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क्या देश में महिलाएं वाक़ई पुरुषों से अधिक हो गई हैं?

भारत में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक होने की खबर को कैसे देखा जाना चाहिए. (महिलाओं की सांकेतिक फोटो)

नंदलाल मिश्र मुंबई स्थित IIPS यानी International Institute for Population Sciences (अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान) में सीनियर रिसर्च फ़ेलो हैं. पढ़िए उनका ये लेख

बीते दिनों एक ख़बर काफ़ी सुर्ख़ियों में रही कि भारत में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक हो गई है. BBC और द गार्डियन जैसी विदेशी मीडिया ने भी इसे प्रमुखता से छापा. सोशल मीडिया में इस ख़बर की तो बाढ़ सी आ गई जहां अधिकांश लोग इसे वर्तमान सरकार की बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ और अन्य योजनाओं की उपलब्धि बता रहे थे. वहीं बाक़ी लोग आंकड़ों में हेराफेरी और फर्ज़ीवाड़ा होने की बात कह सरकार और सर्वे की खिंचाई करने में लगे थे.

दरअसल यह ख़बर भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी पांचवें नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़ों पर आधारित थी. सर्वे की तथ्य-पुस्तिका में देश का लिंगानुपात 1020 बताया गया है जिसका सामान्य अर्थ यह हुआ कि देश में प्रति हज़ार पुरुषों पर 1020 महिलाएं हैं. लेकिन वस्तु-स्थिति ऐसी नहीं है. देश में अभी भी महिलाओं की तादाद पुरुषों से कम है. लिंगानुपात की गणना के लिए राष्ट्रीय जनगणना के आंकड़ों को मानक माना जाता है. साल 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में प्रति हज़ार पुरुषों पर केवल 943 महिलाएं थीं. वहीं साल 1991 और 2001 की जनगणना में यह आंकड़ा क्रमशः 926 और 933 बताया गया था.

पांचवें नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे में कहा गया है कि भारत में पहली बार महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक हो गई है. (सांकेतिक फोटो-आजतक)

ज़ाहिर है बीते तीन दशकों में देश के लिंगानुपात में बेहतरी दर्ज़ की गई है लेकिन स्थिति इतनी भी बेहतर नहीं हुई है कि लिंगानुपात का आंकड़ा अचानक से एक ही दशक में बिलकुल उलट हो जाए. किसी भी जनसंख्या में इस तरह के बदलाव होने में कई दशकों का समय लगता है. रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट जिसमें साल 2036 तक भारत की जनसंख्या की अनुमानित गणना बताई गई है, उसके मुताबिक़ वर्तमान में भारत का लिंगानुपात 948 है. यानी प्रति हज़ार पुरुषों पर साढ़े नौ सौ महिलाएं. यह संख्या वैज्ञानिक गणना पर आधारित और अधिक विश्वसनीय है.

NFHS का आंकड़ा गलत है?

तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) द्वारा जारी आंकड़ा ग़लत है और सर्वेक्षण को सार्थक नहीं माना जा सकता है? नहीं, ऐसा बिलकुल भी नहीं है. दरअसल इस आंकड़े की व्याख्या और प्रस्तुति में ग़लती हुई है. वस्तुतः NFHS एक परिवार सर्वेक्षण है जिसका मुख्य मक़सद देश में महिला एवं बाल स्वास्थ्य से संबंधी सूचनाओं को विस्तार से जुटाना और विश्लेषण कर उसे प्रस्तुत करना है जिसके आधार पर लोक-स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरी नीतियों एवं कार्यक्रमों का निर्धारण एवं संचालन किया जा सके. जनगणना में जहां देश के सभी घरों और लोगों के बारे में संक्षेप में जानकारी इकट्ठा की जाती है वहीं सर्वेक्षण में वैज्ञानिक पद्धति से सीमित और बहुत कम घरों और उनमें रहने वाले व्यक्तियों का चयन किया जाता है और उनसे संबंधित तथ्य विस्तार में दर्ज़ किए जाते हैं.

सांकेतिक तस्वीर

NFHS (2019-21) में देश के सभी ज़िलों से चयनित 637 हज़ार घरों से जानाकरी जमा की गई है. इन प्रतिनिधि घरों का चुनाव इस प्रकार किया जाता है कि कम से कम परिवारों का सर्वेक्षण करके भी सटीक और विश्वसनीय परिणामों का अनुमान लगाया जा सकता है और उन परिणामों को देश और राज्य के सभी परिवारों पर लागू किया जा सकता है. चयनित घरों की संख्या के आधार पर NFHS दुनिया के सबसे बड़े सर्वेक्षणों में एक माना जाता है. यह सर्वेक्षण वैश्विक डेमोग्राफिक हेल्थ सर्वे का हिस्सा है जिसके तहत नब्बे के दशक से 90 से अधिक देशों में कुछ वर्षों के अंतराल पर इस तरह का सर्वेक्षण किया जाता रहा है.

