सभी स्टेकहोल्डर्स से राय नहीं लेनी चाहिए थी.


 

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