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तैमूर नाम से दिक्कत है तो याद कर लो, निर्भया के बलात्कारी का नाम राम सिंह था

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एक बात बताइए. आपको दिक्कत क्या है? मतलब एक आदमी है, एक औरत है, सेक्स किया, बच्चा हुआ, बच्चे का नाम रखा. ये दुनिया की सबसे सिंपल चीज है. इससे सिंपल कुछ भी नहीं है. हर जगह ऐसा ही होता है. आपके साथ भी यही हुआ था. मेरे साथ भी यही हुआ था. हम सभी के साथ ऐसा ही हुआ था. मेरे नाना का नाम लल्लू राम दीक्षित था. 3 बरस पहले मर गए. ताउम्र चिढ़ाया है अपनी माता जी को उनका नाम लेकर. मगर उन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता था. वो उनके पिता थे. ऐसे ही तैमूर सैफ और करीना के बेटे का नाम है. उन्हें भी कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा. न जाने क्यूं, आपको आग लग रही है.

तैमूर नाम रखने से क्या हो जायेगा? क्या सारा खून-खराबा, लूट-मार का ठेका तैमूर ने ही ले रखा है? क्या आपको लगता है, समूची दुनिया को अपनी मुट्ठी में भींच लेने की मंशा रखने वाले तैमूर लंग के घरवाले अगर उसका नाम सलमान रख देते तो वो ऐक्टर बन जाता? तैमूर के बेटे का नाम शाहरुख़ था. क्या शाहरुख़ बॉलीवुड का बादशाह बन गया? नहीं न? जो शाहरुख़ बॉलीवुड पर राज करने लगा, वो तो सदियों बाद दिल्ली में पैदा हुआ. और उसके बाप का नाम तैमूर नहीं था.

आपके लॉजिक मस्त होते हैं. आपके हिसाब से अगर मेरा नाम सचिन होता तो मुझसे बड़ा इस दुनिया में कोई बैट्समैन नहीं होता. सबसे पहली हक़ की बात होती है. उन्हें पूरा हक़ है अपने बेटे का नाम रखने का. वो अपने बेटे का नाम बंदर या चिम्पांजी भी रख देते तो भी आपको कोई हक़ नहीं था उस पर टिप्पणी करने का. ये उनकी कोई फिल्म नहीं है जो आप रिव्यू देंगे. दूसरा, नाम में क्या है? कहते हैं कि जग में सुन्दर हैं दो नाम, चाहे कृष्ण कहो या राम. मैं तो यकीन नहीं कर सकता कि ये वही राम होगा जिसने राम सिंह के रूप में 16 दिसंबर 2012 की रात दिल्ली की सड़क पर दौड़ती एक बस में निर्भया का बलात्कार कर दिया होगा. राम राम!

तैमूर जब पैदा हुआ था, साल था 1336. आज से 680 साल पहले. तब जब पढ़ाई-लिखाई नहीं होती थी. स्कूल नहीं होते थे. यूनिवर्सिटी नहीं होती थीं. आज जो तैमूर पैदा हुआ है वो 2016 में पैदा हुआ है. उसके मां-बाप पढ़े-लिखे हैं. दुनिया के हालात उनकी आंखों के सामने हैं. उनका भी दिल पिघलता होगा सीरिया में मरते बच्चों की खबर सुनकर. उनकी भी सांसें तेज़ चलती होंगी जब उन्हें अपने देश पर हुए हमले की खबर सुनाई देती होगी. और ऐसा मैं यकीन के साथ कह सकता हूं. अपने बच्चे को वो यकीनन अच्छी पढ़ाई-लिखाई देंगे. उसे दुनिया के तौर-तरीके सिखायेंगे. और यहीं उस तैमूर और इस तैमूर में अंतर पैदा होता है. तैमूर लंग के बाप ने इस्लाम कुबूल किया था. तैमूर की खुद इस्लाम की राह पर चलने की तमन्ना थी. वो कट्टर धार्मिक था. मगर यहां तो परिवार में ही वो माहौल नहीं है. बाप मुस्लिम है तो मां हिन्दू. बुआ मुस्लिम हैं तो फूफा हिन्दू. यहां तो हिन्दू और मुस्लिम की खाई ही पटी पड़ी है. किस मौके पर उसे हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर इस अलगाव के बारे में मालूम चलेगा? कोई चंगेज़ खान उसका आइडल नहीं बनेगा. उसे तलवार के दम पर दुनिया जीत लेने की सीख नहीं दी जाएगी. और इन सभी से वो किसी और किस्म का तैमूर भी बन सकता है.

क्यूं न ये एक अच्छी शुरुआत के रूप में देखा जाए? क्यूं न इसे एक ऐसे तैमूर की शुरुआत के रूप में देखें जिसका नाम लेते वक़्त दिल्ली की खून से सनी सड़कों के बारे में ख्याल न आयें. ये एक शुरुआत भी हो सकती है. और मुझे इस शुरुआत का पूरा यकीन है. अगर ऐसा न होता हो तो अपने बेटे को क्रिकेटर बनाने के लिए विराट, ऐक्टर के लिए सलमान (मुस्लिम नाम नहीं मांगता है तो फिर तुषार रख लो), राइटर के लिए चेतन, सिंगर के लिए अरिजीत नाम रख लो. इस ट्रिक को आजमाओ. और फिर हमें रिज़ल्ट बताना. चाहो तो अपना नाम नरेंद्र रख लो. क्या पता कल से जियो के ऐड में मॉडलिंग का ऑफर आ जाये.


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