कैसे नामित होते हैं घर?

किसी भी सर्वेक्षण में चयनित घरों के सदस्यों को दो सूचियों में नामित किया जाता है. पहला, डी-ज़्यूरे अर्थात चयनित घर के मूल या सामान्य सदस्य. दूसरा, डी-फ़ैक्टो यानी वे सदस्य जो सर्वे की पहली रात चयनित घर में ठहरे थे चाहे वह उस घर के सामान्य सदस्य हों या नहीं.

अल्पकालिक प्रवास के कारण डी-ज़्यूरे और डी-फ़ैक्टो आबादी में अंतर पाया जाता है. अब यहां दो संभावनाएं बनती हैं. एक यह कि कोई व्यक्ति किसी घर का सामान्य सदस्य तो है, लेकिन सर्वे की पहली रात को वह उस घर में मौज़ूद नहीं था/थी, ऐसे महिला या पुरुष को हम प्रवासी कह सकते हैं.

दूसरी यह कि कोई व्यक्ति किसी घर का सामान्य सदस्य तो नहीं है लेकिन सर्वे की पहली रात वह चयनित घर में था/थी, ऐसे व्यक्तियों को हम आगंतुक कहेंगे. NFHS आयु, लिंग इत्यादि की जानकारियां दोनों– डी-ज़्यूरे एवं डी-फ़ैक्टो– सदस्यों के लिए जमा करता है लेकिन विस्तृत अध्ययन केवल डी-फ़ैक्टो सदस्यों का ही किया जाता है. ज़ाहिर है NFHS रिपोर्ट के अधिकांश आकलन डी-फ़ैक्टो सदस्यों पर ही आधारित होते हैं जिसकी मुख्य वजह है विस्तृत सर्वे और स्वास्थ्य संबंधी परीक्षणों के लिए उनकी उपलब्धता.

सांकेतिक फोटो

NFHS में लिंगानुपात की गणना भी डी-फ़ैक्टो सदस्यों की संख्या के आधार पर ही की जाती है. डी-फ़ैक्टो सदस्यों में महिलाओं की प्रधानता की मुख्य वज़ह है आगंतुकों में महिलाओं की अधिकता. NFHS के सभी चरणों का विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि प्रवासियों में महिलाओं एवं पुरुषों की तादाद लगभग बराबर (50%) होती है जबकि आगंतुकों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 60 फ़ीसदी के आसपास होती है.

आगंतुक महिलाओं में मायके लौटी बेटियों और अन्य रिश्तेदारों की संख्या काफ़ी अधिक होती है. लेकिन फिर सवाल उठता है कि अगर सर्वे के लिए प्रतिनिधि सैंपल का चयन वैज्ञानिक पद्धति से किया गया है तो चयनित घरों की बहुओं के अपने मायके में होने की भी वही प्रायिकता (संभावना) होनी चाहिए जितनी की उन घरों की विवाहित बेटियों की अपने पिता के घर में होने की. तो फिर आगुंतकों में महिलाओं की प्रमुखता का कारण क्या है?

तस्वीर सांकेतिक

दरअसल लिंगानुपात की गणना पर प्रवासियों की आबादी, लिंग और प्रवास स्थान का अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है. NFHS में शामिल घरों में आगंतुक महिलाओं और पुरुषों की संख्या, प्रवासी महिलाओं और पुरुषों की संख्या की दो-तिहाई से तीन-चौथाई तक होती है. चयनित घरों से प्रवास करने वाली महिलाओं और चयनित घरों में आगंतुक महिलाओं की तादाद लगभग बराबर होती है अर्थात महिलाएं एक घर से निकल कर दूसरे घर में जा ठहरती हैं. लेकिन सभी पुरुषों के साथ ऐसा नहीं होता है.

प्रवासी और आगंतुक पुरुषों की संख्या में बड़ा अंतर पाया जाता है जिसकी मुख्य वजह है प्रवासी मज़दूरों की एक विशाल आबादी का बिना परिवार वाले घरों जैसे ढाबों, भवन निर्माण स्थलों, रैन बसेरों एवं अन्य कार्य-स्थलों पर प्रवसन जो NFHS सैंपल डिजाइन के दायरे में नहीं आता है. ग़ौरतलब है कि NFHS एक परिवार आधारित सर्वेक्षण है जिसका उद्देश्य प्रवासी आबादी का अध्ययन करना नहीं है. इसलिए प्रवासी मज़दूरों को NFHS सैंपल डिजाइन में बराबरी का प्रतिनिधित्व देने के लिए अतिरिक्त प्रयास नहीं किया जाता है. फलस्वरूप पुरुषों की एक बड़ी तादाद डी-फ़ैक्टो गणना में शामिल नहीं हो पाती है और लिंगानुपात स्त्रियों के पक्ष में झुक जाता है. जिन राज्यों से मज़दूरों का पलायन होता है वहां लिंगानुपात अपेक्षाकृत अधिक हो जाता है वहीं जिन राज्यों में ये मज़दूर पहुंचते हैं वहां लिंगानुपात में कमी दर्ज़ की जाती है.

तस्वीर सांकेतिक. फोटो- आजतक

डी-फ़ैक्टो सदस्यता आधारित गणना क्या है?

अब आते हैं मूल प्रश्न पर कि NFHS आधारित गणना में महिलाओं की तादाद वस्तु-स्थिति के मुक़ाबले अधिक क्यों होती है. इसका मुख्य कारण है डी-फ़ैक्टो सदस्यता पर आधारित लिंगानुपात की गणना. बीते तीन दशकों से लिंगानुपात में उत्तरोत्तर वृद्धि के योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता है. यही दो वजहें हैं कि NFHS-5 में प्रति हज़ार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या हज़ार के ऊपर चली गयी है, लेकिन इसका ये आशय बिल्कुल भी नहीं है कि देश में महिलाएं पुरुषों से अधिक हो गई हैं. क्योंकि अगणित पुरुषों की आबादी को दरकिनार नहीं किया जा सकता है. वे भी वर्तमान भारत की ही आबादी का हिस्सा हैं और उनकी तादाद काफ़ी अधिक है. लिंगानुपात का यह भ्रम एक-दो साल में दूर हो जाएगा जब अगले जनगणना (2023-24 में संभावित) का परिणाम आएगा.
एनएफएचएस के सभी चरणों के विश्लेषण से पता चलता है कि डी-फ़ैक्टो सदस्यों की संख्या पर आधारित लिंगानुपात का मान डी-ज़्यूरे आधारित मान के बरक्स अधिक होता है. मसलन NFHS-4 (2015-16) का डी-फ़ैक्टो लिंगानुपात 991 तो डी-ज़्यूरे लिंगानुपात 980 था. इसी प्रकार NFHS-1 (1992-93), NFHS-2 (1998-99) और NFHS-3 (2005-06) में ये आंकड़े क्रमशः 957 और 944, 960 और 949 और 1000 और 988 थे. हाल की ख़बरों की तर्ज़ पर कहें तो साल 2005-06 में भी महिलाओं की तादाद पुरुषों से कम नहीं थी, लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं थी जो बाद में 2011 की जनगणना से सिद्ध हो गयी.

ज़ाहिर है NFHS आधारित दोनों ही गणना वास्तविक लिंगानुपात का उच्च आकलन करती है. बीते तीन दशकों से जनगणना में महिलाओं को नहीं गिने जाने की संभावना का पुरुषों के नहीं गिने जाने की संभावना के मुकाबले कम होने का कोई प्रमाण नहीं मिलता है, अतः जनगणना के आंकड़े को प्रमाणिक माना जाना उचित होगा.

लिंगानुपात की व्याख्या कैसे करें?

बेहद सरल अर्थों में कहें तो सर्वे में शामिल घरों में सर्वेक्षण और स्वास्थ्य जांच के लिए प्रति हज़ार पुरुषों पर 1020 महिलाएं उपलब्ध थीं. इस आंकड़े के सरलीकरण एवं सामान्यकरण से बचना चाहिए. केंद्र शासित प्रदेशों एवं छोटे राज्यों के लिए सैंपल साइज़ कम होने के कारण इस आंकड़े की व्याख्या से बचना चाहिए. हां, इस आंकड़े का उपयोग विभिन्न राज्यों के और दो समयांतरालों में लिंगानुपात की परस्पर तुलना के लिए अवश्य किया जा सकता है. सच कहें तो जनांकिकी और जन स्वास्थ्य के विद्वान और नीति-निर्धारक NFHS आधारित लिंगानुपात का उपयोग नहीं के बराबर करते हैं. हां, NFHS द्वारा प्रदत्त जन्मजात शिशुओं के लिंगानुपात संबधी आंकड़े का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होता है और उसे विश्वसनीय भी माना जाता है.

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